योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1027, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२१ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊
चिन्तामणि क्या है ? प्रथम जो तुमने सब त्याग किया था सो चिन्ता-
मणि थी और उसके निकट प्राप्त होकर तुम सुखी हुए थे । यदि उसको
तुम अपने पास रखते तो सब दुःख निवृत्त हो जाते । पर मणि का तो
तुमने निरादर किया, जो उसको त्यागा और काँच की मणि तप-
क्रिया को ग्रहण किया, इसलिए दरिद्री ही रहे । हे राजन् ! सर्वत्याग-
रूपी चिन्तामणि थी और इस क्रिया का आरम्भ काँच की मणि है ।
उसको तुमने ग्रहण किया है । इससे दरिद्री की निवृत्ति नहीं होती—
मनुष्य दुःखी ही रहता है । हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने नहीं किया,
और जो किया भी था, पर कुछ शेष रह गया और वह रहकर
फिर फैल गया । जैसे बड़ा बादल वायु से क्षीण हो जाता है और
सूक्ष्म रह जाता है, और पवन के लगने से फिर फैल जाता है
और सूर्य को छिपा लेता है । वह बादल क्या है, सूर्य क्या है और
थोड़ा रहना क्या है, यह भी सुनो । स्त्रियों और कुटुम्ब आदि को त्याग
कर इसमें अहंकार करना ही बड़ा बादल है । वैराग्यरूपी पवन से तुमने
राज्य और कुटुम्ब का अहंकार त्याग किया; पर देहादिक में अहंकार
सूक्ष्म बादल मा-रह गया था सो वह फिर बढ़ गया । तुमने जो अनात्म
में अभिमान करके क्रिया का आरम्भ किया, इससे आत्मारूपी सूर्य जो
अपना आप है, वह अहंकाररूपी बादल से ढक गया और ज्ञानरूपी
चिन्तामणि अज्ञानरूपी काँच की मणि से छिप गई ? जब ज्ञान से आत्मा
को जानोगे, तब आत्मा प्रकाशित होगा, अन्यथा न भासित होगा ।
जैसे कोई पुरुष घोड़े पर चढ़कर दौड़ता है तो उसकी वृत्ति घोड़े में
होती है, वैसे ही जिस पुरुष का आत्मा में दृढ़ निश्चय होता है, उसको
आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । हे राजन् ! आत्मा को पाना
सुगम है, जो सुख से ही मिलता है और उससे बड़े आनन्द की प्राप्ति
होती है । तप आदिक क्रियाएँ कष्ट से सिद्ध होती हैं, उनसे स्वरूप-
सुख की प्राप्ति नहीं होती ।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम मूर्ख नहीं, बल्कि शास्त्रों के ज्ञाता
और बहुत चतुर हो । तथापि तुम्हें स्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त हुई