यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
उपशम ३७१
महापुरुषों के पदचिह्न नहीं बताये गये, करके नहीं सिखाये गये, कल्याण की
व्यवस्था नहीं मिली तो वह स्थान गलत है। वहाँ आपको केवल रूढ़ि मिलेगी।
वहाँ जाने में आपका नुकसान है। व्यक्तिगत रूप से घर-घर, गली-गली
जाकर उपदेश पहुँचाने की अपेक्षा सामूहिक उपदेश केन्द्रों के रूप में इन
धार्मिक संस्थानों की स्थापना की गयी थी; किन्तु कालान्तर में इन प्रेरणास्थलियों
से ही मूर्तिपूजा तथा रूढ़ियों ने धर्म का स्थान ग्रहण कर लिया। यहीं से भ्रम
पनप गया।
ग्रन्थ- इसी प्रकार पुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है, जिससे आप
उस निर्दिष्ट क्रिया को समझ सकें, जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नियत कर्म कहा
है और जब समझ में आ जाय तो तुरन्त करने में लग जायँ। विस्मृत होने लगे
तो पुनः अध्ययन कर लें। यह नहीं कि पुस्तक को हाथ जोड़कर अक्षत, चन्दन
छिड़ककर रख दें। पुस्तक मार्ग-निर्देशक चिह्न है, जो पूर्तिपर्यन्त साथ देता है।
देखते हुए आगे बढ़ते चलें अपने गन्तव्य की ओर। जब इष्ट को हृदय से पकड़
लेंगे तो वह इष्ट ही पुस्तक बन जायेगा। अतः स्मृति सँजोना हानिकारक नहीं
है; किन्तु इन स्मृतिचिह्नों की पूजा से ही सन्तुष्ट हो जाना हानिकारक है।
धर्म- (अध्याय २/१६-२९) योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार असत्
वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। परमात्मा ही सत्य
है, शाश्वत है; अजर, अमर, अपरिवर्तनशील और सनातन है; किन्तु वह
परमात्मा अचिन्त्य और अगोचर है, चित्त की तरंगों से परे है। अब चित्त का
निरोध कैसे हो? चित्त का निरोध करके उस परमात्मा को पाने की विधि-
विशेष का नाम कर्म है। इस कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है, दायित्व है।
गीता (अध्याय २/४०) में है कि- अर्जुन! इस कर्मयोग में आरम्भ का
नाश नहीं है। इस कर्मरूपी धर्म का किंचिन्मात्र साधन जन्म-मृत्यु के महान्
भय से उद्धार करनेवाला होता है अर्थात् इस कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है।
इस नियत कर्म (साधन-पथ) को साधक के स्वभाव में उपलब्ध
क्षमता के अनुसार चार भागों में बाँटा गया है। कर्म को समझकर मनुष्य जबसे
आरम्भ करता है, उस आरम्भिक अवस्था में वह शूद्र है। क्रमशः विधि पकड़
३७२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
में आयी तो वही वैश्य है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता और शौर्य
आने पर वही व्यक्ति क्षत्रिय है और ब्रह्म के तद्रूप होने की क्षमता- ज्ञान
(वास्तविक जानकारी), विज्ञान (ईश्वरीय वाणी का मिलना), उस अस्तित्व
पर निर्भर रहने की क्षमता ऐसी योग्यताओं के आने पर वही ब्राह्मण है।
इसलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण (गीता, अध्याय १८/४६-४७ में) कहते हैं कि
स्वभाव में पायी जानेवाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगना स्वधर्म है। हल्का
होने पर भी स्वभाव से उपलब्ध स्वधर्म श्रेयतर है और क्षमता अर्जित किये
बिना ही दूसरों के उन्नत कर्म का परिपालन भी हानिकारक है। स्वधर्म में मरना
भी श्रेयस्कर है; क्योंकि वस्त्र बदलने से बदलनेवाला तो बदल नहीं जाता।
उसके साधन का क्रम वहीं से पुनः आरम्भ हो जायेगा, जहाँ से छूटा था।
सोपानशः चलकर वह परमसिद्धि अविनाशी पद को पा लेगा।
इसी पर पुनः बल देते हैं कि जिस परमात्मा से सभी प्राणियों की उत्पत्ति
हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, स्वभाव से उत्पन्न हुई क्षमता के अनुसार उसे
भलीभाँति पूजकर मानव परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् निश्चित
विधि से एक परमात्मा का चिन्तन ही धर्म है।
धर्म में प्रवेश किसको है? इसे करने का अधिकार किसे है? इसे स्पष्ट
करते हुए योगेश्वर ने बताया कि- “अर्जुन ! अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्य
भाव से मुझे भजता है (अनन्य अर्थात् अन्य न), मुझे छोड़कर अन्य किसी
को भी न भजकर केवल मुझे भजता है तो ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’- वह
शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, उसकी आत्मा धर्म से संयुक्त हो जाती है।” अतः
श्रीकृष्ण के अनुसार धर्मात्मा वह है, जो एक परमात्मा में अनन्य निष्ठा से लग
गया है। धर्मात्मा वह है, जो एक परमात्मा की प्राप्ति के लिये नियत कर्म का
आचरण करता है। धर्मात्मा वह है, जो स्वभाव से नियत क्षमता के अनुसार
परमात्मा की शोध में संलग्न है।
अन्त में कहते हैं कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’-
अर्जुन ! सारे धर्मों की चिन्ता छोड़कर एक मेरी शरण में हो जा। अतः एक
परमात्मा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही धार्मिक है। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर
करना ही धर्म है। उस एक परमात्मा की प्राप्ति की निश्चित क्रिया को करना
उपशम ३७३
धर्म है। इस स्थिति को प्राप्त महापुरुष, आत्मतृप्त महापुरुषों का सिद्धान्त ही
सृष्टि में एकमात्र धर्म है। उनकी शरण में जाना चाहिये कि उन महापुरुषों ने
कैसे उस परमात्मा को पाया? किस मार्ग से चले? वह मार्ग सदा एक ही है,
उस मार्ग से चलना धर्म है।
धर्म मनुष्य के आचरण की वस्तु है। वह आचरण केवल एक है-
'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।' (२/४१) इस कर्मयोग में
निश्चयात्मक क्रिया एक ही है- इन्द्रियों की चेष्टा और मन के व्यापार को
संयमित कर आत्मा में (परात्पर ब्रह्म में) प्रवाहित करना (४/२७)।
धर्मान्तरण- सनातन-धर्म के आदिदेश भारत में कुरीतियाँ यहाँ तक
पनपीं कि मुसलमानों के आक्रमण के समय उनका धर्म आक्रामकों के हाथ
का एक ग्रास चावल खाने से, दो घूँट पानी पीने से नष्ट होने लगा। धर्मभ्रष्ट
घोषित हजारों हिंदुओं ने आत्महत्या कर ली। धर्म के लिये वे मरना जानते थे,
लेकिन धर्म समझें तब तो। धर्म तो हो गया छुईमुई। छुईमुई का पौधा छूने पर
मुरझा जाता है, छूटते ही पनप जाता है; किन्तु उनका सनातन-धर्म तो ऐसा
मुरझाया कि कभी नहीं पनपा। जिस सनातन आत्मा को भौतिक वस्तुएँ स्पर्श
भी नहीं कर पातीं, वह कहीं छूने-खाने से नष्ट होता है? आप तलवार से मरें,
धर्म छूने से मर गया? क्या सचमुच धर्म नष्ट हुआ? कदापि नहीं। धर्म के नाम
पर कोई कुरीति पल रही थी, वह नष्ट हुई। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल
में बयाना के काजी मुगीसुद्दीन ने व्यवस्था दी कि यदि कोई मुसलमान थूकना
चाहता है तो हिन्दुओं को अपना मुँह खोल देना चाहिये। वह हिन्दू दीनदार हो
जायेगा; क्योंकि उसके पास कोई धर्म नहीं है। बुरा क्या कहा उसने? मुँह में
थूकने से तो एक ही मुसलमान बनता, कुएँ में थूकने से तो हजारों बन जाते थे।
वस्तुतः वह आततायी था या उस समय का हिन्दू समाज?
