यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
८० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३॥
क्योंकि यदि मैं सावधान होकर कदाचित् कर्म में न बरतूँ तो मनुष्य मेरे
बर्ताव के अनुसार बरतने लग जायेंगे। तो क्या आपका अनुकरण भी बुरा है?
श्रीकृष्ण कहते हैं- हाँ!
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥२४॥
यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ तो यह सब लोक भ्रष्ट हो जायें
और मैं 'संकरस्य'- वर्णसंकर का करनेवाला होऊँ तथा इस सारी प्रजा का
हनन करनेवाला, मारनेवाला बनूँ।
स्वरूप में स्थित महापुरुष सतर्क रहकर यदि आराधना-क्रम में न लगे
रहें तो समाज उनकी नकल करके भ्रष्ट हो जायेगा। महापुरुष ने तो आराधना
पूर्ण करके परम नैष्कर्म्य की स्थिति को पाया है। वे न करें तो उनके लिये कोई
हानि नहीं है; किन्तु समाज ने तो अभी आराधना आरम्भ ही नहीं की। पीछेवालों
के मार्गदर्शन के लिये ही महापुरुष कर्म करते हैं, मैं भी करता हूँ अर्थात्
श्रीकृष्ण एक महापुरुष थे, न कि बैकुण्ठ से आये हुए कोई विशेष भगवान।
उन्होंने कहा कि- महापुरुष लोकसंग्रह के लिये कर्म करता है, मैं भी करता हूँ।
यदि न करूँ तो लोगों का पतन हो जाय, सभी कर्म छोड़ बैठेंगे।
मन बड़ा चंचल है। यह सब कुछ चाहता है, केवल भजन नहीं चाहता।
यदि स्वरूपस्थ महापुरुष कर्म न करें तो देखादेखी पीछेवाले भी तुरन्त कर्म
छोड़ देंगे। उन्हें बहाना मिल जायेगा कि ये भजन नहीं करते, पान खाते हैं, इत्र
लगाते हैं, सामान्य बातें करते हैं फिर भी महापुरुष कहलाते हैं- ऐसा सोचकर
वे भी आराधना से हट जाते हैं, पतित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि
मैं कर्म न करूँ तो सब भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकर का कर्त्ता बनूँ।
स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर तो देखा-सुना जाता है। अर्जुन भी
इसी भय से विकल था कि स्त्रियाँ दूषित होंगी तो वर्णसंकर पैदा होगा; किन्तु
तृतीय अध्याय ८१
श्रीकृष्ण कहते हैं- यदि मैं सावधान होकर आराधना में लगा न रहूँ तो
वर्णसंकर का कर्त्ता होऊँ। वस्तुतः आत्मा का शुद्ध वर्ण है परमात्मा। अपने
शाश्वत स्वरूप के पथ से भटक जाना वर्णसंकरता है। यदि स्वरूपस्थ महापुरुष
क्रिया में नहीं बरतते तो लोग उनके अनुकरण से क्रियारहित हो जायेंगे,
आत्मपथ से भटक जायेंगे, वर्णसंकर हो जायेंगे। वे प्रकृति में खो जायेंगे।
स्त्रियों का सतीत्व एवं नस्ल की शुद्धता एक सामाजिक व्यवस्था है,
अधिकारों का प्रश्न है, समाज के लिये उसकी उपयोगिता भी है; किन्तु माता-
पिता की भूलों का सन्तान की साधना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'आपन
करनी पार उतरनी।' हनुमान, व्यास, वशिष्ठ, नारद, शुकदेव, कबीर, ईसा
इत्यादि अच्छे महापुरुष हुए, जबकि सामाजिक कुलीनता से इनका सम्पर्क
नहीं है। आत्मा अपने पूर्वजन्म के गुणधर्म लेकर आता है। श्रीकृष्ण कहते हैं-
'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।' (१५/७)- मनसहित इन्द्रियों
से जो कार्य इस जन्म में होता है, उनके संस्कार लेकर जीवात्मा पुराने शरीर
को त्यागकर नवीन शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसमें जन्मदाताओं का क्या
लगा? उनके विकास में कोई अन्तर नहीं आया। अतः स्त्रियों के दूषित होने
से वर्णसंकर नहीं होता। स्त्रियों के दूषित होने और वर्णसंकर से कोई सम्बन्ध
नहीं है। शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर न होकर प्रकृति में बिखर जाना ही
वर्णसंकरता है।
यदि महापुरुष सावधान होकर क्रिया (नियत कर्म) में बरतते हुए लोगों
से क्रिया न कराये तो वह उस सारी प्रजा का हनन करनेवाला, मारनेवाला बने।
साधना-क्रम में चलकर उस मूल अविनाशी की प्राप्ति ही जीवन है और
प्रकृति में बिखरे रहना, भटक जाना ही मृत्यु है। किन्तु वह महापुरुष इस सारी
प्रजा को यदि क्रिया-पथ पर नहीं चलाता, इस सारी प्रजा को बिखराव से
रोककर सत्पथ पर नहीं चलाता तो वह सारी प्रजा का हनन करनेवाला हत्यारा
है, हिंसक है और क्रमशः चलते हुए जो चला लेता है वह शुद्ध अहिंसक है।
गीता के अनुसार शरीरों का निधन, नश्वर कलेवरों का निधन मात्र परिवर्तन
है, हिंसा नहीं।
८२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥२५॥
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही
अनासक्त हुआ विद्वान्, पूर्णज्ञाता भी लोक-हृदय में प्रेरणा और कल्याण-
संग्रह चाहता हुआ कर्म करे। यज्ञ की विधि जानते और करते हुए भी हम
अज्ञानी हैं। ज्ञान का अर्थ है प्रत्यक्ष जानकारी। जब तक लेशमात्र भी हम
अलग हैं, आराध्य अलग है तब तक अज्ञान विद्यमान है। जब तक अज्ञान है,
