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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 552

५५२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, वे मोक्षमार्ग से शून्य हैं। जैसे जो मनुष्य शयन करता है, उसको स्वप्न में चित्त का परिणाम होता है। उसमें जो जीव होते हैं उनको फिर स्वप्न होता है। तब उनको अपनी-अपनी सृष्टि भासती है। तो यह अनन्त सृष्टि अनुभव के आश्रय होती है। वैसे ही एक आत्मा के आश्रय में जो असंख्य सृष्टियाँ फुरती हैं वे कई समान, कई अर्धसमान और कई विलक्षण भासित होती हैं पर जीव अपनी-अपनी सृष्टि को जानते हैं। जैसे एक घर में दस पुरुष सोये हैं और उनको अपना-अपना स्वप्न आवे, तब एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता। वैसे ही यह सृष्टि भी और जीव को नहीं भासती; क्योंकि संकल्प अपना-अपना है। जैसे पत्थर को पत्थर नहीं जानता। जो अन्तर्वाहक शरीर योगेश्वर हैं, उनको और सृष्टियों का भी ज्ञान होता है।

हे राम! वास्तव में सृष्टि भी निराकार आकाशरूप है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे आत्मा में सृष्टि है। और जैसे रस्सी में सर्प भासता है, वैसे ही आत्मा में सृष्टि भासती है। हे राम! वास्तव में कुछ हुआ नहीं; सर्वदा सब प्रकार आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जिनको आत्मा का प्रमाद हुआ है, उनको जगत् भासता है। वास्तव में जगत् किसी कारण से नहीं उपजा—आभासरूप है। सम्यक्ज्ञान के होने पर ब्रह्म अद्वैत भासता है और असम्यक्ज्ञान से द्वैतरूप जगत् होकर भासता है। जैसे रस्सी के सम्यक्ज्ञान से रस्सी ही दिखती है और असम्यक्ज्ञान से सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के असम्यक्ज्ञान से जगत् का भान होता है। हे राम! मैंने उस देवी से प्रश्न किया कि हे देवि! तुम कहाँ से आई हो; तुम्हारा स्थान कहाँ है; तुम कौन हो और यहाँ किस निमित्त आई हो? तब वह देवी बोली, हे मुनीश्वर! ब्रह्मरूपा महाकाश के अणु का भी जो अणु है और उसके छिद्र में भी जो छिद्र है, उसमें तुम रहते हो और तुम्हारा यह जगत् भी उसी में है। तुम्हारी सृष्टि का जो ब्रह्मा है उसकी संवेदन-रूपा कन्या ने यह जगत् रचा है। उस तुम्हारे जगत् में पृथ्वी है और उसके ऊपर समुद्र है, जिसमें पृथ्वी घिरी हुई है। उसके ऊपर दूना और