जिन्होंने इस प्रकार धर्म-परिवर्तन कर लिया, क्या कोई धर्म पा गये?
हिन्दू से मुसलमान बन जाना या एक प्रकार के रहन-सहन से दूसरे रहन-
सहन में चले जाना धर्म तो नहीं है। इस प्रकार योजनाबद्ध षड्यंत्र का शिकंजा
बनाकर जिन्होंने उन्हें बदला, क्या वे धर्मात्मा थे? वे तो और भी बड़ी कुरीतियों
के शिकार थे। हिन्दू उसी में जाकर फँस गये। अविकसित और गुमराह कबीलों
३७४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
को सभ्य बनाने के लिये मुहम्मद ने विवाह, तलाक, वसीयत, लेन-देन, सूद,
गवाही, कसम, प्रायश्चित, रोजी-रोटी, खान-पान, रहन-सहन इत्यादि विषय
में एक सामाजिक व्यवस्था दी तथा मूर्ति-पूजा, शिर्क, व्यभिचार, चोरी,
शराब, जुआ, माँ-दादी इत्यादि से विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया। समलैंगिक
तथा रजस्वला मैथुनों का निषेध करके रोजे के दिनों में भी इसके लिये ढील
दी। जन्नत में बहुत-सी समवयस्क, अनछुई हूरों और किशोर बालकों का
प्रलोभन दिया। यह कोई धर्म नहीं था, एक प्रकार की सामाजिक व्यवस्था थी।
ऐसा कुछ कहकर उन्होंने वासना में डूबे हुए समाज को उधर से घुमाकर
अपनी ओर उन्मुख किया। स्त्रियों को जन्नत में कितने पुरुष मिलेंगे?- इस पर
उन्होंने सोचा ही नहीं। यह उनका दोष नहीं, दोष उस देश-काल और परिस्थिति
का था, जिसमें स्त्रियों की आकांक्षाओं पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता था।
मुहम्मद साहब ने जिसे धर्म बताया, उधर किसी का ध्यान ही नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस पुरुष का एक भी श्वास उस खुदा के नाम के बगैर
खाली जाता है, उससे खुदा कयामत में वैसे ही पूछता है, जैसे किसी पापी से
पाप के बदले में पूछा जाय। जिसकी सजा है हमेशा-हमेशा के लिये दोज़ख।
कितने सच्चे मुसलमान हैं, जिनका एक भी श्वास खाली न जाता हो? करोड़ों
में कदाचित् ही कोई हो। शेष तो सभी के श्वास खाली ही जाते हैं, जिसकी
सजा वही है जो पापियों के लिये है। बताने की आवश्यकता नहीं, 'दोज़ख'।
मुहम्मद ने व्यवस्था दी कि जो किसी को नहीं सताता, पशुओं को ठेस नहीं
पहुँचाता, वह आकाश से खुदा की आवाज सुनता है। यह सभी स्थानों के लिये
था; किन्तु पीछेवालों ने एक रास्ता निकाल लिया कि मक्का में एक मस्जिद है,
जिसमें हरी घास नहीं तोड़नी चाहिये, उस मस्जिद में किसी पशु को नहीं
मारना चाहिये, वहाँ किसी को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिये और घूम-फिरकर वे
उसी दायरे में खड़े हो गये। क्या खुदा की आवाज सुनने से पहले मुहम्मद ने
कोई मस्जिद बनवायी थी? क्या कभी किसी मस्जिद में कोई आयत उतरी?
यह मस्जिद तो उनकी स्थली रही है, जिसमें उनकी यादगार सुरक्षित है।
मुहम्मद के आशय को तबरेज ने जाना था, मंसूर ने जाना था, इकबाल ने जाना
था; किन्तु वे मज़हबी लोगों के शिकार बने, उन्हें यातनाएँ दी गयीं। सुकरात
उपशम ३७५
को जहर पिलाया गया; क्योंकि वह लोगों को नास्तिक बना रहा था। ऐसा ही
आरोप ईसा पर भी लगाया गया, उन्हें सूली दी गयी; क्योंकि वे विश्राम
सब्वाथ के दिन भी काम करते थे, अन्धों को दृष्टि प्रदान करते थे। ऐसा ही
भारत में भी है। जब भी कोई प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष सत्य की ओर इंगित करता
है तो इन मन्दिर, मस्जिद, मठ, सम्प्रदाय और तीर्थों से जिनकी जीविका
चलती है, हाय-हाय करने लगते हैं, अधर्म-अधर्म चिल्लाने लगते हैं। किसी
को इनसे लाखों-करोड़ों की आय है, तो किसी की दाल-रोटी ही चलती है।
वास्तविकता के प्रचार से उनकी जीविका को खतरा दिखायी पड़ता है। वे
सत्य को पनपने नहीं देते और न दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त उनके विरोध का
कोई कारण नहीं है। सुदूरकाल में यह स्मृति क्यों सँजोयी गयी थी, इसका उन्हें
भान नहीं है।
गृहस्थों का अधिकार- प्रायः लोग पूछते हैं कि जब कर्म का यही
स्वरूप है, जिसमें एकान्त-देश का सेवन, इन्द्रिय-संयम, निरन्तर चिन्तन और
ध्यान करना है, तब तो गीता गृहस्थों के लिये अनुपयोगी है। तब तो गीता
केवल साधुओं के लिये है। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं है। गीता मूलतः उसके
लिये है, जो इस पथ का पथिक है और अंशतः उसके लिये भी है, जो इस पथ
का पथिक बनना चाहता है। गीता मानवमात्र के लिये समान आशय रखती है।
सद्गृहस्थों के लिये तो इसका विशेष उपयोग है; क्योंकि वहीं से कर्म आरम्भ
होता है।
श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का कभी
नाश नहीं होता। इसका थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार
कराके ही छोड़ता है। आप ही बतायें, थोड़ा साधन कौन करेगा-गृहस्थ अथवा
विरक्त? गृहस्थ ही इसके लिये थोड़ा समय देगा, यह उसके लिये ही है।
अध्याय ४/३६ में कहा- अर्जुन! यदि तू सम्पूर्ण पापियों से भी अधिक पाप
करनेवाला है, तब भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह पार हो जायेगा। अधिक
पापी कौन है- जो अनवरत लगा है वह अथवा जो अभी लगना चाहता है?