तब तक कर्म में आसक्ति रहती है। अज्ञानी जितनी आसक्ति से आराधना
करता है, उसी प्रकार अनासक्त। जिसे कर्मों से प्रयोजन नहीं है तो आसक्ति
क्यों होगी? ऐसा पूर्णज्ञाता महापुरुष भी लोकहित के लिये कर्म करे, दैवी
सम्पद् का उत्कर्ष करे, जिससे समाज उस पर चल सके।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥२६॥
ज्ञानी पुरुषों को चाहिये कि कर्मों में आसक्तिवाले अज्ञानियों की बुद्धि
में भ्रम न पैदा करें अर्थात् स्वरूपस्थ महापुरुष ध्यान दें कि उनके किसी
आचरण से पीछेवालों के मन में कर्म के प्रति अश्रद्धा न उत्पन्न हो जाय।
परमात्मतत्त्व से संयुक्त महापुरुष को भी चाहिये कि स्वयं भली प्रकार नियत
कर्म करता हुआ उनसे करावे।
यही कारण था कि 'पूज्य महाराज जी' वृद्धावस्था में भी रात के दो बजे
ही उठकर बैठ जायें, खाँसने लगें। तीन बजे बोलने लगें- "उठो मिट्टी के
पुतलो!" सब उठकर चिन्तन में लग जायें, तो स्वयं थोड़ा लेट जायें। कुछ देर
बाद फिर उठकर बैठ जायें। कहें- "तुम लोग सोचते हो कि महाराज सो रहे
हैं; किन्तु मैं सोता नहीं, श्वास में लगा हूँ। वृद्धावस्था का शरीर है, बैठने में
कष्ट होता है इसी से मैं पड़ा रहता हूँ, लेकिन तुम्हें तो स्थिर और सीधे बैठकर
चिन्तन में लगना है। जब तक तैलधारा के सदृश श्वास की डोरी न लग जाय,
क्रम न टूटे, अन्य संकल्प बीच में व्यवधान उत्पन्न न कर सकें, तब तक सतत
लगे रहना साधक का धर्म है। मेरी श्वास तो बाँस की तरह स्थिर खड़ी है।"
तृतीय अध्याय ८३
यही कारण है कि अनुयायियों से कराने के लिये वह महापुरुष भली प्रकार
कर्म में बरतता है। 'जिस गुन को सिखावै, उसे करके दिखावै।'
इस प्रकार स्वरूपस्थ महापुरुष को भी चाहिये कि स्वयं कर्म करता
हुआ साधकों को भी आराधना में लगाये रहे। साधक भी श्रद्धापूर्वक आराधना
में लगें। किन्तु चाहे ज्ञानयोगी हो अथवा समर्पण भाववाला निष्काम कर्मयोगी
हो, साधक में साधना का अहंकार नहीं आना चाहिये। कर्म किसके द्वारा होते
हैं, उसके होने में कौन कारण हैं? इस पर श्रीकृष्ण प्रकाश डालते हैं-
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।२७।।
आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं फिर भी
अहंकार से विशेष मूढ़ पुरुष 'मैं कर्त्ता हूँ'- ऐसा मान लेता है। यह कैसे माना
जाय कि आराधना प्रकृति के गुणों द्वारा होती है? ऐसा किसने देखा? इस पर
कहते हैं-
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।२८।।
हे महाबाहो! गुण और कर्म के विभाग को 'तत्त्ववित्'- परमतत्त्व
परमात्मा की जानकारीवाले महापुरुषों ने देखा और सम्पूर्ण गुण गुणों में बरत
रहे हैं, ऐसा मानकर वे गुण और कर्मों के कर्त्तापन में आसक्त नहीं होते।
यहाँ तत्त्व का अर्थ परमतत्त्व परमात्मा है, न कि पाँच या पचीस तत्त्व-
जैसा कि लोग गणना करते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में तत्त्व एकमात्र
परमात्मा है, अन्य कोई तत्त्व है ही नहीं। गुणों को पार करके परमतत्त्व
परमात्मा में स्थित महापुरुष गुण के अनुसार कर्मों का विभाजन देख पाते हैं।
तामसी गुण रहेगा तो उसका कार्य होगा- आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्म में प्रवृत्त
न होने का स्वभाव। राजसी गुण रहेंगे तो आराधना से पीछे न हटने का
स्वभाव, शौर्य, स्वामिभाव से कर्म होगा और सात्त्विक गुण कार्यरत होने पर
ध्यान, समाधि, अनुभवी उपलब्धि, धारावाहिक चिन्तन, सरलता स्वभाव में
८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
होगी। गुण परिवर्तनशील हैं। प्रत्यक्षदर्शी ज्ञानी ही देख पाता है कि गुणों के
अनुरूप कर्मों का उत्कर्ष-अपकर्ष होता है। गुण अपना कार्य करा लेते हैं,
अर्थात् गुण गुणों में बरतते हैं- ऐसा समझकर वह प्रत्यक्ष द्रष्टा कर्म में आसक्त
नहीं होता। किन्तु जिन्होंने गुणों का पार नहीं पाया, जो अभी रास्ते में हैं उन्हें तो
कर्म में आसक्त रहना है। इसलिये-
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।२९।।
प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्मों में क्रमशः निर्मल
गुणों की ओर उन्नति देखकर उनमें आसक्त होते हैं। उन अच्छी प्रकार न
समझनेवाले 'मन्दान्'- शिथिल प्रयत्नवालों को अच्छी प्रकार जाननेवाला
ज्ञानी चलायमान न करे। उन्हें हतोत्साहित न करे बल्कि प्रोत्साहन दे; क्योंकि
कर्म करके ही उन्हें परम नैष्कर्म्य की स्थिति को पाना है। अपनी शक्ति और
स्थिति का आकलन करके कर्म में प्रवृत्त होनेवाले ज्ञानमार्गी साधकों को
चाहिये कि कर्म को गुणों की देन मानें, अपने को कर्त्ता मानकर अहंकारी न
बन जायँ, निर्मल गुणों के प्राप्त होने पर भी उनमें आसक्त न हों। किन्तु
निष्काम कर्मयोगी को कर्म और गुणों के विश्लेषण में समय देने की कोई
