यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
१०० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
यह अवतार किसी भाग्यवान् साधक के अन्तराल में होता है। आप
प्रकट होकर करते क्या हैं?-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८॥
अर्जुन ! 'साधूनां परित्राणाय' - परमसाध्य एकमात्र परमात्मा है, जिसे
साध लेने पर कुछ भी साधना शेष नहीं रह जाता। उस साध्य में प्रवेश
दिलानेवाले विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि दैवी सम्पद् को निर्विघ्न प्रवाहित
करने के लिये तथा 'दुष्कृताम्' - जिनसे दूषित कार्यरूप लेते हैं उन काम,
क्रोध, राग, द्वेषादि विजातीय प्रवृत्तियों को समूल नष्ट करने के लिये तथा धर्म
को भली प्रकार स्थिर करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
युग का तात्पर्य सत्ययुग, त्रेता या द्वापर नहीं, युगधर्मों का उतार-चढ़ाव
मनुष्यों के स्वभाव पर है। युगधर्म सदैव रहते हैं। मानस में संकेत है-
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।
( रामचरितमानस, ७/१०३ ख/१ )
युगधर्म सभी के हृदय में नित्य होते रहते हैं। अविद्या से नहीं बल्कि
विद्या से, राममाया की प्रेरणा से हृदय में होते हैं। जिसे प्रस्तुत श्लोक में
आत्ममाया कहा गया है, वही है राममाया। हृदय में राम की स्थिति दिला
देनेवाली राम से प्रेरित है वह विद्या। कैसे समझा जाय कि अब कौन-सा युग
कार्य कर रहा है, तो 'सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन
जाना।।' ( रामचरितमानस, ७/१०३ख/२ ) जब हृदय में शुद्ध सत्त्वगुण
ही कार्यरत हो, राजस तथा तामस दोनों गुण शान्त हो जायें, विषमताएँ समाप्त
हो गयी हों, जिसका किसी से द्वेष न हो, विज्ञान हो अर्थात् इष्ट से निर्देशन लेने
और उस पर टिकने की क्षमता हो, मन में प्रसन्नता का पूर्ण संचार हो- जब
ऐसी योग्यता आ जाय तो सत्ययुग में प्रवेश मिल गया। इसी प्रकार दो अन्य
युगों का वर्णन किया और अन्त में-
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
( रामचरितमानस, ७/१०३ ख/५ )
चतुर्थ अध्याय १०१
तामसी गुण भरपूर हो, किंचित् राजसी गुण भी उसमें हो, चारों ओर वैर
और विरोध हो तो ऐसा व्यक्ति कलियुगीन है। जब तामसी गुण कार्य करता है
तो मनुष्य में आलस्य, निद्रा, प्रमाद का बाहुल्य होता है। वह कर्त्तव्य जानते
हुए भी उसमें प्रवृत्त नहीं हो सकता, निषिद्ध कर्म जानते हुए भी उससे निवृत्त
नहीं हो सकता। इस प्रकार युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मनुष्यों की आन्तरिक
योग्यता पर निर्भर है। किसी ने इन्हीं योग्यताओं को चार युग कहा है, तो कोई
इन्हें ही चार वर्ण का नाम देता है, तो कोई इन्हें ही अति उत्तम, उत्तम, मध्यम
और निकृष्ट चार श्रेणी के साधक कहकर सम्बोधित करता है। प्रत्येक युग में
इष्ट साथ देते हैं। हाँ, उच्चश्रेणी में अनुकूलता की भरपूरता प्रतीत होती है,
निम्न युगों में सहयोग क्षीण प्रतीत होता है।
संक्षेप में, श्रीकृष्ण कहते हैं- साध्य वस्तु दिलानेवाले विवेक, वैराग्य
इत्यादि को निर्विघ्न प्रवाहित करने के लिये तथा दूषण के कारक काम-क्रोध,
राग-द्वेष इत्यादि का पूर्ण विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा में स्थिर
रखने के लिये मैं युग-युग में अर्थात् हर परिस्थिति, हर श्रेणी में प्रकट होता
हूँ- बशर्ते कि ग्लानि हो। जब तक इष्ट समर्थन न दें, तब तक आप समझ ही
नहीं सकेंगे कि विकारों का विनाश हुआ अथवा अभी कितना शेष है? प्रवेश
से पराकाष्ठापर्यन्त इष्ट हर श्रेणी में हर योग्यता के साथ रहते हैं। उनका प्राकट्य
अनुरागी के हृदय में होता है। भगवान प्रकट होते हैं, तब तो सभी दर्शन करते
होंगे? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं,
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥९॥
अर्जुन! मेरा वह जन्म अर्थात् ग्लानि के साथ स्वरूप की रचना तथा
मेरा कर्म अर्थात् दुष्कृतियों के कारणों का विनाश, साध्य वस्तु को दिलानेवाली
क्षमताओं का निर्दोष संचार, धर्म की स्थिरता, यह कर्म और जन्म दिव्य
अर्थात् अलौकिक है, लौकिक नहीं है। इन चर्मचक्षुओं से उसे देखा नहीं जा
सकता, मन और बुद्धि से उसे मापा नहीं जा सकता। जब इतना गूढ़ है तो उसे
देखता कौन है? केवल 'यो वेत्ति तत्त्वतः' - तत्त्वदर्शी ही मेरे इस जन्म और
१०२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कर्म को देखता है और मेरा साक्षात् करके वह पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता,
बल्कि मुझे प्राप्त होता है।
जब तत्त्वदर्शी ही भगवान का जन्म और कार्य देख पाता है तो लोग
लाखों की संख्या में भीड़ लगाये क्यों खड़े हैं कि कहीं अवतार होगा तो दर्शन
करेंगे? क्या आप तत्त्वदर्शी हैं? महात्मा-वेष में आज भी विविध तरीकों से,
मुख्यतः महात्मा-वेष की आड़ में बहुत से लोग प्रचार करते फिरते हैं कि वे
अवतार हैं या उनके दलाल प्रचार कर देते हैं। लोग भेड़ की तरह अवतार को
देखने टूट पड़ते हैं; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल तत्त्वदर्शी ही देख पाता
है। अब तत्त्वदर्शी किसे कहते हैं?
