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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 544

५४४ ❉ योगवाशिष्ठ ❉

इत्यादिक सब शब्द और अर्थ उसी के नाम हैं। जैसे सब अवयव अव-
यवी पुरुष के हैं, जो उनको फैलावे तो भी अपना स्वरूप है, जो समेटे
तो भी अपने अवयव हैं, वैसे ही उत्पत्ति और प्रलय सब ब्रह्म ही के
अवयव हैं; भिन्न नहीं। परन्तु भिन्न की नाईं जगत् हुआ भासता है।
जैसे सूर्य की किरणों में जल उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु हुए की नाईं
लगता है और किरणें ही जल होकर दिखती हैं, वैसे ही आत्मा जगत् के
आकार में भासता है। वह आत्मस्वरूप ही है।

हे राम ! शुद्ध, चिन्मात्र, ब्रह्मरूपी एक वृक्ष है, उसमें जो संवित्
का फुरना हुआ है, वही उसकी दृढ़मूल है। चित्त शरीररूपी स्तम्भ
है। लोकपाल डालें हैं। शाखा जगत् है। फल प्रकाश है, जिससे
जगत् प्रकाशित होता है। अन्धकार श्यामता है। पोल आकाश है।
फूलों के गुच्छे प्रलय हैं। गुच्छों को हिलानेवाले भौंरे विष्णु, रुद्रादिक हैं।
जड़ता त्वचा है। इस प्रकार सब आत्मब्रह्म है। ब्रह्मतत्वभाव से भी कुछ नहीं
बना। सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित है। हे राम! जगत् का भाव, अभाव,
उत्पत्ति, प्रलयादिक अनुभवरूप ब्रह्म स्थित है। उसमें कोई विकार नहीं।
वह केवल, शुद्ध, निरञ्जन, निर्मल आत्म-आकाश है। जैसे चन्द्रमा के
मण्डल में विष की वेल नहीं होती, वैसे ही आत्मा में कोई विकार
नहीं होता, वह निर्मल आकाशरूप, आदि-अन्त-मध्य की कल्पना
से रहित है। तब लोकपाल आदि का भ्रम कैसे हो ? ये सम्पूर्ण विकार
आत्मा के अज्ञान से भासित होते हैं। जब तुम एकाग्रचित्त होकर
देखोगे, तब जगद्भ्रम शान्त हो जायगा। यह जगद्भ्रम फुरने से
भासित हुआ है। जब फुरना उलटकर आत्मा की ओर आवेगा, तब
यह जगद्भ्रम मिट जायगा। जैसे पवन से अग्नि जागता है और पवन
ही से दीपक बुझ जाता है, वैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है
और जब चित्त का फुरना अन्तर्मुख होता है, तब जगद्भ्रम मिट जाता
है। हे राम ! जब ज्ञान से देखोगे, तब अज्ञानरूप फुरने का त्रैकालिक
अभाव हो जायगा और आत्मा में बन्धनमुक्ति न भासित होगी—इसमें
कुछ संशय नहीं। यह जगत्जाल आत्मा में नहीं उपजा, अज्ञान से