आवश्यकता नहीं है। उसे तो बस समर्पण के साथ कर्म करते जाना है। कौन
गुण आ-जा रहा है, यह देखना इष्ट की जिम्मेदारी हो जाती है। गुणों का
परिवर्तन और क्रम-क्रम से उत्थान वह इष्ट की ही देन मानता है और कर्म होने
को भी उन्हीं की देन मानता है। अतः कर्त्तापन का अहंकार या गुणों में
आसक्ति होने की समस्या उसके लिये नहीं रहती, जबकि अनवरत लगा रहता
है। इसी पर और साथ ही युद्ध का स्वरूप बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।३०।।
इसलिये अर्जुन! तू 'अध्यात्मचेतसा'- अन्तरात्मा में चित्त का निरोध
करके, ध्यानस्थ होकर, सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित,
तृतीय अध्याय ८५
ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर। जब चित्त ध्यान में स्थित है,
लेशमात्र भी कहीं आशा नहीं, कर्म में ममत्व नहीं है, असफलता का सन्ताप
नहीं है तो वह पुरुष कौन-सा युद्ध करेगा? जब सब ओर से चित्त सिमटकर
हृदय-देश में निरुद्ध होता जा रहा है तो वह लड़ेगा किसलिये, किससे और
वहाँ है कौन? वास्तव में जब आप ध्यान में प्रवेश करेंगे तभी युद्ध का सही
स्वरूप खड़ा होता है, तो काम-क्रोध, राग-द्वेष, आशा-तृष्णा इत्यादि विकारों
का समूह विजातीय प्रवृत्तियाँ जो 'कुरु' कहलाती हैं, संसार में प्रवृत्ति देती ही
रहती हैं। बाधा के रूप में भयंकर आक्रमण करती हैं। बस, इनका पार पाना ही
युद्ध है। इनको मिटाते हुए अन्तरात्मा में सिमटते जाना, ध्यानस्थ होते जाना ही
यथार्थ युद्ध है। इसी पर पुनः बल देते हैं-
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥३१॥
अर्जुन! जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित होकर, श्रद्धाभाव समर्पण से
संयुक्त हुए सदा मेरे इस मत के अनुसार बरतते हैं कि 'युद्ध कर', वे पुरुष भी
सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं। योगेश्वर का यह आश्वासन किसी हिन्दू,
मुसलमान या ईसाई के लिए नहीं अपितु मानवमात्र के लिए है। उनका मत है
कि युद्ध कर! इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह उपदेश युद्धवालों के लिये है।
अर्जुन के समक्ष सौभाग्य से विश्वयुद्ध की संरचना थी, आपके सामने तो कोई
युद्ध नहीं है, आप गीता के पीछे क्यों पड़े हैं; क्योंकि कर्मों से छूटने का उपाय
तो युद्ध करनेवालों के लिये है? किन्तु ऐसा कुछ नहीं है। वस्तुतः यह अन्तर्देश
की लड़ाई है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का, विद्या और अविद्या का, धर्मक्षेत्र और
कुरुक्षेत्र का संघर्ष है। आप ज्यों-ज्यों ध्यान में चित्त का निरोध करेंगे तो
विजातीय प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में प्रत्यक्ष होती हैं, भयंकर आक्रमण करती
हैं। उनका शमन करते हुए चित्त का निरोध करते जाना ही युद्ध है। जो दोषदृष्टि
से रहित होकर श्रद्धा के साथ इस युद्ध में लगता है वह कर्मों के बन्धन से,
आवागमन से भली प्रकार छुटकारा पा जाता है। जो इस युद्ध में प्रवृत्त नहीं
होता, उसकी क्या गति होती है? इस पर कहते हैं-
८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥३२॥
जो दोषदृष्टिवाले 'अचेतसः'- मोहनिशा में अचेत लोग मेरे इस मत के
अनुसार नहीं बरतते अर्थात् ध्यानस्थ होकर आशा, ममता और सन्तापरहित
होकर समर्पण के साथ युद्ध नहीं करते, 'सर्वज्ञानविमूढान्'- ज्ञान-पथ में
सर्वथा मोहित उन लोगों को तू कल्याण से भ्रष्ट हुआ ही जान। जब यही सही
है तो लोग करते क्यों नहीं? इस पर कहते हैं-
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३॥
सभी प्राणी अपनी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। अपने स्वभाव से परवश
होकर कर्म में भाग लेते हैं। प्रत्यक्षदर्शी ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार
चेष्टा करता है। प्राणी अपने कर्मों में बरतते हैं और ज्ञानी अपने स्वरूप में।
जैसा जिसकी प्रकृति का दबाव है, वैसा ही कार्य करता है। यह स्वयंसिद्ध है।
इसमें निराकरण कोई क्या करेगा? यही कारण है कि सभी लोग मेरे मत के
अनुसार कर्म में प्रवृत्त नहीं हो पाते। वे आशा, ममता, संताप का; दूसरे शब्दों
में राग-द्वेष का त्याग नहीं कर पाते, जिससे कर्म का सम्यक् आचरण नहीं हो
पाता। इसी को और स्पष्ट करते हैं और दूसरा कारण बताते हैं-
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥३४॥
इन्द्रिय और इन्द्रियों के भोगों में राग और द्वेष स्थित हैं। इन दोनों के वश
में नहीं होना चाहिये; क्योंकि इस कल्याण-मार्ग में कर्मों से छूट जानेवाली
प्रणाली में ये राग और द्वेष दुर्धर्ष शत्रु हैं, आराधना का अपहरण कर ले जाते
हैं। जब शत्रु भीतर हैं तो बाहर कोई किसी से क्यों लड़ेगा? शत्रु तो इन्द्रिय और
