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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 225

३२८ योगवाशिष्ठ ।

होते हैं और राग, द्वेष, तृष्णा और भूख से जलते रहते हैं। उनका कोई
बड़ा सरदार विदूरथ के निकट आने लगा तब विदूरथ ने रूपका नामक
अस्त्र चलाया और उससे महाभयानकरूप बड़े नख, केश, जिह्वा, उदर
और होठसहित नग्नरूप भैरव प्रकट होकर वैतालों को भोजन करने
और खप्पर में रक्त भरकर पीने और नृत्य करने लगे और सबको दुःख
देने लगे। तब सिद्ध ने क्रोध करके राक्षसरूपी अस्त्र चलाया जिससे
एक कोटि भयानकरूप और काले राक्षस पाताल और दिशाओं से
निकले जिनकी जिह्वा निकली हुई और ऐसा चमत्कार करते थे जैसे श्याम
मेघ में बिजली चमत्कार करती है । वे जिसको देखें उसको मुख में डाल-
के ले जावें । उनको देखके विदूरथ की सेना बहुत डर गई, क्योंकि
जिसके सम्मुख वे हँसके देखें वह भय से मर जावे। तब राजा विदूरथ
ने अपनी सेना को कष्टवान् देख विष्णुअस्त्र चलाया जिससे सब राक्षस
नष्ट हो गये । फिर राजा सिद्ध ने अग्नि नामक अस्त्र चलाया जिससे
सम्पूर्ण दिशाओं में अग्नि फैल गई और लोग जलने लगे । तब राजा
विदूरथ ने वरूणरूपी बाण चलाया जिससे जैसे सन्तों के सङ्ग से
अज्ञानी के तीनों ताप मिट जाते हैं वैसे ही अग्नि का ताप मिट गया ।
जल से सब स्थान पूर्ण हो गये और सिद्ध की बहुत सेना जल में बह गई।
तब सिद्ध ने शोषणमय अस्त्र चलाया जिससे सब जल सूख गया पर
कहीं कहीं कीचड़ रह गई । उसने फिर तेजोमय बाण चलाया जिससे
कीचड़ भी सूख गई और विदूरथ की सेना गरमी से व्याकुल होकर ऐसी
तपने लगी जैसे मूर्ख का हृदय क्रोध से जलता है। तब विदूरथ ने मेघ
नामक अस्त्र चलाया जिससे मेघ वर्षने लगे और शीतल मन्द मन्द वायु
चलने लगा जैसे आत्मा की ओर आये जीव का संसरना घटता जाता
है वैसे ही विदूरथ की सेना शीतल हुई । फिर सिद्ध ने वायुरूपी अस्त्र
चलाया जिससे सूखे पत्र की नाईं विदूरथ फिरने लगा । तब विदूरथ ने
पहाड़रूपी अस्त्र चलाया जिससे पहाड़ों की वर्षा होने लगी और वायु
का मार्ग रुक गया और वायु के क्षोभ मिट जाने से सब पदार्थ स्थिरभूत
हो गये । जेमे संवेदन मे रहित चित्त शान्त होता है वैसे ही सब शान्त