अतः सद्गृहस्थ आश्रम से ही कर्म का आरम्भ है। अध्याय ६/३७ में अर्जुन ने
पूछा- भगवन्! शिथिल प्रयत्नवाला श्रद्धावान् पुरुष परमगति को न पाकर
३७६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
किस दुर्गति को प्राप्त होता है? श्रीकृष्ण ने कहा (अध्याय ६/४०-४५)-
अर्जुन ! योग से चलायमान हुए शिथिल प्रयत्नवाले पुरुष का कभी विनाश नहीं
होता। वह योगभ्रष्ट श्रीमानों [‘शुचीनाम्’- शुद्ध (सत्य) आचरणवाले ही
श्रीमान हैं।] के यहाँ जन्म लेकर योगी-कुल में प्रवेश पा जाता है, साधन की
ओर आकर्षित होता है और अनेक जन्मों में चलकर वहीं पहुँच जाता है,
जिसका नाम परमगति अर्थात् परमधाम है। यह शिथिल प्रयत्न कौन करता है?
योगभ्रष्ट होकर वह कहाँ जन्म लेता है? गृहस्थ ही तो बना। वहीं से वह
साधनोन्मुख होता है। अध्याय ९/३० में उन्होंने कहा- अत्यन्त दुराचारी भी
यदि अनन्यभाव से मुझे भजने लगे तो वह साधु ही है; क्योंकि वह निश्चय के
साथ सही रास्ते पर लग गया है। अत्यन्त दुराचारी कौन होगा- जो भजन में
प्रवृत्त हो गया वह अथवा वह, जिसने अभी आरम्भ ही नहीं किया? अध्याय
९/३२ में कहा- स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनिवाले ही क्यों न हों, मेरे आश्रित
होकर साधन करने से परमगति पाते हैं। हिन्दू हो, ईसाई हो, मुसलमान हो-
श्रीकृष्ण ऐसा कुछ नहीं कहते, अत्यन्त दुराचारी पातकी ही क्यों न हों, मेरी
शरण होकर परमगति पाते हैं। अतः गीता मानवमात्र के लिये है। सद्गृहस्थ
आश्रम से ही इस कर्म का आरम्भ है। क्रमशः वही सद्गृहस्थ योगी बनता है,
पूर्ण त्यागी हो जाता है और तत्त्व का दिग्दर्शन कर परम में प्रवेश पा जाता है,
जिसे श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी मेरा स्वरूप है।
स्त्री- गीता के अनुसार शरीर एक वस्त्र है। जैसे पुराने वस्त्र को त्यागकर
मनुष्य नया वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक इसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी
आत्मा इस शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर दूसरा शरीर (वस्त्र) धारण कर लेता
है। आप पिण्डरूप में स्त्री हों या पुरुष, ये वस्त्र के आकार हैं।
संसार में पुरुष दो प्रकार का है- क्षर और अक्षर। समस्त प्राणियों का
शरीर क्षर पुरुष अथवा परिवर्तनशील पुरुष है। मनसहित इन्द्रियाँ जब कूटस्थ
हो जाती हैं, तब वही अक्षर पुरुष है। उसका कभी विनाश नहीं होता। यह
भजन की अवस्था है।
स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, तो कभी अपमान की भावना समाज में
बनी ही रहती है; किन्तु गीता की अपौरुषेय वाणी में यह है कि शूद्र (अल्पज्ञ),
उपशम ३७७
वैश्य (विधिप्राप्त), स्त्री-पुरुष कोई क्यों न हो, मेरी शरण आकर परमगति को
प्राप्त होता है। अतः इस कल्याण-पथ में स्त्रियों का वही स्थान है, जो एक
पुरुष का है।
भौतिक समृद्धि- गीता परमकल्याण तो देती है, साथ ही मनुष्यों के
लिये आवश्यक भौतिक वस्तुओं का भी विधान करती है। अध्याय ९/२०-२२
में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि बहुत से लोग निर्धारित विधि से मुझे पूजकर
बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं। उन्हें विशाल स्वर्गलोक मिलता है, मैं देता
हूँ। जो माँगोगे, वह मुझसे मिलेगा; किन्तु उपभोग के पश्चात् समाप्त हो
जायेगा, क्योंकि स्वर्ग के भोग भी नश्वर हैं। उन्हें पुनः जन्म लेना पड़ेगा। हाँ,
मुझसे सम्बन्धित होने के कारण वे नष्ट नहीं होते; क्योंकि मैं कल्याणस्वरूप
हूँ। मैं उन्हें भोग देता हूँ और शनैः-शनैः निवृत्त कराकर पुनः उन्हें कल्याण में
लगा देता हूँ।
क्षेत्र- जिन परमात्मा के श्रीमुख की वाणी यह गीता है उन्होंने स्वयं
परिचय दिया, ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’- अर्जुन ! यह शरीर
ही क्षेत्र (खेत) है, जिसमें बोया गया भला और बुरा कर्मबीज संस्काररूप में
जमता है और कालान्तर में सुख-दुःख का रूप लेकर भोग के रूप में मिलता
है। आसुरी सम्पद् अधम योनियों में ले जाने के लिये है, जबकि दैवी सम्पद्
परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलाती है। सद्गुरु के सान्निध्य में इनमें निर्णायक
युद्ध का आरंभ होता है, यही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है।
कुछेक टीकाकार कहते हैं- एक कुरुक्षेत्र बाहर है और दूसरा मन के
भीतर है। गीता का एक अर्थ बाहरी है, दूसरा भीतरी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं
है। वक्ता एक बात कहता है; किन्तु श्रोता अपनी बुद्धि के अनुरूप ही उसे
पकड़ पाते हैं, इसीलिये अनेक अर्थ प्रतीत होते हैं। साधन-पथ पर क्रमशः
चलकर जो भी पुरुष श्रीकृष्ण के स्तर पर खड़ा हो जायेगा, तो जो दृश्य
श्रीकृष्ण के सामने था, वही उसके सामने भी होगा। वही महापुरुष उनके
मनोगत भावों को, गीता के संकेतों को समझ सकता है, समझा सकता है।
गीता का एक भी श्लोक बाहर का चित्रण नहीं करता। खाना, पहनना,
रहना आप जानते ही हैं। रहन-सहन, मान्यता, लोकरीति-नीति में देश-काल
३७८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
और परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तन प्रकृति की देन है। इसमें श्रीकृष्ण
आपको कौन-सी व्यवस्था दें? कहीं लड़कियों का बाहुल्य है, बहु विवाह होते
हैं, तो कहीं उनकी संख्या कम है। कहीं कई भाइयों के बीच एक पत्नी रह लेती
है- इसमें श्रीकृष्ण कौन-सी व्यवस्था दें। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान
में जनसंख्या की कमी समस्या बन गयी तो तीस बच्चों को जन्म देने वाली
एक महिला को मदरलैंड (देश की माता) की उपाधि से सम्मानित किया
गया। वैदिककालीन भारत में पहले दस सन्तान उत्पन्न करने का विधान था,
अब 'एक या दो बच्चे, होते हैं घर में अच्छे' का नारा लग रहा है। कदाचित्
वे न रहें तो देश के लिए चिन्ता का विषय नहीं, समस्या का हल ही होता है।
श्रीकृष्ण इसमें कौन-सी व्यवस्था दें?