भोगों के संसर्ग में हैं, अन्तःकरण में हैं, अतः यह युद्ध भी अन्तःकरण का युद्ध
है। क्योंकि शरीर ही क्षेत्र है, जिसमें सजातीय और विजातीय दोनों प्रवृत्तियाँ,
विद्या और अविद्या रहती हैं, जो माया के दो अंग हैं। इन्हीं प्रवृत्तियों का पार
तृतीय अध्याय ८७
पाना, सजातीय प्रवृत्ति को साधकर विजातीय का अन्त करना युद्ध है। विजातीय
समाप्त होने पर सजातीय का उपयोग समाप्त हो जाता है। स्वरूप का स्पर्श
करके सजातीय का भी उसके अन्तराल में विलय हो जाना, इस प्रकार प्रकृति
का पार पाना युद्ध है, जो ध्यान में ही सम्भव है।
राग और द्वेष के शमन में समय लगता है, इसलिये बहुत से साधक
क्रिया को छोड़कर सहसा महापुरुष की नकल करने लग जाते हैं। श्रीकृष्ण
इससे सावधान करते हैं-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।३५।।
एक साधक दस वर्ष से साधना में लगा हुआ है और दूसरा आज
साधना में प्रवेश ले रहा है। दोनों की क्षमता एक-जैसी नहीं होगी। प्रारम्भिक
साधक यदि उसकी नकल करता है तो नष्ट हो जायेगा। इसी पर श्रीकृष्ण कहते
हैं कि अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना
धर्म अधिक उत्तम है। स्वभाव से उत्पन्न कर्म में प्रवृत्त होने की क्षमता स्वधर्म
है। अपनी क्षमता के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होने से साधक एक-न-एक दिन
पार पा जाता है। अतः स्वधर्माचरण में मरना भी परम कल्याणकारी है। जहाँ
से साधन छूटेगा, शरीर मिलने पर वहीं से पुनः प्रारम्भ होगा। आत्मा तो मरता
नहीं, शरीर (वस्त्र) बदलने से आपके बुद्धि, विचार बदल तो नहीं जाते?
आगेवालों की तरह स्वांग बनाने से साधक भय को प्राप्त होगा। भय प्रकृति में
होता है, परमात्मा में नहीं। प्रकृति का आवरण और घना हो उठेगा।
इस भगवत्पथ में नकल का बाहुल्य है। 'पूज्य महाराज जी' को एक
बार आकाशवाणी हुई कि अनुसुइया जाकर रहें, तो जम्मू से चित्रकूट आये
और अनुसुइया के घोर जंगल में निवास करने लगे। बहुत से महात्मा उधर से
आते-जाते थे। एक ने देखा कि परमहंस जी दिगम्बर, नंग-धड़ंग निवास करते
हैं, उनका सम्मान है, तो तुरन्त उन्होंने कौपीन फेंका, दण्ड-कमण्डल एक
अन्य महात्मा को दे दिया और दिगम्बर हो गये। कुछ काल बाद आये तो देखा
कि परमहंस जी लोगों से बातें भी करते हैं, गालियाँ भी देते हैं। महाराज जी को
८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
आदेश हुआ था कि भक्तों के कल्याणार्थ कुछ ताड़ना दिया करें, इस पथ के
पथिकों पर निगरानी रखें। महाराज जी की नकल कर वे महात्मा भी गालियाँ
देने लगे; किन्तु बदले में लोग भी कुछ-न-कुछ कह बैठते थे। वे महात्मा
कहने लगे-यहाँ कोई बोलता नहीं, यहाँ तो जवाब देते हैं।
दो-एक साल बाद लौटे तो देखा कि परमहंस जी गद्दे पर बैठे हैं, लोग
पंखा झल रहे हैं, चँवर चल रहे हैं। उन्होंने जंगल के ही एक खण्डहर में तख्त
मँगाया, गद्दे बिछवाये, दो आदमियों को चँवर चलाने के लिये नियुक्त कर
दिया। हर सोमवार को भीड़ भी लगाने लगे कि पुत्र चाहिये तो पचास रुपये,
पुत्री चाहिये तो पचीस रुपये। किन्तु ‘उघरहिं अन्त न होइ निबाहू।’
( रामचरितमानस, १/६/६ )- एक महीने में ही कौड़ी के दो होकर चल
दिये। इस भगवत्पथ में नकल साथ नहीं देता। साधक को स्वधर्म का ही
आचरण करना चाहिये।
स्वधर्म क्या है? अध्याय दो में श्रीकृष्ण ने स्वधर्म का नाम लिया कि
स्वधर्म को देखकर भी तू युद्ध करने योग्य है। क्षत्रिय के लिये इससे बढ़कर
कल्याणकारी मार्ग नहीं है। स्वधर्म में अर्जुन क्षत्रिय पाया जाता है। संकेत
किया कि- अर्जुन ! जो ब्राह्मण हैं, वेदों का उपदेश उनके लिये क्षुद्र जलाशय
के तुल्य है। तू वेदों से ऊपर उठ और ब्राह्मण बन अर्थात् स्वधर्म में परिवर्तन
सम्भव है। वहाँ पुनः कहा कि राग-द्वेष के वश में न हो, इन्हें काट। स्वधर्म
श्रेयस्कर है- इसका यह आशय नहीं है कि अर्जुन किसी ब्राह्मण की नकल
करके उस-जैसी वेशभूषा बना ले।
एक ही कर्मपथ को महापुरुष ने चार श्रेणियों में बाँट दिया-निकृष्ट,
मध्यम, उत्तम और अति उत्तम। इन श्रेणी के साधकों को क्रमशः शूद्र, वैश्य,
क्षत्रिय और ब्राह्मण की संज्ञा दी। शूद्रवाली क्षमता से कर्म का आरम्भ होता है
और साधना-क्रम में वही साधक ब्राह्मण बन जाता है। इससे भी आगे जब वह
परमात्मा में प्रवेश पा जाता है, तो ‘न ब्राह्मणो न क्षत्रियः न वैश्यो न शूद्रः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।’ वह वर्णों से ऊपर हो जाता है। यही
श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’- चार वर्णों की रचना मैंने
तृतीय अध्याय ८९
की। तो क्या जन्म के आधार पर मनुष्यों को बाँटा? नहीं, 'गुणकर्म विभागशः'-
गुणों के आधार पर कर्म बाँटा गया। कौन-सा कर्म? क्या सांसारिक कर्म?