अध्याय २ में सत्-असत् का निर्णय देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
बताया- अर्जुन ! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का तीनों कालों में
कभी अभाव नहीं है। तो क्या आप ऐसा कहते हैं? उन्होंने बताया- “नहीं,
तत्त्वदर्शियों ने इसे देखा।” न किसी भाषाविद् ने देखा, न किसी समृद्धिशाली
ने देखा। यहाँ पुनः बल देते हैं कि मेरा आविर्भाव तो होता है लेकिन उसे
तत्त्वदर्शी ही देख पाता है। तत्त्वदर्शी एक प्रश्न है। ऐसा कुछ नहीं कि पाँच तत्त्व
हैं, पचीस तत्त्व हैं- इनकी गणना सीख ली और हो गये तत्त्वदर्शी। श्रीकृष्ण ने
आगे बताया कि आत्मा ही परमतत्त्व है। आत्मा परम से संयुक्त होकर
परमात्मा हो जाता है। आत्मसाक्षात्कार करनेवाला ही इस आविर्भाव को समझ
पाता है। सिद्ध है कि अवतार किसी विरही अनुरागी के हृदय में होता है।
आरम्भ में उसे वह समझ नहीं पाता कि हमें कौन संकेत देता है? कौन
मार्गदर्शन करता है? किन्तु परमतत्त्व परमात्मा के दर्शन के साथ ही वह
देख पाता है, समझ पाता है और फिर शरीर को त्यागकर पुनर्जन्म को प्राप्त
नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरा जन्म दिव्य है, इसे देखनेवाला मुझे प्राप्त होता
है, तो लोगों ने उनकी मूर्ति बना ली, पूजा करने लगे। आकाश में कहीं उनके
निवास की कल्पना कर ली। ऐसा कुछ नहीं है। उन महापुरुष का आशय
केवल इतना है कि यदि आप निर्धारित कर्म करें तो पायेंगे कि आप भी दिव्य
चतुर्थ अध्याय १०३
हैं। आप जो हो सकते हैं, वह मैं हो गया हूँ। मैं आपकी सम्भावना हूँ, आपका
ही भविष्य हूँ। अपने भीतर आप जिस दिन ऐसी पूर्णता पा लेंगे तो आप भी
वही होंगे जो श्रीकृष्ण हैं। जो श्रीकृष्ण का स्वरूप है, वही आपका भी हो
सकता है। अवतार कहीं बाहर नहीं होता। हाँ, यदि अनुरागपूरित हृदय हो तो
आपके भीतर भी अवतार की अनुभूति सम्भव है। वे आपको प्रोत्साहित करते
हैं कि बहुत से लोग इस मार्ग पर चलकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं-
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१०॥
राग और विराग, दोनों से परे वीतराग तथा इसी प्रकार भय-अभय,
क्रोध-अक्रोध दोनों से परे, अनन्य भाव से अर्थात् अहंकाररहित मेरी शरण हुए
बहुत से लोग ज्ञान-तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। अब
ऐसा होने लगा हो- ऐसी बात नहीं है, यह विधान सदैव रहा है। बहुत से पुरुष
इसी प्रकार से मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। किस प्रकार? जिन-जिन का
हृदय अधर्म की वृद्धि देखकर परमात्मा के लिये ग्लानि से भर गया, उस
स्थिति में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ। वे मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं। जिसे
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तत्त्वदर्शन कहा, उसे ही अब 'ज्ञान' कहते हैं। परमतत्त्व
है परमात्मा, उसे प्रत्यक्ष दर्शन के साथ जानना ज्ञान है। ऐसी जानकारीवाले
ज्ञानी मेरे स्वरूप को प्राप्त करते हैं। यहाँ यह प्रश्न पूरा हो गया। अब वे
योग्यता के आधार पर भजनेवालों का श्रेणी-विभाजन करते हैं-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११॥
पार्थ! जो मुझे जितनी लगन से जैसा भजते हैं, मैं भी उनको वैसा ही
भजता हूँ। उतनी ही मात्रा में सहयोग देता हूँ। साधक की श्रद्धा ही कृपा बनकर
उसे मिलती है। इस रहस्य को जानकर सुधीजन सम्पूर्ण भावों से मेरे मार्ग के
अनुसार ही बरतते हैं। जैसा मैं बरतता हूँ, जो मुझे प्रिय है वैसा ही आचरण
करते हैं। जो मैं कराना चाहता हूँ, वही करते हैं।
१०४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भगवान् कैसे भजते हैं? वे रथी बनकर खड़े हो जाते हैं, साथ चलने
लगते हैं, यही उनका भजना है। दूषित जिनसे पैदा होते हैं, उनका विनाश करने
के लिये वे खड़े हो जाते हैं। सत्य में प्रवेश दिलानेवाले सद्गुणों का परित्राण
करने के लिये वे खड़े हो जाते हैं। जब तक इष्टदेव हृदय से पूर्णतः रथी न हों
और हर कदम पर सावधान न करें, तब तक कोई कैसा ही भजनानन्दी क्यों
न हो, लाख आँख मूँदे, लाख प्रयत्न करे, वह इस प्रकृति के द्वन्द्व से पार नहीं
हो सकता। वह कैसे समझेगा कि वह कितनी दूरी तय कर चुका, कितनी शेष
है। इष्ट ही आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाते हैं और उसका मार्गदर्शन करते
हैं कि तुम यहाँ पर हो, ऐसे करो, ऐसे चलो। इस प्रकार प्रकृति की खाईं पाटते
हुए, शनैः-शनैः आगे बढ़ाते हुए स्वरूप में प्रवेश दिला देंगे। भजन तो साधक
को ही करना पड़ता है; किन्तु उसके द्वारा इस पथ में जो दूरी तय होती है, वह
इष्ट की देन है। ऐसा जानकर सभी मनुष्य सर्वतोभावेन मेरा अनुसरण करते हैं।
किस प्रकार वे बरतते हैं?-
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।१२।।
वे पुरुष इस शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए देवताओं को पूजते हैं।
कौन-सा कर्म? श्रीकृष्ण ने कहा, “अर्जुन! तू नियत कर्म कर।” नियत कर्म
क्या है? यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। यज्ञ क्या है? साधना की विधि-विशेष,
जिसमें श्वास-प्रश्वास का हवन, इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमाग्नि में
हवन किया जाता है, जिसका परिणाम है परमात्मा। कर्म का शुद्ध अर्थ है
आराधना, जिसका स्वरूप इसी अध्याय में आगे मिलेगा। इस आराधना का
परिणाम क्या है? ‘संसिद्धिम्’- परमसिद्धि परमात्मा, ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’-
शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश, परम नैष्कर्म्य की स्थिति। श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे
अनुसार बरतनेवाले लोग इस मनुष्य-लोक में कर्म के परिणाम परम नैष्कर्म्य-
सिद्धि के लिये देवताओं को पूजते हैं अर्थात् दैवी सम्पद् को बलवती बनाते हैं।
तीसरे अध्याय में उन्होंने बताया कि इस यज्ञ द्वारा तुम देवताओं की
वृद्धि करो, दैवी सम्पद् को बलवती बनाओ। ज्यों-ज्यों हृदय-देश में दैवी
चतुर्थ अध्याय १०५
सम्पद् की उन्नति होगी, त्यों-त्यों तुम्हारी उन्नति होगी। इस प्रकार परस्पर उन्नति
करते हुए परमश्रेय को प्राप्त हो जाओ। अन्त तक उन्नति करते जाने की यह
अन्तःक्रिया है। इसी पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे अनुकूल बरतनेवाले
लोग इस मनुष्य-शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए दैवी सम्पद् को बलवती