श्रेय- काम, क्रोध, लोभ, मोह के कहीं स्कूल नहीं खुले हैं, फिर भी
इन विकारों में लड़के बड़े तथा सयानों से कहीं अधिक प्रवीण निकलते हैं।
इसमें श्रीकृष्ण क्या शिक्षा दें? यह सब तो प्रकृति द्वारा स्वचालित हैं। कभी वेद
पढ़ाये जाते थे, धनुर्वेद-गदायुद्ध सिखाया जाता था, आज इन्हें कौन सीखता
है? आज तो पिस्टल चला रहे हैं। स्वचालित यन्त्रों का युग है। कभी रथ-
संचालन सीखना पड़ता था, घोड़ों की लीद फेंकनी पड़ती थी; आज मोटरों का
तेल साफ किया जाता है। इसमें श्रीकृष्ण क्या बतायें? कह दें कि घोड़ों को ऐसे
मत मलो ! बाहर आपको कैसी व्यवस्था दें? पहले स्वाहा बोलने से वर्षा होती
थी, आज मनचाही फसल लेने लगे हैं। योगेश्वर कहते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न
गुणों द्वारा परवश होकर मनुष्य परिस्थिति के अनुसार ढलता ही रहता है। गुण
स्वतः उन्हें ढालने में सक्षम हैं। भौतिकशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, अर्थशास्त्र,
तर्कशास्त्र वह गढ़ता ही रहता है। एक ही वस्तु ऐसी है जो मनुष्य नहीं जानता,
नहीं पहचानता। जो है तो उसी के पास किन्तु उसे विस्मृत है। गीता सुनकर
अर्जुन की वही स्मृति लौट आयी थी। वह स्मृति है परमात्मा की, जो हृदय-
देश में होकर भी उससे बहुत दूर है। उसी को मनुष्य पाना चाहता है; किन्तु
रास्ता नहीं पाता। केवल कल्याण-पथ से ही मनुष्य अनभिज्ञ है। मोह का
आवरण इतना घना है कि उधर सोचने का समय ही नहीं मिलता। उन
महापुरुष ने आपके लिये समय दिया है, उस कर्म को स्पष्ट किया है, जिसे
उपशम ३७९
करने का निर्देश गीता में है। गीता मुख्यतः यही देती है। भौतिक वस्तुएँ भी
उससे मिलती हैं; किन्तु श्रेय की तुलना में प्रेय नगण्य हैं।
योग-प्रदाता- योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार कल्याण-पथ की जानकारी,
उसका साधन और उसकी प्राप्ति सद्गुरु से होती है। इधर-उधर तीर्थों में बहुत
भटकने या बहुत परिश्रम से यह तब तक नहीं मिलता, जब तक किसी सन्त
द्वारा न प्राप्त किया जाय। अध्याय ४/३४ में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तू
किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर, भली प्रकार दण्ड-प्रणाम कर,
निष्कपट भाव से सेवा करके, प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त कर। प्राप्ति का
एकमात्र उपाय है, किसी महापुरुष का सान्निध्य और उनकी सेवा। उनके
अनुसार चलकर योग की संसिद्धिकाल में पायेगा। अध्याय १८/१८ में उन्होंने
बताया कि परिज्ञाता अर्थात् तत्त्वदर्शी महापुरुष, ज्ञान अर्थात् जानने की विधि
और ज्ञेय परमात्मा- तीनों कर्म के प्रेरक हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार महापुरुष
ही कर्म के माध्यम हैं, न कि केवल पुस्तक। किताब तो एक नुस्खा है। नुस्खा
रटने से कोई नीरोग नहीं होता बल्कि उसे अमल में लाना है।
नरक- अध्याय १६/१६ में आसुरी सम्पद् का वर्णन करते हुए योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने बताया कि अनेक प्रकार से भ्रमित चित्तवाले, मोह में फँसे आसुरी
स्वभाववाले मनुष्य अपवित्र नरक में गिरते हैं। प्रश्न स्वाभाविक है कि नरक
है कैसा और किसे कहते हैं? इसी क्रम में स्पष्ट करते हैं कि मुझसे द्वेष
रखनेवाले नराधमों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ, अजस्र
आसुरी योनियों में गिराता हूँ। यही नरक है। इस नरक का द्वार क्या है? उन्होंने
बताया कि काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं, जिनमें आसुरी सम्पद्
गठित होती है। अतः बारम्बार कीट-पतंग, पशु इत्यादि योनियों में आना ही
नरक है।
पिण्डदान- प्रथम अध्याय में विषादग्रस्त अर्जुन को आशंका थी कि
युद्धजनित नरसंहार से पितर लोग पिण्डदान और तर्पण से वंचित हो जायेंगे,
पितर गिर जायेंगे। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तुझे यह अज्ञान
कहाँ से हो गया? पिण्डोदक क्रिया को योगेश्वर ने अज्ञान कहा और बताया कि
जिस प्रकार जीर्ण-शीर्ण वस्त्र को त्यागकर मनुष्य नया वस्त्र धारण कर लेता
३८० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
है, ठीक इसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर तत्काल शरीररूपी
नवीन वस्त्र को ग्रहण कर लेता है। यहाँ शरीर मात्र एक वस्त्र है और जब
आत्मा ने केवल वस्त्र बदला, वह मरा नहीं, नश्वर शरीर को ही बदला है,
उसकी व्यवस्थाएँ पूर्ववत् हैं तो इस भोजन (पिण्डदान), आसन, शय्या,
सवारी, आवास या जल इत्यादि से किसे तृप्त किया जाता है? यही कारण है
कि योगेश्वर ने इसे अज्ञान कहा। अध्याय १५/७ में इसी पर बल देते हुए
कहते हैं कि यह आत्मा मेरा सनातन अंश है, स्वरूप है और मन तथा पाँचों
इन्द्रियों के कार्य-कलापजन्य संस्कार को लेकर दूसरे शरीर को धारण कर
लेता है और मनसहित षट् इन्द्रियों के द्वारा अगले शरीर में विषय-भोगों को
भोगता है। आत्मा ने जिस शरीर को धारण किया, वहाँ भी भोग-सामग्री
उपलब्ध है, फिर पिण्डदान क्यों दिया जाता है?
