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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 812, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 812

श्रीगणेशाय नमः

श्रीयोगवाशिष्ठ

द्वितीय भाग

निर्वाण प्रकरण प्रारम्भ


वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! उपशम प्रकरण के अनन्तर अब तुम निर्वाण प्रकरण सुनो, जिसके जानने से तुमको निर्वाणपद प्राप्त होगा । मुनिनायक ने रामजी से बड़े उत्तम वचन कहे और रामजी ने सब ओर से मन खींचकर मुनीश्वर के वाक्यों में लगाया । राजा लोग भी निस्पन्द हो गये, मानों कागज पर चित्र लिखे हैं—और वशिष्ठजी के वचनों को विचारने लगे । राजकुमार भी विचारते, गर्दन हिलाते और अपने सिर पर हाथ फेरते विस्मय-मग्न हो गये । उन्हें यह जानकर प्रसन्नता के साथ ही आश्चर्य भी हुआ कि जिस जगत् को सत्य जानकर वे तल्लीन हो रहे थे वह है ही नहीं । तब दिन का चतुर्थ भाग रह गया और सूर्य अस्त हुए—मानों वशिष्ठजी के वचन सुनकर सूर्य भी कृतार्थ हुए । उनका ताप घट गया और शीतलता प्राप्त हुई । स्वर्ग से जो सिद्ध और देवता आये थे, उनके गले में मन्दार आदि वृक्षों के फूलों की मालाएँ थीं । उनसे पवन के द्वारा सब स्थान सुगन्धित हो गये । भँवरे फूलों पर गुञ्जार करने लगे । झरोखों के मार्ग से सूर्य की किरणें जो आती थीं, उनसे सूर्यमुखी कमल, जो राजा और देवताओं के सीस पर थे, वैसे ही सूख गये, जैसे मन से जगत् की सत्ता निवृत्त हो जाती है और वृत्ति सकुचती जाती है । सभा में जो बालक और पिञ्जरों में जो पक्षी बैठे थे, उनके भोजन का समय हुआ । बालकों को भोजन कराने के निमित्त माताएँ उठीं । जब चौथे पहर राजद्वार पर नौबत, नगाड़े, भेरी, शहनाई आदि बाजे बजने लगे और