बनाते हैं, जिससे वह नैष्कर्म्य-सिद्धि शीघ्र होती है। वह असफल नहीं होती,
सफल ही होती है। शीघ्र का तात्पर्य? क्या कर्म में प्रवृत्त होते ही तत्क्षण यह
परमसिद्धि मिल जाती है? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, इस सोपान पर क्रमशः
चढ़ने का विधान है। कोई छलांग लगाकर भावातीत ध्यान-जैसा चमत्कार
नहीं होता। इस पर देखें-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।१३।।
अर्जुन ! 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्'- चार वर्णों की रचना मैंने की। तो
क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँट दिया? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, 'गुणकर्म-
विभागशः'-गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। गुण एक पैमाना
है, मापदण्ड है। तामसी गुण होगा तो आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्म में न प्रवृत्त
होने का स्वभाव, जानते हुए भी अकर्त्तव्य से निवृत्ति न हो पाने की विवशता
रहेगी। ऐसी अवस्था में साधन आरम्भ कैसे करें? दो घण्टे आप आराधना में
बैठते हैं, इस कर्म के लिये प्रयत्नशील होना चाहते हैं किन्तु दस मिनट भी
अपने पक्ष में नहीं पाते। शरीर अवश्य बैठा है, लेकिन जिस मन को बैठना
चाहिये वह हवा से बातें कर रहा है, कुतर्कों का जाल बुन रहा है, तरंग पर
तरंग छायी है, तो आप बैठे क्यों हैं? समय क्यों नष्ट करते हैं? उस समय केवल
'परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।' (१८/४४)- जो महापुरुष
अव्यक्त की स्थितिवाले हैं, अविनाशी तत्त्व में स्थित हैं उनकी तथा इस पथ
पर अग्रसर अपने से उन्नत लोगों की सेवा में लग जाओ। इससे दूषित संस्कार
शमन होते जायेंगे, साधना में प्रवेश दिलानेवाले संस्कार सबल होते जायेंगे।
क्रमशः तामसी गुण न्यून होने पर राजसी गुणों की प्रधानता तथा
सात्त्विक गुण के स्वल्प संचार के साथ साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की हो
१०६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जाती है। उस समय वही साधक इन्द्रिय-संयम, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह
स्वभावतः करने लगेगा। कर्म करते-करते उसी साधक में सात्त्विक गुणों का
बाहुल्य हो जायेगा, राजसी गुण कम रह जायेंगे, तामसी गुण शान्त रहेंगे। उस
समय वही साधक क्षत्रिय श्रेणी में प्रवेश पा लेगा। शौर्य, कर्म में प्रवृत्त रहने
की क्षमता, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावों पर स्वामिभाव, प्रकृति के
तीनों गुणों को काटने की क्षमता उसके स्वभाव में ढल जायेगी। वही कर्म और
सूक्ष्म होने पर, मात्र सात्त्विक गुण कार्यरत रह जाने पर मन का शमन, इन्द्रियों
का दमन, एकाग्रता, सरलता, ध्यान, समाधि, ईश्वरीय निर्देश, आस्तिकता
इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली स्वाभाविक क्षमता के साथ वही साधक
ब्राह्मण श्रेणी का कहा जाता है। यह ब्राह्मण श्रेणी के कर्म की निम्नतम सीमा
है। जब वही साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, उस अन्तिम सीमा में वह स्वयं
में न ब्राह्मण रहता है न क्षत्रिय, न वैश्य न शूद्र; किन्तु दूसरों के मार्गदर्शनहेतु
वही ब्राह्मण है। कर्म एक ही है- नियत कर्म, आराधना। अवस्था-भेद से इसी
कर्म को ऊँची-नीची चार सीढ़ियों में बाँटा। किसने बाँटा? किसी योगेश्वर ने
बाँटा, अव्यक्त स्थितिवाले महापुरुष ने बाँटा। उसके कर्त्ता मुझ अविनाशी को
अकर्त्ता ही जान। क्यों?-
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।।१४।।
क्योंकि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है। कर्मों का फल क्या है?
श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि यज्ञ जिससे पूरा होता है, उस क्रिया का नाम कर्म
है और पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी रचना करता है, उस ज्ञानामृत का पान
करनेवाला शाश्वत, सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा लेता है। कर्म का परिणाम है
परमात्मा, उस परमात्मा की चाह भी अब मुझे नहीं है; क्योंकि वह मुझसे भिन्न
नहीं है। मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ, उसी की स्थितिवाला हूँ। अब आगे कोई सत्ता
नहीं, जिसके लिये इस कार्य पर स्नेह रखूँ। इसलिये कर्म मुझे लिपायमान नहीं
करते और इसी स्तर से जो भी मुझे जानता है अर्थात् जो कर्मों के परिणाम
‘परमात्मा’ को प्राप्त कर लेता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। जैसे श्रीकृष्ण, वैसे
उस स्तर से जाननेवाले महापुरुष।
चतुर्थ अध्याय १०७
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५॥
अर्जुन! पहले होनेवाले मोक्ष की इच्छावाले पुरुषों द्वारा भी यही जानकर
कर्म किया गया। क्या जानकर? यही कि जब कर्मों का परिणाम परमात्मा भिन्न
न रह जाय, कर्मों के परिणाम परमात्मा की स्पृहा न रह जाने पर उस पुरुष को
कर्म नहीं बाँधते। श्रीकृष्ण इसी स्थितिवाले हैं इसलिये वे कर्म में लिपायमान
नहीं होते और उसी स्तर से हम जान लेंगे तो हमें भी कर्म नहीं बाँधेगा। जैसे
श्रीकृष्ण, ठीक उसी स्तर से जो भी जान लेगा, वैसा ही वह पुरुष भी कर्मबन्धन
से मुक्त हो जायेगा। अब श्रीकृष्ण 'भगवान', 'महात्मा', 'अव्यक्त', 'योगेश्वर'
या 'महायोगेश्वर' जो भी रहे हों, वह स्वरूप सबके लिये है। यही समझकर
पहले के मुमुक्षु पुरुषों ने, मोक्ष की इच्छावाले पुरुषों ने कर्म पर कदम रखा।
इसलिये अर्जुन! तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए इसी कर्म को कर। यही
कल्याण का एकमात्र मार्ग है।
अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्म करने पर बल दिया; किन्तु यह
स्पष्ट नहीं किया कि कर्म क्या है? अध्याय दो में उन्होंने कर्म का नाम मात्र
लिया कि अब इसी को तू निष्काम कर्म के विषय में सुन। उसकी विशेषताओं
का वर्णन किया कि यह जन्म-मरण के महान् भय से रक्षा करता है। कर्म
करते समय सावधानी का वर्णन किया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म क्या
है? अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि ज्ञानमार्ग अच्छा लगे या निष्काम कर्मयोग,
कर्म तो करना ही पड़ेगा। न तो कर्मों को त्यागने से कोई ज्ञानी होता है और न
तो कर्मों को न आरम्भ करने से कोई निष्कर्मी। हठवश जो नहीं करते, वे दम्भी
हैं। इसलिये मन से इन्द्रियों को वश में करके कर्म कर। कौन-सा कर्म करे?