श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, नियत कर्म। नियत कर्म क्या है? वह है यज्ञ की
प्रक्रिया, जिसमें होता है श्वास में प्रश्वास का हवन, प्रश्वास में श्वास का
हवन, इन्द्रिय-संयम इत्यादि, जिसका शुद्ध अर्थ है योग-साधना, आराधना।
आराध्य देव तक पहुँचानेवाली विधि-विशेष ही आराधना है। इस आराधना-
कर्म को ही चार श्रेणियों में बाँटा गया। जैसी क्षमतावाला पुरुष हो, उसे उसी
श्रेणी से प्रारम्भ करना चाहिये। यही सबका अपना-अपना स्वधर्म है। यदि वह
आगेवालों की नकल करेगा तो भय को प्राप्त होगा। सर्वथा नष्ट तो नहीं होगा
क्योंकि इसमें बीज का नाश तो नहीं होता; हाँ, वह प्रकृति के दबाव से
भयाक्रान्त, दीन-हीन अवश्य हो जायेगा। शिशु कक्षा का विद्यार्थी स्नातक
कक्षा में बैठने लगे तो स्नातक क्या बनेगा, वह प्रारम्भिक वर्णमाला से भी
वंचित रह जायेगा। अर्जुन प्रश्न रखता है कि मनुष्य स्वधर्म का आचरण क्यों
नहीं कर पाता?-
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।३६।।
हे श्रीकृष्ण ! फिर यह पुरुष बरबस घसीटकर लगाये हुए के सदृश न
चाहता हुआ भी किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करता है? आपके मत के
अनुसार क्यों नहीं चल पाता? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।३७।।
अर्जुन! रजोगुण से उत्पन्न यह काम और यह क्रोध अग्नि के समान
भोग भोगने से कभी न तृप्त होनेवाले बड़े पापी हैं। काम-क्रोध राग-द्वेष के ही
पूरक हैं। अभी मैंने जिसकी चर्चा की है, इस विषय में तू उनको ही शत्रु जान।
अब इनका प्रभाव बताते हैं-
९० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८॥
जैसे धुएँ से अग्नि और मल से दर्पण ढँक जाता है, जैसे जेर से गर्भ
ढँका हुआ है, ठीक वैसे ही काम-क्रोधादि विकारों से यह ज्ञान ढँका हुआ है।
भींगी लकड़ी जलाने पर धुआँ-ही-धुआँ होता है। अग्नि रहकर भी लपट का
रूप नहीं ले पाती। मल से ढँके दर्पण पर जिस प्रकार प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं
होता, झिल्ली के कारण जिस प्रकार गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही इन विकारों के
रहते परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९॥
कौन्तेय! अग्नि के समान भोगों से न तृप्त होनेवाले, ज्ञानियों के निरन्तर
बैरी इस काम से ज्ञान ढँका हुआ है। अभी तो श्रीकृष्ण ने काम और क्रोध दो
शत्रु बताये। प्रस्तुत श्लोक में वे केवल एक शत्रु काम का नाम लेते हैं। वस्तुतः
काम में क्रोध का अन्तर्भाव है। कार्य पूर्ण होने पर क्रोध समाप्त हो जाता है;
किन्तु कामना समाप्त नहीं होती। कामना-पूर्ति में व्यवधान पड़ते ही क्रोध
पुनः उभर आता है। काम के अन्तराल में क्रोध भी निहित है। इस शत्रु का
निवास कहाँ है? इसे ढूँढ़े कहाँ? निवास जान लेने पर इसे समूल नष्ट करने में
सुविधा रहेगी। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४०॥
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन
मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को
मोह में डालता है।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१॥
इसलिए अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को ‘नियम्य’– संयत कर; क्योंकि
तृतीय अध्याय ९१
शत्रु तो इनके अन्तराल में छिपा है। वह तुम्हारे शरीर के भीतर है। बाहर
खोजने से वह कहीं नहीं मिलेगा। यह हृदय-देश की, अन्तर्जगत् की लड़ाई है।
इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करनेवाले इस पापी काम
को ही मार। काम सीधे पकड़ में नहीं आयेगा अतः विकारों के निवास-स्थान
का ही घेराव कर लो, इन्द्रियों को ही संयत कर लो। किन्तु इन्द्रियों और मन
को संयत करना तो बड़ा कठिन है, क्या यह हम कर पायेंगे? इस पर श्रीकृष्ण
आपकी सामर्थ्य बताते हुए प्रोत्साहित करते हैं-
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।४२।।
अर्जुन ! इस शरीर से तू इन्द्रियों को परे अर्थात् सूक्ष्म और बलवान्
जान। इन्द्रियों से परे मन है, यह उनसे भी बलवान् है। मन से परे बुद्धि है और
जो बुद्धि से भी अत्यन्त परे है, वह तुम्हारी आत्मा है। वही हो तुम। इसलिये
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि का निरोध करने में तुम सक्षम हो।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।४३।।
इस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात् सूक्ष्म और बलवान् अपने आत्मा को
जानकर, आत्मबल को समझकर, बुद्धि के द्वारा अपने मन को वश में करके
अर्जुन ! इस कामरूपी दुर्जय शत्रु को मार। अपनी शक्ति को समझकर इस
दुर्जय शत्रु को मार। काम एक दुर्जय शत्रु है। इन्द्रियों के द्वारा यह आत्मा को
मोहित करता है, तो अपनी शक्ति समझकर, आत्मा को बलवान् समझकर
कामरूपी शत्रु को मार। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह शत्रु आन्तरिक
है और युद्ध भी अन्तर्देश का ही है।
निष्कर्ष-
बहुधा गीताप्रेमी व्याख्याताओं ने इस अध्याय को 'कर्मयोग' नाम दिया
है; किन्तु यह संगत नहीं है। दूसरे अध्याय में योगेश्वर ने कर्म का नाम लिया।
उन्होंने कर्म के महत्त्व का प्रतिपादन कर उसमें कर्मजिज्ञासा जागृत की और
९२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस अध्याय में उन्होंने कर्म को परिभाषित किया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म
