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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 536

५३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

चिदाकाश में आया और उस शब्द को सुनने के संकल्प में चिदाकाश-
रूप हो गया । जैसे समुद्र में मिली जल की बूँद समुद्ररूप हो जाती है,
वैसे ही मैं चिदाकाश हो गया, जो निराकार और निराधार है; सबको
धारण कर रहा है और परमानन्दस्वरूप, शान्त और अनन्त है और
जिसमें सब ब्रह्माण्ड प्रतिबिम्बित होते हैं । जब मैं आत्मा के आदर्श में
स्थित हुआ, तब मुझको अनन्त सृष्टियाँ अपने आपमें भासित
होने लगीं ।

जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु होते हैं, वैसे ही ब्रह्म में सृष्टियाँ
हैं । परन्तु जीव जीव की अपनी-अपनी सृष्टि है । एक की सृष्टि को
दूसरा नहीं जानता । जैसे कई एक मनुष्य सोये हों और अपनी-अपनी
स्वप्नसृष्टि को देखें तो उसमें अपना आकाश और काल देखते हैं, एक
की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, परन्तु ज्ञानी सब सृष्टियाँ अपने में
देखता है, वैसे ही मुझको सब सृष्टियाँ चिदाकाश में भासित हुईं । पर
जीवों को अपनी-अपनी सृष्टि भासती थी । हे राम ! एक सृष्टि ऐसी
भासी कि उसमें कोई आवरण न था, जैसे पृथ्वी के चौफेरे समुद्र होते
हैं—कहीं-कहीं एक ही भूत का आवरण था । कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टि में
आई जिस पर पाँचों तत्त्वों का आवरण था । प्रथम पृथ्वी का, दूसरा
जल का, तीसरा अग्नि का, चतुर्थ वायु का और पञ्चम आकाश का ।
कहीं ऐसी सृष्टियाँ देखीं जिन पर चार ही तत्त्वों का आवरण था ।
कहीं ऐसी सृष्टि देखी जिस पर षट् आवरण थे । कहीं दश आवरण
नजर आये, कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टिगत हुई जिस पर षोडश आवरण थे और
कहीं ऐसी देख पड़ी जिन पर चौंतीस आवरण थे । कहीं तत्त्वों के
छत्तीस आवरण संयुक्त सृष्टियाँ भी देखीं । हे राम ! इस प्रकार मैंने चिदा-
काश में अनन्त सृष्टियाँ देखीं, परन्तु सब आकाशरूप थीं; आत्मा में
कुछ भिन्न वस्तु न थी । मन के फुरने से मुझको सृष्टि देख पड़ी, क्योंकि
मन संकल्पमात्र ही था—कुछ बना नहीं । जैसे दीवार पर चित्र लिखे
हों, वैसे ही आत्मारूपी दीवार पर चित्ररूप सृष्टि दीखी कि अपने-अपने
व्यवहार में सब मग्न हैं ।