तो बताया- नियत कर्म कर। अब यह निर्धारित कर्म है क्या? तो बोले- यज्ञ
की प्रक्रिया ही नियत कर्म है। एक नवीन प्रश्न दिया कि यज्ञ क्या है, जिसे करें
तो कर्म हो जाय? वहाँ भी यज्ञ की उत्पत्ति को बताया, उसकी विशेषताओं का
वर्णन किया; किन्तु यज्ञ नहीं बताया, जिससे कर्म को समझा जा सके। अभी
तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि कर्म क्या है? अब कहते हैं- अर्जुन! कर्म क्या है,
१०८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अकर्म क्या है? इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हैं, उसे भली प्रकार
समझ लेना चाहिये।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।।
कर्म क्या है और अकर्म क्या है?- इस विषय में बुद्धिमान् पुरुष भी
मोहित हैं। इसलिये मैं वह कर्म तेरे लिये अच्छी तरह से कहूँगा, जिसे जानकर
तू ‘अशुभात् मोक्ष्यसे’- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट
जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है। इसी
कर्म को जानने के लिये श्रीकृष्ण पुनः बल देते हैं-
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, अकर्म का स्वरूप भी समझना
चाहिये और विकर्म अर्थात् विकल्पशून्य विशेष कर्म जो आप्तपुरुषों द्वारा होता
है, उसे भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है। कतिपय लोगों ने
विकर्म का अर्थ ‘निषिद्ध कर्म’, ‘मन लगाकर किया गया कर्म’ इत्यादि किया
है। वस्तुतः यहाँ ‘वि’ उपसर्ग विशिष्टता का द्योतक है। प्राप्ति के पश्चात्
महापुरुषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम
महापुरुषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही
है, फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिये कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य
है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है।
उदाहरणार्थ गीता में जहाँ भी किसी कार्य में ‘वि’ उपसर्ग लगा है,
उसकी विशेषता का द्योतक है, निकृष्टता का नहीं। यथा ‘योगयुक्तो विशुद्धात्मा
विजितात्मा जितेन्द्रियः।’ (गीता ५/७)- जो योग से युक्त है वह विशेष
रूप से शुद्ध आत्मावाला, विशेष रूप से जीते अन्तःकरणवाला इत्यादि विशेषता
के ही द्योतक हैं। इसी प्रकार गीता में स्थान-स्थान पर ‘वि’ का प्रयोग हुआ है,
जो विशेष पूर्णता का द्योतक है। इसी प्रकार ‘विकर्म’ भी विशिष्ट कर्म का
चतुर्थ अध्याय १०९
द्योतक है जो प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के द्वारा सम्पादित होता है, जो
शुभाशुभ संस्कार नहीं डालता। अभी आपने विकर्म देखा। रहा कर्म और
अकर्म, जिसे अगले श्लोक में समझने का प्रयास करें। यदि यहाँ कर्म और
अकर्म का विभाजन नहीं समझ सके तो कभी नहीं समझ सकेंगे-
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।१८।।
जो पुरुष कर्म में अकर्म देखे, कर्म माने आराधना अर्थात् आराधना करे
और यह भी समझे कि करनेवाला मैं नहीं हूँ बल्कि गुणों की अवस्था ही
चिन्तन में हमें नियुक्त करती है, 'मैं इष्ट द्वारा संचालित हूँ'- ऐसा देखे और जब
इस प्रकार अकर्म देखने की क्षमता आ जाय और धारावाहिक रूप से कर्म
होता रहे, तभी समझना चाहिये कि कर्म सही दिशा में हो रहा है। वही पुरुष
मनुष्यों में बुद्धिमान् है, मनुष्यों में योगी है, योग से युक्त बुद्धिवाला है और
सम्पूर्ण कर्मों को करनेवाला है। उसके द्वारा कर्म करने में लेशमात्र भी त्रुटि
नहीं रह जाती।
सारांशतः आराधना ही कर्म है, उस कर्म को करें और करते हुए अकर्म
देखें कि मैं तो यन्त्रमात्र हूँ, करानेवाला इष्ट है और मैं गुणों से उत्पन्न अवस्था
के अनुसार ही चेष्टा कर पाता हूँ। जब अकर्म की यह क्षमता आ जाय और
धारावाहिक कर्म होता रहे, तभी परमकल्याण की स्थिति दिलानेवाला कर्म हो
पाता है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि, "जब तक इष्ट रथी न हो जाय,
रोकथाम न करने लगे, तब तक सही मात्रा में साधना का आरम्भ ही नहीं
होता।" इसके पूर्व जो कुछ भी किया जाता है, कर्म में प्रवेश के प्रयास से
अधिक कुछ भी नहीं है। हल का सारा भार बैलों के कन्धों पर ही रहता है,
फिर भी खेत की जुताई हलवाहे की देन है। ठीक इसी प्रकार साधन का सारा
भार साधक के ऊपर ही रहता है; किन्तु वास्तविक साधक तो इष्ट है जो उसके
पीछे लगा हुआ है, जो उसका मार्गदर्शन करता है। जब तक इष्ट निर्णय न दें,
तब तक आप समझ ही नहीं सकेंगे कि हमसे हुआ क्या? हम प्रकृति में भटक
रहे हैं या परमात्मा में? इस प्रकार इष्ट के निर्देशन में जो साधक इस आत्मिक
११० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
पथ पर अग्रसर होता है, अपने को अकर्त्ता समझकर धारावाहिक कर्म करता
है वही बुद्धिमान् है, उसकी जानकारी यथार्थ है, वही योगी है।
श्रीकृष्ण के अनुसार जो कुछ किया जाता है, कर्म नहीं है। कर्म एक
निर्धारित की हुई क्रिया है। ‘नियतं कुरु कर्म त्वम्’- अर्जुन! तू निर्धारित
कर्म को कर। निर्धारित कर्म है क्या? तब बताया, ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र
लोकोऽयं कर्मबन्धनः।’- यज्ञ को कार्यरूप देना ही कर्म है। तो इसके
अतिरिक्त जो कुछ किया जाता है, क्या वह कर्म नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं,
‘अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’- इस यज्ञ को कार्यरूप देने के सिवाय जो
कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है, न कि कर्म। ‘तदर्थं कर्म’-
अर्जुन! उस यज्ञ की पूर्ति के लिये भली प्रकार आचरण कर। और जब यज्ञ का
स्वरूप बताया तो वह शुद्ध रूप से आराधना की एक विधि-विशेष है, जो उस
आराध्य देव तक पहुँचाकर उसमें विलय दिलाता है।
इस यज्ञ में इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, दैवी सम्पद् का अर्जन
इत्यादि बताते हुए अन्त में कहा- बहुत से योगी प्राण और अपान की गति का
निरोध करके प्राणायाम के परायण हो जाते हैं। जहाँ न भीतर से संकल्प उठता
है और न बाह्य वातावरण का संकल्प मन के अन्दर प्रविष्ट हो पाता है, ऐसी
स्थिति में चित्त का सर्वथा निरोध और निरुद्ध चित्त के भी विलयकाल में वह
पुरुष ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- शाश्वत, सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है।
यही सब यज्ञ है, जिसे कार्यरूप देने का नाम कर्म है। अतः कर्म का शुद्ध अर्थ
है ‘आराधना’, कर्म का अर्थ है ‘भजन’, कर्म का अर्थ है ‘योग-साधना’ को
भली प्रकार सम्पादित करना- जिसका विशद वर्णन इसी अध्याय में आगे आ
रहा है। यहाँ कर्म और अकर्म का केवल विभाजन किया गया, जिससे कर्म
करते समय उसे सही दिशा दी जा सके और उस पर चला जा सके।
जिज्ञासा स्वाभाविक है कि कर्म करते ही रहेंगे या कभी कर्मों से
छुटकारा भी मिलेगा? इस पर योगेश्वर कहते हैं-
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।१९।।
चतुर्थ अध्याय १११
अर्जुन ! ‘यस्य सर्वे समारम्भाः’- जिस पुरुष के द्वारा सम्पूर्णता से
आरम्भ की हुई क्रिया (जिसे पिछले श्लोक में कहा कि अकर्म देखने की
क्षमता आ जाने पर कर्म में प्रवृत्त रहनेवाला पुरुष सम्पूर्ण कर्मों का करनेवाला
है। जिसके करने में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है।) ‘कामसङ्कल्पवर्जिताः’-
क्रमशः उत्थान होते-होते इतनी सूक्ष्म हो गयी कि वासना और मन के संकल्प-
विकल्प से ऊपर उठ गयी (कामना और संकल्पों का निरोध होना मन की
विजितावस्था है। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो इस मन को कामना और
संकल्प-विकल्प से ऊपर उठा देता है।), उस समय ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’-
अन्तिम संकल्प के भी शमन के साथ, जिसे हम नहीं जानते, जिसे जानने के
लिये हम इच्छुक थे उस परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी हो जाती है। क्रियात्मक
पथ पर चलकर परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही ‘ज्ञान’ है। उस ज्ञान
के साथ ही ‘दग्धकर्माणम्’- कर्म सदा के लिये दग्ध हो जाते हैं। जिसे पाना
था पा लिया, आगे कोई सत्ता नहीं जिसकी शोध करें। इसलिये कर्म करके ढूँढ़े
भी तो किसे? उस जानकारी के साथ कर्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती
है। ऐसी स्थितिवालों को ही बोधस्वरूप महापुरुषों ने ‘पण्डित’ कहकर सम्बोधित
किया है। उनकी जानकारी पूर्ण है। ऐसी स्थितिवाला महापुरुष करता क्या है?
रहता कैसे है? उसकी रहनी पर प्रकाश डालते हैं-
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥२०॥
अर्जुन ! वह पुरुष सांसारिक आश्रय से रहित होकर, नित्यवस्तु परमात्मा
में ही तृप्त रहकर, कर्मों के फल परमात्मा की आसक्ति को भी त्यागकर
(क्योंकि परमात्मा भी अब भिन्न नहीं है) कर्म में अच्छी प्रकार बरतता हुआ
भी कुछ नहीं करता।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥२१॥
जिसने अन्तःकरण और शरीर को जीत लिया है, भोगों की सम्पूर्ण
सामग्री जिसने त्याग दी है, ऐसे आशारहित पुरुष का शरीर केवल कर्म करता
११२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
दिखायी भर पड़ता है। वस्तुतः वह करता-धरता कुछ नहीं, इसलिये पाप
को प्राप्त नहीं होता। वह पूर्णत्व को प्राप्त है, इसीलिये आवागमन को प्राप्त
नहीं होता।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥२२॥
अपने आप जो कुछ भी प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट रहनेवाला, सुख-दुःख,
राग-द्वेष और हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से परे, ‘विमत्सरः’- ईर्ष्यारहित तथा सिद्धि
और असिद्धि में समभाववाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं बँधता। सिद्धि
अर्थात् जिसे पाना था वह अब भिन्न नहीं है और वह कभी विलग भी नहीं
होगा, इसलिये असिद्धि का भी भय नहीं है। इस प्रकार सिद्धि और असिद्धि में
समभाववाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बँधता। कौन-सा कर्म वह करता है?
वही नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया। इसी को दोहराते हुए कहते हैं-
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३॥
अर्जुन! ‘यज्ञायाचरतः कर्म’- यज्ञ का आचरण ही कर्म है और
साक्षात्कार का नाम ही ज्ञान है। इस यज्ञ का आचरण करके साक्षात्कार के
साथ ज्ञान में स्थित, संगदोष और आसक्ति से रहित मुक्त पुरुष के सम्पूर्ण कर्म
भली प्रकार विलीन हो जाते हैं। वे कर्म कोई परिणाम उत्पन्न नहीं कर पाते;
क्योंकि कर्मों का फल परमात्मा उनसे भिन्न नहीं रह गया। अब फल में कौन-
सा फल लगेगा? इसलिये उन मुक्त पुरुषों को अपने लिये कर्म की आवश्यकता
समाप्त हो जाती है। फिर भी लोकसंग्रह के लिये वे कर्म करते ही हैं और करते
हुए भी वे इन कर्मों में लिप्त नहीं होते। जब करते हैं तो लिप्त क्यों नहीं होते?
