यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
अग्नि हजारों के लिए सुखदायी हैं व सैकड़ों संपदाओं से युक्त हैं. वे
अन्नाधिपति, मूर्धन्य, कवि व धनपति हैं. ( २१ )
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत. मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः... (२२)
हे अग्नि! अथर्वा ऋषि ने अरणि मंथन से आप को प्रकट किया. आप मूर्धन्य
और विश्ववाहक हैं. ( २२ )
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः.
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चक्रुषे हव्यवाहम्.. (२३)
हे अग्नि! आप भुवनलोक में यज्ञ के राजा व नेता हैं. आप सब के कल्याण
के लिए अपने घोड़े जोतते हैं. आप स्वर्गलोक में मूर्धन्य स्थान पर विराजमान
आदित्य की शोभा धारते हैं. आप हवि वाहक व लपटीली जिह्वा वाले हैं. ( २३ )
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्.
यह्वा ऽ इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (२४)
हे अग्नि! आप समिधा से प्रबोधित होते हैं. आप लोगों की ओर उसी प्रकार
उन्मुख होते हैं, जैसे दूध पीने के लिए बछड़ा गाय की ओर उन्मुख होता है. उषा
काल में प्राणियों के चैतन्य होने की भांति आप चैतन्य होते हैं. जैसे पक्षी आकाश
में जाते हैं, वैसे ही आप स्वर्ग की ओर जाते हैं. ( २४ )
अवोचाम कवये मेध्याय वचो वन्दारु वृषभाय वृष्णे.
गमविष्ठिरो नमसा स्तोममग्नौ दिवीव रुक्ममुरुव्यञ्चमश्रेत्.. (२५)
अग्नि कवि, मेधावी, शक्तिमान व धनवान हैं. हम वचनों से उन की वंदना
करते हैं. हम अग्नि की वैसे ही उपासना करते हैं. हम उन की महिमायुक्त
उपासना करते हैं. हम स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले अग्नि के लिए उपासना
करते हैं. ( २५ )
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः.
यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विश्वं विशे विशे.. (२६)
अग्नि प्रथम वंदनीय, धारक, होता व यजिष्ठ ( यज्ञ करने योग्य ) हैं. यज्ञ के
लिए इन्हें यज्ञ वेदी पर स्थापित किया गया है. भृगु आदि ऋषियों ने यजमानों के
कल्याण के लिए बारबार विलक्षण अग्नि को वनों में प्रज्वलित किया. ( २६ )
जनस्य गोपा ऽ अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे.
घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्विभाति भरतेभ्यः शुचिः... (२७)
अग्नि मनुष्यों के संरक्षक, चेतनामय, जाग्रत व सुदक्ष हैं. वे अपनी ज्वालाओं
यजुर्वेद - १८७