है। सिद्ध है कि यज्ञ कोई निर्धारित दिशा है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी किया
जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है। श्रीकृष्ण जिसे कहेंगे, वह कर्म
‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’– संसार-बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला कर्म है।
श्रीकृष्ण ने यज्ञ की उत्पत्ति को बताया। वह देता क्या है? उसकी
विशेषताओं का चित्रण किया। यज्ञ करने पर बल दिया। उन्होंने कहा, इस यज्ञ
की प्रक्रिया ही कर्म है। जो नहीं करते वे पापायु, आराम चाहनेवाले व्यर्थ जीते
हैं। पूर्व में होनेवाले महर्षियों ने भी इसे करके ही परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को
पाया। वे आत्मतृप्त हैं, उनके लिये कर्म की आवश्यकता नहीं है, फिर भी
पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिये वे भी कर्म में भली प्रकार लगे रहते थे। उन
महापुरुषों से श्रीकृष्ण ने अपनी तुलना की कि मेरा भी अब कर्म करने से कोई
प्रयोजन नहीं है; किन्तु मैं भी पीछेवालों के हित के लिये ही कर्म में बरतता हूँ।
श्रीकृष्ण ने स्पष्ट अपना परिचय दिया कि वे एक योगी थे।
उन्होंने कर्म में प्रवृत्त साधकों को चलायमान न करने को कहा; क्योंकि
कर्म करके ही उन साधकों को स्थिति प्राप्त करनी है। यदि नहीं करेंगे तो नष्ट
हो जायेंगे। इस कर्म के लिये ध्यानस्थ होकर युद्ध करना है। आँखें बन्द हैं,
इन्द्रियों से सिमटकर चित्त का निरोध हो चला तो युद्ध कैसा? उस समय
काम-क्रोध, राग-द्वेष बाधक होते हैं। इन विजातीय प्रवृत्तियों का पार पाना ही
युद्ध है। आसुरी सम्पद् कुरुक्षेत्र, विजातीय प्रवृत्ति को शनैः-शनैः छाँटते हुए
ध्यानस्थ होते जाना ही युद्ध है। वस्तुतः ध्यान में ही युद्ध है। यही इस अध्याय
का सारांश है, जिसमें न कर्म बताया न यज्ञ। यदि यज्ञ समझ में आ जाय तो
कर्म समझ में आये। अभी तो कर्म समझाया ही नहीं गया।
इस अध्याय में केवल स्थितप्रज्ञ महापुरुष के प्रशिक्षणात्मक पहलू पर
बल दिया गया। यह तो गुरुजनों के लिये निर्देश है। वे न भी करें तो उन्हें कोई
क्षति नहीं और न ऐसा करने में उनका अपना कोई लाभ ही है। किन्तु जिन
साधकों को परमगति अभीष्ट है उनके लिये विशेष कुछ कहा ही नहीं, तो यह
तृतीय अध्याय ९३
कर्मयोग कैसे है? कर्म का स्वरूप भी स्पष्ट नहीं है, जिसे किया जाय; क्योंकि
'यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है'- अभी तक उन्होंने इतना ही बताया। यज्ञ तो
बताया नहीं, कर्म का स्वरूप स्पष्ट कहाँ हुआ? हाँ, युद्ध का यथार्थ चित्रण
गीता में यहीं पाया जाता है।
सम्पूर्ण गीता पर दृष्टिपात करें तो अध्याय दो में कहा कि शरीर नाशवान्
है, अतः युद्ध कर। गीता में युद्ध का यही ठोस कारण बताया गया। आगे
ज्ञानयोग के सन्दर्भ में क्षत्रिय के लिये युद्ध ही कल्याण का एकमात्र साधन
बताया और कहा कि यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी।
कौन-सी बुद्धि? यही कि हार-जीत दोनों दृष्टियों में लाभ ही है, ऐसा समझकर
युद्ध कर। फिर अध्याय चार में कहा कि योग में स्थित रहकर हृदय में स्थित
अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार द्वारा काट। वह तलवार योग में है।
अध्याय पाँच से दस तक युद्ध की चर्चा तक नहीं है। ग्यारहवें अध्याय में
केवल इतना कहा कि ये शत्रु मेरे द्वारा पहले से ही मारे गये हैं, तू निमित्त मात्र
होकर खड़ा भर हो जा। यश को प्राप्त कर। ये तुम्हारे बिना भी मारे हुए हैं,
प्रेरक करा लेगा। तू इन मुर्दों को ही मार।
अध्याय पन्द्रह में संसार सुविरूढ़ मूलवाला पीपल वृक्ष-जैसा कहा
गया, जिसे असंगतारूपी शस्त्र द्वारा काटकर उस परमपद को खोजने का निर्देश
मिला। आगे के अध्यायों में युद्ध का उल्लेख नहीं है। हाँ, अध्याय सोलह में
असुरों का चित्रण अवश्य है, जो नरकगामी हैं। अध्याय तीन में ही युद्ध का
विशद चित्रण है। श्लोक ३० से श्लोक ४३ तक युद्ध का स्वरूप, उसकी
अनिवार्यता, युद्ध न करनेवालों का विनाश, युद्ध में मारे जानेवाले शत्रुओं के
नाम, उन्हें मारने के लिये अपनी शक्ति का आह्वान और निश्चय ही उन्हें
काटकर फेंकने पर बल दिया। इस अध्याय में शत्रु और शत्रु का आन्तरिक
स्वरूप स्पष्ट है, जिनके विनाश की प्रेरणा दी गयी है। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'शत्रुविनाशप्रेरणा' नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥
९४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘शत्रुविनाश-प्रेरणा’ नामक तीसरा
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘शत्रुविनाशप्रेरणा’ नाम
तृतीयोऽध्यायः।।३।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘शत्रुविनाश-प्रेरणा’ नामक तीसरा
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
चतुर्थोऽध्यायः यज्ञकर्म स्पष्टीकरण
॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने आश्वस्त किया कि दोषदृष्टि से
रहित होकर जो भी मानव श्रद्धायुक्त हो मेरे मत के अनुसार चलेगा, वह कर्मों
के बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाने की क्षमता
योग (ज्ञानयोग तथा कर्मयोग, दोनों) में है। योग में ही युद्ध-संचार निहित है।
प्रस्तुत अध्याय में वे बताते हैं कि इस योग का प्रणेता कौन है? इसका क्रमिक
विकास कैसे होता है?