इधर एक शरीर को छोड़ा, उधर दूसरे शरीर को धारण किया। वह
सीधा उस शरीर में जाता है। बीच में कोई विराम नहीं, कोई स्थान नहीं तो
हजारों पीढ़ियों के पितरों का अनादिकाल से पड़े रहना और उनकी जीविका
वंश-परम्परा के हाथ निर्धारित करना तथा पिंजड़े के पक्षी की तरह उनका
रुदन, पतन एक अज्ञान मात्र है। इसीलिये श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान कहा।
पाप और पुण्य- इस प्रश्न पर समाज में अनेक भ्रान्तियाँ हैं; किन्तु
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार रजोगुण से उत्पन्न यह काम और क्रोध भोगों से
कभी तृप्त न होनेवाले महान् पापी हैं। अर्थात् काम ही एकमात्र पापी है। पाप
का उद्गम काम है, कामनाएँ हैं। ये कामनाएँ रहती कहाँ हैं? श्रीकृष्ण ने
बताया कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। जब विकार
तन में नहीं, मन में ही होते हैं तो शरीर धोने से क्या होगा?
श्रीकृष्ण के अनुसार इस मन की शुद्धि होती है नाम-जप से, ध्यान से,
समकालीन किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की सेवा से, उनके प्रति समर्पण से,
जिसके लिये वे ४/३४ में प्रोत्साहित करते हैं कि 'तद्विद्धि प्रणिपातेन'-सेवा
और प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त करो, जिससे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अध्याय ३/१३ में उन्होंने कहा कि यज्ञ से शेष बचे अन्न को खानेवाले
सन्तजन सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं और जो शरीर के लिये कामना करते हैं,
उपशम ३८१
वे पापी पाप ही खाते हैं। यहाँ यज्ञ चिन्तन की एक निश्चित क्रिया है, जिससे
मन में निहित चराचर जगत् के संस्कार जल जाते हैं। शेष केवल ब्रह्म ही
बचता है। अतः शरीर के जन्म का जो कारण है, वही पाप है और जो उस
अमृत-तत्त्व को दिलानेवाला है, जिसके पश्चात् कभी शरीर धारण न करना
पड़े, वही पुण्य है।
अध्याय ७/२९ में वे कहते हैं- मेरी शरण होकर जरा-मरण और दोषों
से छूटने के लिये यत्न करनेवाले पुण्यकर्मी जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया
है, वे सम्पूर्ण ब्रह्म को, सम्पूर्ण कर्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को तथा भली प्रकार
मुझे जानते हैं और मुझे जानकर मुझमें ही स्थित रहते हैं। अतः पुण्यकर्म वह
है जो जरा, मरण और दोषों से ऊपर उठाकर शाश्वत की जानकारी और उसी
में सदा के लिये स्थिति दिलाता है। और जो जन्म-मृत्यु, जरा-मरण, दुःख-
दोषों की परिधि में घुमाकर रखता है, वही पापकर्म है।
अध्याय १०/३ में कहते हैं- जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त
से रहित सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है,
वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान् है और ऐसा जाननेवाला सम्पूर्ण पापों
से मुक्त हो जाता है। अतः साक्षात्कार के साथ ही सम्पूर्ण पापों से निवृत्ति
मिलती है।
सारांशतः बार-बार जन्म-मृत्यु का कारण ही पाप है और जो उससे
बचाकर शाश्वत परमात्मा की ओर घुमा दे, परमशान्ति की प्राप्ति करा दे, वही
पुण्यकर्म है। सच बोलना, केवल अपने परिश्रम का खाना, स्त्रियों में मातृ-
भाव, ईमानदारी इत्यादि भी इस पुण्यकर्म के सहायक अंग हैं; किन्तु सर्वोत्कृष्ट
पुण्य है परमात्मा की प्राप्ति। जो मात्र एक परमात्मा की श्रद्धा को तोड़ता है,
वह पाप है।
सन्त सब एक- गीता, अध्याय ४/१ में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया-
इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में मैंने सूर्य के प्रति कहा था। किन्तु
श्रीकृष्ण के पूर्वकालीन इतिहास अथवा अन्य किसी भी शास्त्र में कृष्ण-नाम
का उल्लेख नहीं मिलता।
३८२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
वास्तव में श्रीकृष्ण एक पूर्ण योगेश्वर हैं। वे एक अव्यक्त और अविनाशी
भाव की स्थिति के हैं। जब कभी परमात्मा से मिलानेवाली क्रिया अर्थात् योग
का सूत्रपात किया गया तो इसी स्थितिवाले किसी महापुरुष ने किया, चाहे वह
राम हों या ऋषि जरथुस्त्र ही क्यों न रहे हों। परवर्तीकाल में यही उपदेश ईसा,
मुहम्मद, गुरुनानक इत्यादि जिस किसी के द्वारा निकला, कहा श्रीकृष्ण ने ही।
अतः सभी महापुरुष एक ही हैं। सब-के-सब एक ही बिन्दु का स्पर्श
कर एक ही स्वरूप को पाते हैं। यह पद एक इकाई है। अनेक पुरुष इस पथ
पर चलेंगे; लेकिन जब पायेंगे, एक ही पद को पायेंगे। ऐसी अवस्था को प्राप्त
सन्त का शरीर एक मकान मात्र रह जाता है। वे शुद्ध आत्मस्वरूप हैं। ऐसी
स्थितिवालों ने कभी कुछ कहा, तो एक योगेश्वर ने ही कहा।
सन्त कहीं-न-कहीं तो जन्म लेता ही है। पूरब अथवा पश्चिम में,
श्याम अथवा श्वेत परिवार में, पूर्वप्रचलित किन्हीं धर्मावलम्बियों के बीच
अथवा अबोध कबीलों में, सामान्य जीवन जीनेवाले गरीब अथवा अमीरों में
जन्म लेकर भी सन्त उनकी परम्परावाला नहीं होता। वह तो अपने लक्ष्य
परमात्मा को पकड़कर स्वरूप की ओर अग्रसर हो जाता है, वही हो जाता है।
उसके उपदेशों में जाति-पाँति, वर्गभेद और अमीर-गरीब की दीवारें नहीं रहती
हैं। यहाँ तक कि उसकी दृष्टि में नर-मादा का भेद भी नहीं रह जाता (देखें,
गीता, १५/१६- द्वाविमौ पुरुषौ लोके)।
महापुरुषों के पश्चात् उनके अनुयायी अपना सम्प्रदाय बनाकर संकुचित
हो जाते हैं। किसी महापुरुष के पीछे चलनेवाले यहूदी हो जाते हैं, तो किसी के
अनुयायी ईसाई, मुसलमान, सनातनी इत्यादि हो जाते हैं; किन्तु इन दीवारों से
