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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 825

१४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

वैसे ही ये भी जड़ हैं। यदि कहिये कि इनमें तो प्राण है तो जैसे लुहार की धौकनी श्वास को लेती और छोड़ती है, वैसे ही ये जीव भी चेष्टा करते हैं।

हे राम ! अपना वास्तव स्वरूप जो है सो ब्रह्म है। उसके प्रमाद से जीव मोह और कृपणता को प्राप्त होते हैं। जैसे लुहार की खाल वृथा श्वास लेती है, वैसे ही इनकी चेष्टा व्यर्थ है। इनकी चेष्टा और बोलना अनर्थ के निमित्त है। जैसे धनुष से जो बाण निकलता है, वह हिंसा के निमित्त है उससे और कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा और बोलना अनर्थ और दुःख के निमित्त है, सुख के निमित्त नहीं और उसकी संगति भी कल्याण के निमित्त नहीं। जैसे जङ्गल के ठूँठ वृक्ष से छाया और फल की इच्छा करनी व्यर्थ है, उससे कुछ फल नहीं होता और न विश्राम के निमित्त छाया ही प्राप्त होती है; वैसे ही अज्ञानी जीव की संगति से सुख नहीं होता। उनको दान देना व्यर्थ है। जैसे कीचड़ में घृत डालना व्यर्थ होता है, वैसे ही मूर्खों को दिया दान व्यर्थ होता है। उनसे बोलना भी व्यर्थ है। जैसे यज्ञ में कुत्ते को बुलाना निष्फल है, वैसे ही उनसे बोलना निष्फल है। हे राम ! जो अज्ञानी जीव हैं, वे संसार में आते-जाते और जन्मते-मरते हैं और शरीर में आस्था करते हैं, वे पुत्र, दारा, बान्धव, धनादिक से ममत्व बुद्धि करते हैं। पर इस मिथ्यादृष्टि से वे दुःख पाते हैं और मुक्ति कदाचित् नहीं होती; क्योंकि वे अनात्मा में आत्मबुद्धि को त्याग नहीं करते और ममताबुद्धि में दृढ़ रहते हैं।

हे राम ! जो अज्ञानी हैं वे असत् पदार्थ को देखते हैं और वस्तुरूप की ओर से अन्धे हैं, इससे वे परमार्थ धन से विमुख रहते हैं। नरक का सार जो स्त्री आदि हैं, उनमें वे प्रीति करते हैं और उनको देखकर प्रसन्न होते हैं। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है, वैसे ही स्त्री आदि को देखकर मूर्ख प्रसन्न होते हैं। हे राम ! मूर्ख को मारने के निमित्त स्त्री विष की बेलि है। नेत्र उसके फूल हैं, होंठ पत्ते हैं, स्तन गुच्छे हैं और अज्ञानरूपी भँवरे वहाँ विराजमान होते हैं और उसका नाश करते