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१॥
अर्जुन! मैंने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में विवस्वान्
(सूर्य) के प्रति कहा, विवस्वान् ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। किसने
कहा? मैंने। श्रीकृष्ण कौन थे? एक योगी। तत्त्वस्थित महापुरुष ही इस अविनाशी
योग को कल्प के आरम्भ में अर्थात् भजन के आरम्भ में विवस्वान् अर्थात् जो
विवश हैं, ऐसे प्राणियों से कहता है। सुरा में संचार कर देता है। यहाँ सूर्य एक
प्रतीक है; क्योंकि सुरा में ही वह परम प्रकाशस्वरूप है और वहीं उसके पाने
का विधान है। वास्तविक प्रकाशदाता (सूर्य) वहीं है।
यह योग अविनाशी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसमें आरम्भ का नाश नहीं
होता। इस योग का आरम्भ भर कर दें तो यह पूर्णत्व दिलाकर ही शान्त होता
है। शरीर का कल्प औषधियों द्वारा होता है; किन्तु आत्मा का भजन से होता
है। भजन का आरम्भ ही आत्म-कल्प का आदि है। यह साधन-भजन भी
किसी महापुरुष की ही देन है। मोहनिशा में अचेत आदिम मानव, जिसमें
९६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भजन का कोई संस्कार नहीं है, योग के विषय में जिसने कभी सोचा तक
नहीं, ऐसा मनुष्य किसी महापुरुष को देखता है तो उनके दर्शनमात्र से,
उनकी वाणी से, टूटी-फूटी सेवा और सान्निध्य से योग के संस्कार उसमें
संचारित हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी इसी को कहते हैं- 'जे चिताए
प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।', 'ते सब भए परम पद जोगू।' (रामचरितमानस,
२/२१६/१-२)।
श्रीकृष्ण कहते हैं- यह योग मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा। 'चक्षोः
सूर्यो अजायत'- महापुरुष के दृष्टि-निक्षेप मात्र से योग के संस्कार सुरा में
प्रसारित हो जाते हैं। स्वयंप्रकाश, स्ववश परमेश्वर का निवास सबके हृदय में
है। सुरा (श्वास) के निरोध से ही उसकी प्राप्ति का विधान है। सुरा में संस्कारों
का सृजन ही सूर्य के प्रति कहना है। समय आने पर यह संस्कार मन में स्फुरित
होगा, यही सूर्य का मनु से कहना है। मन में स्फुरित होने पर महापुरुष के उस
वाक्य के प्रति इच्छा जाग्रत हो जायेगी। यदि मन में कोई बात है तो उसे पाने
की इच्छा अवश्य होगी, यही मनु का इक्ष्वाकु से कहना है। लालसा होगी कि
वह नियत कर्म करें जो अविनाशी है, जो कर्म-बन्धन से मोक्ष दिलाता है-ऐसा
है तो किया जाय और आराधना गति पकड़ लेती है। गति पकड़कर यह योग
कहाँ पहुँचाता है? इस पर कहते हैं-
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।
इस प्रकार किसी महापुरुष द्वारा संस्काररहित पुरुषों की सुरा में, सुरा से
मन में, मन से इच्छा में और इच्छा तीव्र होकर क्रियात्मक आचरण में ढलकर
यह योग क्रमशः उत्थान करते-करते राजर्षि श्रेणी तक पहुँच जाता है, उस
अवस्था में जाकर विदित होता है। इस स्तर के साधक में ऋद्धियों-सिद्धियों
का संचार होता है। यह योग इस महत्त्वपूर्णकाल में इसी लोक (शरीर) में
प्रायः नष्ट हो जाता है। इस सीमा-रेखा को कैसे पार किया जाय? क्या इस
विशेष स्थल पर पहुँचकर सभी नष्ट हो जाते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, जो
मेरे आश्रित है, मेरा प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है वह नष्ट नहीं होता-
चतुर्थ अध्याय ९७
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३॥
वह ही यह पुरातन योग अब मैंने तेरे लिये वर्णन किया है; क्योंकि तू
मेरा भक्त और सखा है और यह योग उत्तम रहस्यपूर्ण है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी
का साधक था, राजर्षि की अवस्थावाला था, जहाँ ऋद्धियों-सिद्धियों के थपेड़े
में साधक नष्ट हो जाता है। इस काल में भी योग कल्याण की मुद्रा में ही है;
किन्तु प्रायः साधक यहाँ पहुँचकर लड़खड़ा जाते हैं। ऐसा अविनाशी किन्तु
रहस्यमय योग श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, क्योंकि नष्ट होने की अवस्था में
अर्जुन था ही। क्यों कहा? इसलिये कि तू मेरा भक्त है, अनन्य भाव से मेरे
आश्रित है, प्रिय है, सखा है।
जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह (सद्गुरु) परमात्मा आत्मा से
अभिन्न होकर जब निर्देशन देने लगे, तभी वास्तविक भजन आरम्भ होता है।
यहाँ प्रेरक की अवस्था में परमात्मा और सद्गुरु एक दूसरे के पर्याय हैं। जिस
सतह पर हम खड़े हैं उसी स्तर पर जब स्वयं प्रभु हृदय में उतर आयें, रोकथाम
करने लगें, डगमगाने पर सँभालें, तभी मन वश में हो पाता है- ‘तुलसिदास
( मन ) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।’ ( विनयपत्रिका, ८९ )
जब तक इष्टदेव रथी होकर, आत्मा से अभिन्न होकर प्रेरक के रूप में खड़े नहीं
हो जाते, तब तक सही मात्रा में प्रवेश ही नहीं होता। वह साधक प्रत्याशी
अवश्य है, लेकिन भजन उसके पास कहाँ?