सन्त का सम्बन्ध कदापि नहीं होता। सन्त न तो कोई साम्प्रदायिक है और न
कोई जाति। सन्त सन्त हैं, उन्हें किसी सामाजिक संगठन में न समेटें।
अतः संसार भर के सन्तों की, चाहे किसी कबीले में उनका जन्म हुआ
है, चाहे किसी मज़हब सम्प्रदाय वाले उनका पूजन अधिक करते हों, किसी
साम्प्रदायिक प्रभाव में आकर ऐसे सन्तों की आलोचना नहीं करनी चाहिये;
क्योंकि वे निरपेक्ष हैं। संसार के किसी भी स्थान में उत्पन्न सन्त निन्दा के योग्य
उपशम ३८३
नहीं होता। यदि कोई ऐसा करता है तो वह अपने अन्दर स्थित अन्तर्यामी
परमात्मा को दुर्बल करता है, अपने परमात्मा से दूरी पैदा कर लेता है, स्वयं
अपनी क्षति करता है। संसार में जन्म लेनेवालों में यदि आपका कोई सच्चा
हितैषी है तो सन्त ही। अतः उनके प्रति सहृदय रहना संसार भर के लोगों का
मूल कर्त्तव्य है। इससे वंचित होना अपने को धोखा देना है।
वेद- गीता में वेद का वर्णन बहुत आया है; किन्तु कुल मिलाकर वेद
मार्ग-निर्देशक (Mile Stone) चिह्न मात्र हैं। मंजिल तक पहुँच जाने पर उस
व्यक्ति के लिये उनका उपयोग समाप्त हो जाता है। अध्याय २/४५ में श्रीकृष्ण
ने कहा- अर्जुन! वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश कर पाते हैं, तू वेदों के
कार्यक्षेत्र से ऊपर उठ। अध्याय २/४६ में कहा- सब ओर से परिपूर्ण स्वच्छ
जलाशय प्राप्त होने पर छोटे जलाशय से मनुष्य का जितना प्रयोजन रह जाता
है, अच्छी प्रकार ब्रह्म के ज्ञाता महापुरुष अर्थात् ब्राह्मण का वेदों से उतना ही
प्रयोजन रह जाता है; किन्तु दूसरों के लिये तो उनका उपयोग है ही। अध्याय
८/२८ में कहा- अर्जुन! मुझे तत्त्व से भलीभाँति जान लेने पर योगी वेद, यज्ञ,
तप, दान इत्यादि के पुण्यफलों को पार कर सनातन पद को प्राप्त हो जाता है।
अर्थात् जब तक वेद जीवित हैं, यज्ञ करना शेष है, तब तक सनातन पद की
प्राप्ति नहीं है। अध्याय १५/१ में बताया- ऊपर परमात्मा ही जिसका मूल है,
नीचे कीट-पतंगपर्यन्त प्रकृति जिसकी शाखा-प्रशाखा है, संसार ऐसा पीपल
का एक अविनाशी वृक्ष है। जो इसे मूलसहित जानता है, वह वेद का ज्ञाता है।
इस जानकारी का स्रोत महापुरुष हैं, उनके द्वारा निर्दिष्ट भजन है। पुस्तक या
पाठशाला भी उन्हीं की ओर प्रेरित करते हैं।
ओम्- श्रीकृष्ण के निर्देशन में ॐ के जप का विधान पाया जाता है।
अध्याय ७/८- ओंकार मैं हूँ। ८/१३- ॐ का जप कर और मेरा चिन्तन कर।
अध्याय ९/१७- जानने योग्य पवित्र ओंकार मैं हूँ। अध्याय १०/३३- अक्षरों
में 'अकार' हूँ। १०/२५- वचनों में एक अक्षर मैं हूँ। अध्याय १७/२३- ॐ,
तत् और सत् ब्रह्म का परिचायक है। १७/२४- यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ
ॐ से ही प्रारम्भ होती हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार ॐ का जप नितान्त
आवश्यक है, जिसकी विधि किसी अनुभवी महापुरुष से सीखें।
३८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
गीतोक्त ज्ञान ही विशुद्ध मनुस्मृति- गीता आदिमानव महाराज
मनु से भी पूर्व प्रकट हुई है- 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।'
(४/१) अर्जुन ! इस अविनाशी योग को मैंने कल्प के आदि में सूर्य से कहा
तथा सूर्य ने मनु से कहा। मनु ने उसे श्रवण कर अपनी याददाश्त में धारण
किया; क्योंकि श्रवण की गयी वस्तु मन की स्मृति में ही रखी जा सकती है।
इसी को मनु ने राजा इक्ष्वाकु से कहा। इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना और इस
महत्त्वपूर्ण काल से यह अविनाशी योग इसी पृथ्वी में लुप्त हो गया। आरम्भ
में कहने और श्रवण करने की परम्परा थी। लिखा भी जा सकता है- ऐसी
कल्पना नहीं थी। मनु महाराज ने इसे मानसिक स्मृति में धारण किया तथा
स्मृति की परम्परा दी। इसलिये यह गीतोक्त ज्ञान ही विशुद्ध मनुस्मृति है।
भगवान ने यह ज्ञान मनु से भी पूर्व सूर्य से कहा तो इसे 'सूर्यस्मृति' क्यों
नहीं कहते? वस्तुतः सूर्य ज्योतिर्मय परमात्मा का वह अंश है जिससे इस
मानव सृष्टि का सृजन हुआ। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं ही परम चेतन
बीजरूप से पिता हूँ, प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माँ है।" वह बीजरूप पिता
सूर्य है। सूर्य परमात्मा की वह प्रशक्ति है जिसने मानव की संरचना की। वह
कोई व्यक्ति नहीं और जहाँ परमात्मा के उस ज्योतिर्मय तेज से मानव की
उत्पत्ति हुई, उस तेज में वह गीतोक्त ज्ञान भी प्रसारित किया अर्थात् सूर्य से
कहा। सूर्य ने आदि मनु से कहा इसलिये यह अविनाशी योग ही 'मनुस्मृति' है।
सूर्य कोई व्यक्ति नहीं, बीज है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन ! वही पुरातन योग मैं तेरे लिये कहने
जा रहा हूँ। तू प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है। अर्जुन मेधावी थे, सच्चे अधिकारी
थे। उन्होंने प्रश्न-परिप्रश्नों की श्रृंखला खड़ी कर दी कि- आपका जन्म तो
अब हुआ है और सूर्य का जन्म बहुत पहले हुआ है। इसे आपने ही सूर्य से
कहा, यह मैं कैसे मान लूँ? इस प्रकार बीस-पच्चीस प्रश्न उन्होंने किये। गीता
के समापन तक उनके सम्पूर्ण प्रश्न समाप्त हो गये, तब भगवान ने, जो प्रश्न
अर्जुन नहीं कर सकते थे, जो उनके हित में थे, उन्हें स्वयं उठाया और
समाधान दिया। अन्ततः भगवान ने कहा- अर्जुन ! क्या तुमने मेरे उपदेश को
उपशम ३८५
एकाग्रचित्त हो श्रवण किया? क्या मोह से उत्पन्न तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ?