इस पर कहते हैं-
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४॥
ऐसे मुक्त पुरुष का समर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, अग्नि भी ब्रह्म ही है
अर्थात् ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूपी कर्त्ता द्वारा जो हवन किया जाता है वह भी
चतुर्थ अध्याय ११३
ब्रह्म है। 'ब्रह्मकर्मसमाधिना'- जिसके कर्म ब्रह्म का स्पर्श करके समाधिस्थ
हो चुके हैं, उसमें विलय हो चुके हैं, ऐसे महापुरुष के लिये जो प्राप्त होने
योग्य है वह भी ब्रह्म ही है। वह करता-धरता कुछ नहीं, केवल लोकसंग्रह के
लिए कर्म में बरतता है।
यह तो प्राप्तिवाले महापुरुष के लक्षण हैं; किन्तु कर्म में प्रवेश लेनेवाले
प्रारम्भिक साधक कौन-सा यज्ञ करते हैं?
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! कर्म कर। कौन-सा
कर्म? उन्होंने बताया, 'नियतं कुरु कर्म'- निर्धारित किये हुए कर्म को कर।
निर्धारित कर्म कौन-सा है?, तो 'यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।'
(३/९)- अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। इस यज्ञ के अतिरिक्त अन्यत्र
जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है न कि कर्म। कर्म तो
संसार-बन्धन से मोक्ष दिलाता है। अतः 'तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः
समाचर।।'- उस यज्ञ की पूर्ति के लिये संगदोष से अलग रहकर भली प्रकार
यज्ञ का आचरण कर। यहाँ योगेश्वर ने एक नवीन प्रश्न दिया कि वह यज्ञ है
क्या जिसे करें और कर्म हमसे पार लगे? उन्होंने कर्म की विशेषताओं पर बल
दिया, बताया कि यज्ञ आया कहाँ से? यज्ञ देता क्या है? उसकी विशेषताओं
का चित्रण किया; किन्तु अभी तक यह नहीं बताया कि यज्ञ है क्या?
अब यहाँ उसी यज्ञ को स्पष्ट करते हैं-
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।।२५।।
गतश्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने परमात्मस्थित महापुरुष के यज्ञ का
निरूपण किया; किन्तु दूसरे योगी जो अभी उस तत्त्व में स्थित नहीं हुए हैं,
क्रिया में प्रवेश करनेवाले हैं, वे आरम्भ कहाँ से करें? इस पर कहते हैं कि
दूसरे योगी लोग 'दैवम् यज्ञम्' अर्थात् दैवी सम्पद् को अपने हृदय में बलवती
बनाते हैं। जिसके लिये ब्रह्मा का निर्देश था कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोग
देवताओं की उन्नति करो। ज्यों-ज्यों हृदय-देश में दैवी सम्पद् अर्जित होगी,
वही तुम्हारी प्रगति होगी और क्रमशः परस्पर उन्नति करके परमश्रेय को प्राप्त
११४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
करो। दैवी सम्पद् को हृदय-देश में बलवती बनाना प्रवेशिका श्रेणी के योगियों
का यज्ञ है।
वह दैवी सम्पद् अध्याय १६ के आरम्भिक तीन श्लोकों में वर्णित है,
जो है तो सबमें, केवल महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य समझकर उसकी जागृति करें, उसमें
लगें। इन्हीं को इंगित करते हुए योगेश्वर ने कहा- अर्जुन! तू शोक मत कर;
क्योंकि तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है, तू मुझमें निवास करेगा, मेरे ही
शाश्वत स्वरूप को प्राप्त करेगा; क्योंकि यह दैवी सम्पद् परमकल्याण के
लिये ही है और इसके विपरीत आसुरी सम्पद् नीच और अधम योनियों का
कारण है। इसी आसुरी सम्पद् का हवन होने लगता है इसलिये यह यज्ञ है और
यहीं से यज्ञ का आरम्भ है।
दूसरे योगी 'ब्रह्माग्नौ'- परब्रह्म परमात्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही
यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे बताया- इस शरीर में अधियज्ञ मैं
हूँ। यज्ञों का अधिष्ठाता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, वह पुरुष मैं हूँ।
श्रीकृष्ण एक योगी थे, सद्गुरु थे। इस प्रकार दूसरे योगीजन ब्रह्मरूपी अग्नि में
यज्ञ अर्थात् यज्ञस्वरूप सद्गुरु को उद्देश्य बनाकर यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं,
सारांशतः सद्गुरु के स्वरूप का ध्यान करते हैं।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।।२६।।
अन्य योगीजन श्रोत्रादिक ( श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, जिह्वा और नासिका)
इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं अर्थात् इन्द्रियों को विषयों से
समेटकर संयत कर लेते हैं। यहाँ आग नहीं जलती। जैसे अग्नि में डालने से
हर वस्तु भस्मसात् हो जाती है, ठीक इसी प्रकार संयम भी एक अग्नि है जो