पूज्य गुरुदेव भगवान कहा करते थे- “हो ! हम कई बार नष्ट होते-होते
बच गये। भगवान ने ही बचा लिया। भगवान ने ऐसे समझाया, यह कहा।”
हमने पूछा- “महाराज जी ! क्या भगवान भी बोलते हैं, बातचीत करते हैं? वे
बोले- “हाँ हो ! भगवान ऐसे बतियावत हैं जैसे हम-तुम बतियाईं, घण्टों
बतियाईं और क्रम न टूटे।” हमें उदासी हुई और आश्चर्य भी कि भगवान कैसे
बोलते होंगे, यह तो बड़ी नयी बात है। कुछ देर बाद महाराज जी बोले- “काहे
घबड़ात है! तोहूँ से बतियैहैं।” अक्षरशः सत्य था उनका कथन और यही
सख्यभाव है। सखा की तरह वे निराकरण करते रहें, तभी इस नष्ट होनेवाली
स्थिति से साधक पार हो पाता है।
९८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किसी महापुरुष द्वारा योग का आरम्भ,
उसमें आनेवाले व्यवधान और उनसे पार पाने का रास्ता बताया। इस पर
अर्जुन ने प्रश्न किया-
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४॥
भगवन्! आपका जन्म तो ‘अपरम्’- अब हुआ है और मेरे अन्दर सुरा
का संचार बहुत पुराना है, तो मैं कैसे मान लूँ कि इस योग को भजन के आदि
में आपने ही कहा था? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले-
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५॥
अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। हे परंतप! उन सबको
तू नहीं जानता; किन्तु मैं जानता हूँ। साधक नहीं जानता, स्वरूपस्थ महापुरुष
जानता है, अव्यक्त की स्थितिवाला जानता है। क्या आप सबकी तरह पैदा
होते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, स्वरूप की प्राप्ति शरीर-प्राप्ति से भिन्न है।
मेरा जन्म इन आँखों से नहीं देखा जा सकता। मैं अजन्मा, अव्यक्त, शाश्वत
होते हुए भी शरीर के आधारवाला हूँ।
अवधू जीवत में कर आसा।
मुए मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा।।
शरीर के रहते ही उस परमतत्त्व में प्रवेश पाया जाता है। लेशमात्र भी
कमी है, जन्म लेना पड़ता है। अभी तक अर्जुन श्रीकृष्ण को अपने समान
देहधारी समझता है। वह अन्तरंग प्रश्न रखता है- क्या आपका जन्म वैसा ही
है, जैसा सबका है? क्या आप भी शरीरों की तरह पैदा होते हैं? श्रीकृष्ण
कहते हैं-
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६॥
चतुर्थ अध्याय ९९
मैं विनाशरहित, पुनः जन्मरहित और समस्त प्राणियों के स्वर में संचारित
होने पर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके आत्ममाया से प्रकट होता हूँ। एक
माया तो अविद्या है जो प्रकृति में ही विश्वास दिलाती है, नीच एवं अधम
योनियों का कारण बनती है। दूसरी माया है आत्ममाया, जो आत्मा में प्रवेश
दिलाती है, स्वरूप के जन्म का कारण बनती है। इसी को योगमाया भी कहते
हैं। जिससे हम विलग हैं उस शाश्वत स्वरूप से यह जोड़ती है, मिलन कराती
है। उस आत्मिक प्रक्रिया द्वारा मैं अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अधीन करके
ही प्रकट होता हूँ।
प्रायः लोग कहते हैं कि भगवान का अवतार होगा तो दर्शन कर लेंगे।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होता कि कोई दूसरा देख सके। स्वरूप
का जन्म पिण्डरूप में नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं- योग-साधना द्वारा,
आत्ममाया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को स्ववश करके मैं क्रमशः प्रकट
होता हूँ। लेकिन किन परिस्थितियों में?-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।।
हे अर्जुन! जब-जब परमधर्म परमात्मा के लिये हृदय ग्लानि से भर
जाता है, जब अधर्म की वृद्धि से भाविक पार पाते नहीं देखता, तब मैं आत्मा
को रचने लगता हूँ। ऐसी ही ग्लानि मनु को हुई थी-
हृदयँ बहुत दुख लाग, जनम गयउ हरिभगति बिनु।।
( रामचरितमानस, १/१४२ )
जब आपका हृदय अनुराग से पूरित हो जाय, उस शाश्वत-धर्म के लिये
'गदगद गिरा नयन बह नीरा।' ( रामचरितमानस, ३/१५/११ ) की
स्थिति आ जाय, जब प्रयत्न करके भी अनुरागी अधर्म का पार नहीं पाता-
ऐसी परिस्थिति में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ। अर्थात् भगवान का
आविर्भाव केवल अनुरागी के लिये है- 'सो केवल भगतन हित लागी।'
( रामचरितमानस, १/१२/५ )