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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 421 में से

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पृष्ठ 317

उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
कल्याणकारी दृश्य देखें. हम स्वस्थ अंगों एवं स्वस्थ शरीर से आप की उपासना
और वंदना करते रहें. हम आप की कृपा से पूर्ण आयु प्राप्त करें. देवगण हमारा हित
साधने की कृपा करें. (२१)
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्.
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः.. (२२)
हे देवगण! आप की कृपा से हम सौ शरद तक जीएं. आप की कृपा से हम
सौ शरद तक स्वस्थ जीएं. आप की कृपा से हम सौ शरद यानी वृद्धावस्था तक
जीएं. जैसे पुत्र के लिए पिता होता है, वैसे ही हमें आप का संरक्षण मिले. जीवन
के बीच में हम कभी मृत्यु न पाएं. (२२)
अदितियोंरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः.
विश्वे देवा ऽ अदितिः पञ्च जना ऽ अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (२३)
स्वर्गलोक, अंतरिक्षलोक, जगत् माता, जगत् पिता व सभी देवगण अविनाशी
हैं. पांचों जन और जो कुछ उत्पन्न है, वह अविनाशी है. जो कुछ उत्पन्न होने वाला
है, वह अविनाशी है. (२३)
मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऽ ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन्.
यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि.. (२४)
मित्र, वरुण, अर्यमा, आयु, ऋभुक्ष देव, मरुद्गण इंद्र देव कभी भी हम से
विमुख न हों. देवताओं में जो बल उपजा है, हम उसी बल और उन के पराक्रम की
गाथा बारबार कहते हैं. (२४)
यन्निर्णिजा रेक्णसा प्रावृतस्य रातिं गृभीतां मुखतो नयन्ति.
सुप्राङ्जो मेम्यद्विश्वरूप ऽ इन्द्रापूष्णोः प्रियमप्येति पाथः.. (२५)
जब संस्कार युक्त ऐश्वर्यमय सब को आवृत्त करने वाले देवताओं के मुख के
पास हवि का अन्न ले जाया जाता है, तब अज रूप भी 'मैंमैं' करता हुआ पास आता
है. वह इंद्र देव और पूषा देव के इस प्रिय पदार्थ को प्राप्त करता है. (२५)
एष छागः पुरो अश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः.
अभिप्रियं यत्पुरोडाशमर्वता त्वष्टेदेन १७ सौश्रवसाय जिन्वति.. (२६)
यह बकरा जब शक्तिशाली घोड़े के सामने लाया जाता है तब यजमान चंचल
घोड़े के साथ बकरे को भी मीठा अन्न (पुरोडाश) प्रदान करता है. पुरोडाश सभी
को प्रिय लगता है और उस का उत्तम भाग दे कर यश पाया जाता है. (२६)
यद्धविष्यमृतुशो देवयानं त्रिर्मानुषाः पर्यश्वं नयन्ति.
अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग ऽ एति यज्ञं देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः.. (२७)
यजुर्वेद - ३१७