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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 782 में से

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पृष्ठ 86

भाषा—किन्तु उक्त दोषों वाली प्रथम विवाहिता पत्नी का भी पालन-
पोषण करना चाहिए, अन्यथा घोर पाप होता है। जहां स्त्री पुरुष दोनों
परस्पर अनुकूल होते हैं वहां धर्म, अर्थ और काम तीनों की प्रतिदिन वृद्धि
होती है ॥ ७४ ॥
स्त्रियं प्रत्याह—
मृते जीवति वा पत्यौ या नान्यमुपगच्छति ।
सेह कीर्तिमवाप्नोति मोदते चोमया सह ॥ ७५ ॥
भर्तरि जीवति मृते वा या चापल्यादन्यं पुरुषं १नोपगच्छति सेह लोके
विपुलां कीर्तिमवाप्नोति । उमया च सह क्रीडते, पुण्यप्रभावात् ॥ ७५ ॥
भाषा—पति के जीवन काल में या मर जाने पर भी जो स्त्री किसी दूसरे
पुरुष के समीप नहीं जाती वह इस संसार में कीर्ति तो पाती है और (मृत्यु के
बाद पुण्य के प्रभाव से) उमा के साथ सुखपूर्वक निवास करती है ॥ ७५ ॥
अधिवेदनाकारणाभावे अधिवेतारं प्रत्याह—
आज्ञासंपादिनीं दक्षां वीरसूं प्रियवादिनीम् ।
त्यजन्दाप्यस्तृतीयांशमद्रव्यो भरणं स्त्रियाः ॥ ७६ ॥
२आज्ञासंपादिनीमादेशकारिणीम्, दक्षां शीघ्रकारिणीम्, वीरसूं पुत्रवतीम्,
प्रियवादिनीं मधुरभाषिणीं यस्त्यजति अधिविन्दति, स राज्ञा स्वधनस्य तृतीयांशं
दाप्यः । निर्धनस्तु भरणं ग्रासाच्छादनानि दाप्यः ॥ ७६ ॥
भाषा—जो आज्ञाकारिणी, कुशल, वीर पुत्रों को जन्म देने वाली और
मधुरभाषिणी पत्नी का त्याग करता है (अथवा उसके जीवित रहते दूसरी
पत्नी ग्रहण करता है) तो (राजा) उससे धन का तृतीयांश दिलावे और
यदि निर्धन हो तो और भोजन वस्त्र दिलवाये ॥ ७६ ॥
स्त्रीधर्मानाह—
स्त्रीभिर्भर्तुर्वचः कार्यमेष धर्मः परः स्त्रियाः ।
आ शुद्धेः संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः ॥ ७७ ॥
स्त्रीभिः सदा भर्तुर्वचनं कार्यम् । यस्मादयमेव पर उत्कृष्टो धर्मः, स्त्रीणां
स्वर्गहेतुत्वात् । यदा तु महापातकदूषितस्तदा आ शुद्धेः संप्रतीक्ष्यः, न
तत्पारतन्त्र्यम् । उत्तरकालं तु पूर्ववदेव तत्पारतन्त्र्यम् ॥ ७७ ॥
भाषा--स्त्रियों का यह कर्तव्य है कि पति की आज्ञा का पालन करे,
१. नैवोपगच्छति । २. आदेशसंपादिनीं । ३. सर्वथा ।