यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकैसेट प्रसारण में अध्यायों के पूर्व की भूमिका
१. केवल एक परमात्मा में श्रद्धा और समर्पण का सन्देश देनेवाली गीता सबको
पवित्र करने का खुला आमन्त्रण देती है। सृष्टि में कहीं भी रहनेवाले अमीर
अथवा गरीब, कुलीन तथा आदिवासी, पुण्यात्मा और पापी, स्त्री और पुरुष,
सदाचारी एवं अत्यन्त दुराचारी- सबका उसमें प्रवेश है। विशेषकर गीता
पापियों के ही उद्धार का सुगम पथ बताती है, पुण्यात्मा तो भजते ही हैं।
प्रस्तुत है उसी गीता की अद्वितीय व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का कैसेट प्रसारण।
२. शास्त्र की रचना दो दृष्टियों से की जाती है- एक तो सामाजिक व्यवस्था और
संस्कृति को कायम रखना, जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों का अनुकरण
कर सकें तथा दूसरा यह कि वे शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लें। रामचरितमानस,
बाइबिल, कुरान इत्यादि में दोनों पक्षों का समावेश है; किन्तु भौतिक दृष्टि-
प्रधान होने के कारण मनुष्य समाजोपयोगी व्यवस्था को ही पकड़ पाता है।
आध्यात्मिक सूक्तियों को भी वह सामाजिक व्यवस्था के ही सन्दर्भ में देखने
लगता है। कहता है कि ऐसा तो शास्त्र में लिखा है। इसलिये वेदव्यास ने
दोनों के लिये एक ही ग्रन्थ महाभारत लिखते हुए भी आध्यात्मिक क्रिया का
संकलन गीता के रूप में अलग से किया, जिससे कि लोग इस मूल कल्याण-
पथ में भ्रान्ति का मिश्रण न कर सकें। उन्हीं आध्यात्मिक मूल्यों के साथ
प्रस्तुत है गीता का दिव्य सन्देश।
३. गीता किसी विशेष व्यक्ति, किसी जाति, वर्ग, पन्थ, देश-काल या किसी
रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक तथा सार्वकालिक
धर्मशास्त्र है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति, प्रत्येक आयु के प्रत्येक स्त्री-
पुरुष के लिये, सबके लिये है। सचमुच गीता सम्पूर्ण मानव जाति का
धर्मशास्त्र है। और कितने गौरव की बात है कि गीता आपका धर्मशास्त्र है।
४. पूज्य भगवान महावीर, तथागत भगवान बुद्ध विज्ञ होते हुए भी लोकभाषाओं
में गीता के ही सन्देशवाहक हैं। आत्मा सत्य है और पूर्ण संयम से आत्मस्थिति
का विधान है- यह गीता का ही विचार है। बुद्ध ने उसी तत्त्व को सर्वज्ञ तथा
अविनाशी पद कहकर गीता के ही विचार को पुष्ट किया है। इतना ही नहीं