इन्द्रियों के सम्पूर्ण बहिर्मुखी प्रवाह को दग्ध कर देता है। दूसरे योगी लोग
शब्दादिक (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में
हवन कर देते हैं अर्थात् उनका आशय बदलकर साधनापरक बना लेते हैं।
साधक को संसार में रहकर ही तो भजन करना है। सांसारिक लोगों के
चतुर्थ अध्याय ११५
भले-बुरे शब्द उससे टकराते ही रहते हैं। विषयोत्तेजक ऐसे शब्दों को सुनते ही
साधक उनके आशय को योग, वैराग्य सहायक, वैराग्योत्तेजक भावों में बदलकर
इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन कर देते हैं। जैसा कि एक बार अर्जुन अपने चिन्तन
में रत था, अकस्मात् उसके कर्ण-कुहरों में संगीत-लहरी झनझना उठी। उसने
सिर उठाकर देखा तो उर्वशी खड़ी थी, जो एक अप्सरा थी। सभी उसके रूप
पर मुग्ध हो झूम रहे थे; किन्तु अर्जुन ने उसे स्नेहिल दृष्टि से मातृवत् देखा। उस
शब्द, रूप से मिलनेवाले विकार विलीन हो गये। इन्द्रियों के अन्तराल में ही
समाहित हो गये।
यहाँ इन्द्रिय ही अग्नि है। अग्नि में डाली हुई वस्तु जैसे भस्मसात् हो
जाती है, इसी प्रकार आशय बदलकर इष्ट के अनुकूल ढाल लेने पर विषयोत्तेजक
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द भी भस्म हो जाते हैं, साधक पर कुप्रभाव नहीं
डाल पाते। साधक इन शब्दादिकों में रुचि नहीं लेता, इन्हें ग्रहण नहीं करता।
इन श्लोकों में 'अपरे', 'अन्ये' शब्द एक ही साधक की ऊँची-नीची
अवस्थाएँ हैं, एक ही यज्ञकर्त्ता का ऊँचा-नीचा स्तर है, न कि 'अपरे', 'अपरे'
कहने से कोई अलग-अलग यज्ञ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।२७।।
अभी तक योगेश्वर ने जिस यज्ञ की चर्चा की, उसमें क्रमशः दैवी
सम्पद् को अर्जित किया जाता है, इन्द्रियों की सम्पूर्ण चेष्टाओं का संयम किया
जाता है, बलात् विषयोत्तेजक शब्दादिकों के टकराने पर भी उनका आशय
बदलकर उनसे बचा जाता है। इससे उन्नत अवस्था होने पर दूसरे योगीजन
सम्पूर्ण इन्द्रियों की चेष्टाओं तथा प्राण के व्यापार को साक्षात्कारसहित ज्ञान से
प्रकाशित परमात्मस्थितिरूपी योगाग्नि में हवन करते हैं। जब संयम की पकड़
आत्मा के साथ तद्रूप हो जाती है, प्राण और इन्द्रियों का व्यापार भी शान्त हो
जाता है, उस समय विषयों को उद्दीप्त करनेवाली और इष्ट में प्रवृत्ति दिलानेवाली
दोनों धाराएँ आत्मसात् हो जाती हैं। परमात्मा में स्थिति मिल जाती है। यज्ञ का
परिणाम निकल आता है। यह है यज्ञ की पराकाष्ठा। जिस परमात्मा को पाना
११६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
था, उसी में स्थिति आ गयी तो शेष क्या रहा? पुनः योगेश्वर श्रीकृष्ण यज्ञ को
भली प्रकार समझाते हैं-
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।२८।।
अनेक लोग द्रव्ययज्ञ करते हैं अर्थात् आत्मपथ में, महापुरुषों की सेवा
में पत्र-पुष्प अर्पित करते हैं। वे समर्पण के साथ महापुरुषों की सेवा में द्रव्य
लगाते हैं। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं- भक्तिभाव से पत्र, पुष्प, फल, जल जो
कुछ भी मुझे देता है, उसे मैं खाता हूँ और उसका परमकल्याण-सृजन करनेवाला
होता हूँ। यह भी यज्ञ है। हर आत्मा की सेवा करना, भूले हुए को आत्मपथ पर
लाना द्रव्ययज्ञ है; क्योंकि प्राकृतिक संस्कारों को जलाने में समर्थ है।
इसी प्रकार कई पुरुष ‘तपोयज्ञाः’- स्वधर्म पालन में इन्द्रियों को
तपाते हैं अर्थात् स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार यज्ञ की निम्न और उन्नत
अवस्थाओं के बीच तपते हैं। इसी पथ की अल्पज्ञता में पहली श्रेणी का
साधक शूद्र परिचर्या द्वारा, वैश्य दैवी सम्पद् के संग्रह द्वारा, क्षत्रिय काम-
क्रोधादि के उन्मूलन द्वारा और ब्राह्मण ब्रह्म में प्रवेश की योग्यता के स्तर से
इन्द्रियों को तपाता है। सबको एक-जैसा परिश्रम करना पड़ता है। वास्तव में
यज्ञ एक ही है। अवस्था के अनुसार ऊँची-नीची श्रेणियाँ गुजरती जाती हैं।
‘पूज्य महाराज जी’ कहते थे- “मनसहित इन्द्रियों और शरीर को लक्ष्य
के अनुरूप तपाना ही तप कहलाता है। ये लक्ष्य से दूर भागेंगे, इन्हें समेटकर
उधर ही लगाओ।”
अनेक पुरुष योगयज्ञ का आचरण करते हैं। प्रकृति में भटकती हुई
आत्मा का प्रकृति से परे परमात्मा से मिलन का नाम ‘योग’ है। योग की
परिभाषा अध्याय ६/२३ में द्रष्टव्य है। सामान्यतः दो वस्तुओं का मिलन योग
कहलाता है। कागज से कलम मिल गया, थाली और मेज मिल गये तो क्या
योग हो गया? नहीं, ये तो पंचभूतों से निर्मित पदार्थ हैं। एक ही हैं, दो कहाँ?