अर्जुन ने कहा-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। ( १८/७३ )
भगवन्! मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ। केवल सुना
भर नहीं अपितु स्मृति में धारण कर लिया है। मैं आपके आदेश का पालन
करूँगा, युद्ध करूँगा। उन्होंने धनुष उठा लिया, युद्ध हुआ, विजय प्राप्त की,
एक विशुद्ध धर्म-साम्राज्य की स्थापना हुई और एक धर्मशास्त्र के रूप में वही
आदि धर्मशास्त्र गीता पुनः प्रसारण में आ गयी।
गीता आपका आदि धर्मशास्त्र है। यही मनुस्मृति है, जिसे अर्जुन ने
अपनी स्मृति में धारण किया था। मनु के समक्ष दो कृतियों का उल्लेख है-
एक तो सूर्य से उपलब्ध गीता, दूसरे वेद मनु के समक्ष उतरे। तीसरी कोई कृति
मनु के समय में प्रकट नहीं हुई थी। उस समय लिखने-लिखाने का प्रचलन
नहीं था, कागज-कलम का प्रचलन नहीं था इसलिये ज्ञान को श्रुत अर्थात्
सुनने और स्मृति-पटल पर धारण करने की परम्परा थी। जिनसे मानवों का
प्रादुर्भाव हुआ, सृष्टि के प्रथम मानव उन मनु महाराज ने वेद को श्रुति तथा
गीता को स्मृति का सम्मान दिया।
वेद मनु के समक्ष उतरे थे, इन्हें सुनें, यह सुनने योग्य हैं; किन्तु गीता
स्मृति है, सदा स्मरण रखें। यह हर मानव को सदा रहनेवाला जीवन, सदा
रहनेवाली शान्ति और सदा रहनेवाली समृद्धि, ऐश्वर्यसम्पन्न जीवन प्राप्त
करानेवाला ईश्वरीय गायन है।
भगवान ने कहा- अर्जुन! यदि तू अहंकारवश मेरे उपदेश को नहीं
सुनेगा तो विनष्ट हो जायेगा अर्थात् गीता के उपदेशों की अवहेलना करनेवाला
नष्ट हो जाता है। अध्याय पन्द्रह के अन्तिम श्लोक (१५/२०) में भगवान ने
कहा, ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।’- यह गोपनीय से भी अति
गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर तू समस्त ज्ञान और
परमश्रेय की प्राप्ति कर लेगा। अध्याय सोलह के अन्तिम दो श्लोकों में कहा-
३८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।’ इस शास्त्रविधि को त्यागकर,
कामनाओं से प्रेरित होकर अन्य विधियों से जो भजते हैं उनके जीवन में न
सुख है, न समृद्धि है और न परमगति ही है।
‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।’ इसलिये अर्जुन!
तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में यह शास्त्र ही प्रमाण है। इसको
भली प्रकार अध्ययन कर, तत्पश्चात् आचरण कर। तुम मुझमें निवास करोगे,
अविनाशी पद प्राप्त कर लोगे। सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति
और समृद्धि पा लोगे।
गीता मनुस्मृति है और भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार गीता ही धर्मशास्त्र
है। अन्य कोई शास्त्र नहीं, कोई अन्य स्मृति नहीं है। समाज में प्रचलित
अनेकानेक स्मृतियाँ गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम हैं। स्मृतियाँ
कतिपय राजाओं के संरक्षण में प्रशासन चलाने के लिये लिखी गयीं, जिनसे
समाज में ऊँच-नीच की दीवारें सृजित हो गयीं। मनु के नाम पर प्रचारित तथा
कथित मनुस्मृति में मनुकालीन वातावरण का चित्रण नहीं है। मूल मनुस्मृति
गीता एक परमात्मा को ही सत्य मानती है, उसमें विलय दिलाती है; किन्तु
वर्तमान काल में प्रचलित लगभग १६४ स्मृतियाँ परमात्मा का नाम तक नहीं
लेतीं, न परमात्मा की प्राप्ति के उपायों पर प्रकाश डालती हैं। वे केवल स्वर्ग
के आरक्षण तक ही सीमित रहकर ‘न अस्ति’- जो है नहीं, उन्हीं को ही
प्रोत्साहन देती हैं। मोक्ष का उनमें उल्लेख तक नहीं है।
महापुरुष- महापुरुष बाह्य तथा आन्तरिक, व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक,
लोक-रीति और यथार्थ वेद-रीति दोनों की जानकारी रखता है। यही कारण है
कि समस्त समाज को महापुरुषों ने रहन-सहन का विधान बताया और एक
मर्यादित व्यवस्था दी। वशिष्ठ, विश्वामित्र, स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण, महावीर
स्वामी, महात्मा बुद्ध, मूसा, ईसा, मुहम्मद, रामदास, दयानन्द, गुरु गोविन्द
सिंह इत्यादि सहस्रों महापुरुषों ने ऐसा किया; किन्तु व्यवस्थाएँ सामयिक होती
हैं। पीड़ित समाज को भौतिक वस्तु प्रदान करना यथार्थ नहीं है। भौतिक
उलझनें क्षणिक हैं शाश्वत नहीं, इसलिये उनका हल भी तत्सामयिक होता है।
उन्हें चिरंतन व्यवस्था के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता।
उपशम ३८७
व्यवस्थाकार- सामाजिक विकृतियों को महापुरुष सुलझाया करते हैं।
यदि इन्हें न सुलझाया जाय तो ज्ञान-वैराग्यजनित परम की साधना कौन
सुनेगा? व्यक्ति जिस वातावरण मे फँसा है, उसे वहाँ से हटाकर यथार्थ को
जानने की स्थिति में लाने के लिये अनेकानेक प्रलोभन दिये जाते हैं। एतदर्थ
महापुरुष जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, कोई व्यवस्था देते हैं, वह धर्म नहीं
है। उससे सौ-दो सौ साल की व्यवस्था मिलती है, चार-छः सौ साल के लिये
उदाहरण बन जाता है और हजार दो हजार वर्ष में वह सामाजिक आविष्कार
नवीन परिस्थितियों के साथ-साथ निष्प्राण हो जाता है। गुरु गोविन्द सिंह की
सामाजिक व्यवस्था में शस्त्र अनिवार्य था। क्या अब उस तलवार का शस्त्र के
स्थान पर औचित्य है? ईसा गदहे पर बैठते थे। (मत्ती, २१) गदहे के सम्बन्ध
में उनकी दी हुई व्यवस्थाओं का आज क्या उपयोग है? कहा- किसी का गधा
मत चुराओ। आज गधा कौन पालता है? इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उस
समय के समाज को सम्यक् व्यवस्थित किया, जिसका उल्लेख महाभारत,
भागवत इत्यादि ग्रन्थों में है, साथ ही इन ग्रन्थों में उन्होंने यथार्थ का भी यत्र-
तत्र चित्रण किया। परमकल्याणकारी साधना और भौतिक व्यवस्थाओं के
निर्देश को एक में मिला देने से समाज तत्त्वनिर्णायक क्रम को पूरा-पूरा नहीं
समझ पाता। भौतिक व्यवस्थाओं को वह ज्यों-का-त्यों नहीं बल्कि बढ़ा-
चढ़ाकर ग्रहण करता है; क्योंकि वह भौतिक है। “महापुरुष ने कहा”- ऐसा
कहकर इन व्यवस्थाओं के लिये महापुरुषों की दुहाई भी देते हैं। वे महापुरुष
की वास्तविक क्रिया को तोड़-मरोड़कर उसे भ्रामक बना देते हैं। वेद, रामायण,
महाभारत, बाइबिल, कुरान सबके प्रति पूर्वाग्रहयुक्त धूमिल धारणाएँ शेष हैं।
बाह्य धरातल पर जीवनयापन करनेवाला समाज उनके कथन का स्थूल आशय
ही ग्रहण कर पाता है। इसीलिये भगवान श्रीकृष्ण ने शाश्वत धाम, अनन्त
जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति प्रदायिनी गीता शास्त्र को भौतिक व्यवस्थाओं से
पृथक् किया। महाभारत भारत का बृहत् इतिहास तथा गौरवशाली संस्कृति
शास्त्र है। उन्होंने इस विशाल इतिहास के मध्य इसका गायन किया, जिससे
भविष्य में आनेवाली समस्त पीढ़ियाँ इस धर्मशास्त्र को धार्मिक धरातल पर
यथावत समझ सकें। कालान्तर में महर्षि पतञ्जलि इत्यादि अनेक महापुरुषों ने
३८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भी परमश्रेय की यथार्थ विधि को सामाजिक व्यवस्था से हटाकर अलग
प्रस्तुत किया।
गीता मनुष्य मात्र के लिये- भगवान ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश
‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ (गीता, १/२०)- ठीक शस्त्र-सञ्चालन के समय
किया क्योंकि वह भली प्रकार जानते थे कि भौतिक संसार में कभी शान्ति
और सुख होता ही नहीं। अरबों लोगों की आहुति के उपरान्त भी जो विजेता
होंगे, वह भी विफल मनोरथ और अन्ततः उदास ही होंगे, इसलिये उन्होंने ऐसे
शाश्वत युद्ध का परिचय गीता के माध्यम से दिया, जिसमें एक बार विजय हो
जाने पर सदा रहनेवाली विजय, अनन्त विजय और अक्षय धाम है जो मानव
मात्र के लिये सदैव सुलभ है, जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है, प्रकृति और पुरुष
का संघर्ष है, अन्तःकरण में अशुभ का अन्त और शुभ परमात्मस्वरूप की
प्राप्ति का साधन है।
उत्तम अधिकारी के प्रति ही उन्होंने उसे व्यक्त किया। श्रीकृष्ण ने बार-
बार कहा कि तुझ अतिशय प्रीति रखनेवाले भक्त के प्रति हित की इच्छा से
कहता हूँ। यह अति गोपनीय है। अन्त में उन्होंने कहा- जो भक्त नहीं हो तो
प्रतीक्षा करो, उसको रास्ते पर लाओ, फिर उसी के लिये कहो। यही मनुष्य
मात्र के लिये यथार्थ कल्याण का एकमात्र साधन है, जिसका क्रमबद्ध वर्णन
श्रीकृष्णोक्त गीता है।
प्रस्तुत टीका- योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रसारित श्रीमद्भगवद्गीता के
आशय का यथावत् अनुवाद करने के कारण प्रस्तुत टीका का नाम ‘यथार्थ
गीता’ है। यह भगवान् की अन्तस्प्रेरणा पर आधारित है। गीता अपने में पूर्ण
साधन-ग्रन्थ है। सम्पूर्ण गीता में सन्देह का एक भी स्थल नहीं है। जहाँ कहीं
सन्देह है, वह बौद्धिक स्तर पर इसे जाना नहीं जा सकता है, इसलिये प्रतीत
होता है। अतः कहीं समझ में न आये तो किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य
में समझने का प्रयास करें।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
निवेदन
'यथार्थ गीता' योगेश्वर श्रीकृष्ण की परम पुनीत
वाणी श्रीमद्भगवद्गीता का ही अर्थ है। इसमें आपके हृदय
में स्थित परमात्मा की प्राप्ति के विधान का प्राप्ति के
पश्चात् किया गया चित्रण है। अवहेलना की दृष्टि से
इसका उपयोग वर्जित है, अन्यथा हम अपने लक्ष्य की
जानकारी से वंचित रह जायेंगे। इसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन
से मानव अपने कल्याण के साधन से भरपूर हो जाता है
और यत्किंचित् भी ग्रहण करेगा तो परमश्रेय को प्राप्त
कर लेगा; क्योंकि इस ईश्वर-पथ में आरम्भ का कभी
नाश नहीं होता।
– स्वामी अड़गड़ानन्द
कैसेट प्रसारण में अध्यायों के पूर्व की भूमिका
१. केवल एक परमात्मा में श्रद्धा और समर्पण का सन्देश देनेवाली गीता सबको
पवित्र करने का खुला आमन्त्रण देती है। सृष्टि में कहीं भी रहनेवाले अमीर
अथवा गरीब, कुलीन तथा आदिवासी, पुण्यात्मा और पापी, स्त्री और पुरुष,
सदाचारी एवं अत्यन्त दुराचारी- सबका उसमें प्रवेश है। विशेषकर गीता
पापियों के ही उद्धार का सुगम पथ बताती है, पुण्यात्मा तो भजते ही हैं।
प्रस्तुत है उसी गीता की अद्वितीय व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का कैसेट प्रसारण।
२. शास्त्र की रचना दो दृष्टियों से की जाती है- एक तो सामाजिक व्यवस्था और
संस्कृति को कायम रखना, जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों का अनुकरण
कर सकें तथा दूसरा यह कि वे शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लें। रामचरितमानस,
बाइबिल, कुरान इत्यादि में दोनों पक्षों का समावेश है; किन्तु भौतिक दृष्टि-
प्रधान होने के कारण मनुष्य समाजोपयोगी व्यवस्था को ही पकड़ पाता है।
आध्यात्मिक सूक्तियों को भी वह सामाजिक व्यवस्था के ही सन्दर्भ में देखने
लगता है। कहता है कि ऐसा तो शास्त्र में लिखा है। इसलिये वेदव्यास ने
दोनों के लिये एक ही ग्रन्थ महाभारत लिखते हुए भी आध्यात्मिक क्रिया का
संकलन गीता के रूप में अलग से किया, जिससे कि लोग इस मूल कल्याण-
पथ में भ्रान्ति का मिश्रण न कर सकें। उन्हीं आध्यात्मिक मूल्यों के साथ
प्रस्तुत है गीता का दिव्य सन्देश।
३. गीता किसी विशेष व्यक्ति, किसी जाति, वर्ग, पन्थ, देश-काल या किसी
रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक तथा सार्वकालिक
धर्मशास्त्र है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति, प्रत्येक आयु के प्रत्येक स्त्री-
पुरुष के लिये, सबके लिये है। सचमुच गीता सम्पूर्ण मानव जाति का
धर्मशास्त्र है। और कितने गौरव की बात है कि गीता आपका धर्मशास्त्र है।
४. पूज्य भगवान महावीर, तथागत भगवान बुद्ध विज्ञ होते हुए भी लोकभाषाओं
में गीता के ही सन्देशवाहक हैं। आत्मा सत्य है और पूर्ण संयम से आत्मस्थिति
का विधान है- यह गीता का ही विचार है। बुद्ध ने उसी तत्त्व को सर्वज्ञ तथा
अविनाशी पद कहकर गीता के ही विचार को पुष्ट किया है। इतना ही नहीं