दो प्रकृति और पुरुष हैं। प्रकृति में स्थित आत्मा अपने ही शाश्वत रूप
परमात्मा में प्रवेश पा जाता है तो प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है। यही योग
चतुर्थ अध्याय ११७
है। अतः अनेक पुरुष इस मिलन में सहायक शम, दम इत्यादि नियमों का
भली प्रकार आचरण करते हैं। योगयज्ञ करनेवाले तथा अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों
से युक्त यत्नशील पुरुष ‘स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च’– स्वयं का अध्ययन, स्व-
रूप का अध्ययन करनेवाले ज्ञानयज्ञ के कर्त्ता हैं। यहाँ योग के अंगों (यम,
नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को अहिंसादि
तीक्ष्ण व्रतों से निर्दिष्ट किया गया है। अनेक लोग स्वाध्याय करते हैं। पुस्तक
पढ़ना तो स्वाध्याय का आरम्भिक स्तर मात्र है। विशुद्ध स्वाध्याय है स्वयं का
अध्ययन, जिससे स्वरूप की उपलब्धि होती है, जिसका परिणाम है ज्ञान
अर्थात् साक्षात्कार।
यज्ञ का अगला चरण बताते हैं-
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९॥
बहुत से योगी अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं और उसी
प्रकार प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते हैं। इससे सूक्ष्म अवस्था हो जाने
पर अन्य योगीजन प्राण और अपान दोनों की गति रोककर प्राणायामपरायण
हो जाते हैं।
जिसे श्रीकृष्ण प्राण-अपान कहते हैं, उसी को महात्मा बुद्ध ‘अनापान’
कहते हैं। इसी को उन्होंने श्वास-प्रश्वास भी कहा है। प्राण वह श्वास है जिसे
आप भीतर खींचते हैं और अपान वह श्वास है जिसे आप बाहर छोड़ते हैं।
योगियों की अनुभूति है कि आप श्वास के साथ बाह्य वायुमण्डल के संकल्प
भी ग्रहण करते हैं और प्रश्वास में इसी प्रकार आन्तरिक भले-बुरे चिन्तन की
लहर फेंकते रहते हैं। बाह्य किसी संकल्प का ग्रहण न करना प्राण का हवन है
तथा भीतर संकल्पों को न उठने देना अपान का हवन है। न भीतर से किसी
संकल्प का स्फुरण हो और न ही बाह्य दुनिया में चलनेवाले चिन्तन अन्दर
क्षोभ उत्पन्न कर पायें, इस प्रकार प्राण और अपान दोनों की गति सम हो जाने
पर प्राणों का याम अर्थात् निरोध हो जाता है, यही प्राणायाम है। यह मन की
विजितावस्था है। प्राणों का रुकना और मन का रुकना एक ही बात है।
११८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
प्रत्येक महापुरुष ने इस प्रकरण को लिया है। वेदों में इसका उल्लेख
है- ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि’ (ऋग्वेद १/१६४/४५, अथर्ववेद
९/१५/२७) इसी को ‘पूज्य महाराज जी’ कहा करते थे- “हो ! एक ही नाम
चार श्रेणियों से जपा जाता है- बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। बैखरी उसे
कहते हैं जो व्यक्त हो जाय। नाम का इस प्रकार उच्चारण हो कि आप सुनें और
बाहर कोई बैठा हो तो उसे भी सुनायी पड़े। मध्यमा अर्थात् मध्यम स्वर में
जप, जिसे केवल आप ही सुनें, बगल में बैठा हुआ व्यक्ति भी उस उच्चारण
को सुन न सके। यह उच्चारण कण्ठ से होता है। धीरे-धीरे नाम की धुन बन
जाती है, डोर लग जाती है। साधना और सूक्ष्म हो जाने पर पश्यन्ती अर्थात्
नाम देखने की अवस्था आ जाती है। फिर नाम को जपा नहीं जाता, यही नाम
श्वास में ढल जाता है। मन को द्रष्टा बनाकर खड़ा कर दें, देखते भर रहें कि
साँस आती है कब? बाहर निकलती है कब? कहती है क्या?” महापुरुषों का
कहना है कि यह साँस नाम के सिवाय और कुछ कहती ही नहीं। साधक नाम
का जप नहीं करता, केवल उससे उठनेवाली धुन को सुनता है। साँस को
देखता भर है, इसलिये इसे ‘पश्यन्ती’ कहते हैं।
पश्यन्ती में मन को द्रष्टा के रूप में खड़ा करना पड़ता है; किन्तु साधन
और उन्नत हो जाने पर सुनना भी नहीं पड़ता। एक बार सुरत लगा भर दें, स्वतः
सुनायी देगा। ‘जपै न जपावै, अपने से आवै।’- न स्वयं जपें, न मन को
सुनने के लिए बाध्य करें और जप चलता रहे, इसी का नाम है अजपा। ऐसा
नहीं कि जप प्रारम्भ ही न करें और आ गयी अजपा। यदि किसी ने जप नहीं
आरम्भ किया, तो अजपा नाम की कोई भी वस्तु उसके पास नहीं होगी।
अजपा का अर्थ है, हम न जपें किन्तु जप हमारा साथ न छोड़े। एक बार सुरत
का काँटा लगा भर दें तो जप प्रवाहित हो जाय और अनवरत चलता रहे। इस
स्वाभाविक जप का नाम है अजपा और यही है ‘परावाणी का जप’। यह
प्रकृति से परे तत्त्व परमात्मा में प्रवेश दिलाती है। इसके आगे वाणी में कोई
परिवर्तन नहीं है। परम का दिग्दर्शन कराके उसी में विलीन हो जाती है,
इसीलिये इसे परा कहते हैं।
चतुर्थ अध्याय १११९
प्रस्तुत श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने केवल श्वास पर ध्यान रखने को
कहा, जबकि आगे स्वयं ओम् के जप पर बल देते हैं। गौतम बुद्ध भी
'अनापान सती' में श्वास-प्रश्वास की ही चर्चा करते हैं। अन्ततः वे महापुरुष
कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः प्रारम्भ में बैखरी, उससे मध्यमा और उससे
उन्नत होने पर जप की पश्यन्ती अवस्था में श्वास पकड़ में आता है। उस समय
जप तो श्वास में ढला मिलेगा, फिर जपें क्या? फिर तो केवल श्वास को
देखना भर है। इसलिये प्राण-अपान मात्र कहा, 'नाम जपो' - ऐसा नहीं कहा,
कारण कि कहने की आवश्यकता नहीं है। यदि कहते हैं तो गुमराह होकर नीचे
की श्रेणियों में चक्कर काटने लगेगा। महात्मा बुद्ध, 'गुरुदेव भगवान' तथा
प्रत्येक महापुरुष जो इस रास्ते से गुजरे हैं, सभी एक ही बात कहते हैं। बैखरी
और मध्यमा नाम-जप के प्रवेश-द्वार मात्र हैं। पश्यन्ती से ही नाम में प्रवेश
मिलता है। परा में नाम धारावाही हो जाता है, जिससे जप साथ नहीं छोड़ता।
मन श्वास के साथ जुड़ा है। जब श्वास पर दृष्टि है, श्वास में नाम ढल
चुका है, भीतर से न तो किसी संकल्प का उत्थान है और न बाह्य वायुमण्डल
के संकल्प भीतर प्रवेश कर पाते हैं, यही मन पर विजय की अवस्था है। इसी
के साथ यज्ञ का परिणाम निकल आता है।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३०॥
दूसरे नियमित आहार करनेवाले प्राण को प्राण में ही हवन करते हैं।
'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि, “योगी का आहार दृढ़, आसन दृढ़ और
निद्रा दृढ़ होनी चाहिये।” आहार-विहार पर नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। ऐसे
अनेक योगी प्राण को प्राण में ही हवन कर देते हैं अर्थात् श्वास लेने पर ही
ध्यान केन्द्रित रखते हैं, प्रश्वास पर ध्यान नहीं देते। साँस आयी तो सुना
'ओम्', पुनः साँस आयी तो 'ओम्' सुनते रहें। इस प्रकार यज्ञों द्वारा नष्ट
पापवाले ये सभी पुरुष यज्ञ के जानकार हैं। इन निर्दिष्ट विधियों में से यदि कहीं
से भी करते हैं तो वे सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं। अब यज्ञ का परिणाम बताते हैं-