सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 542

४८६ $\qquad\qquad$ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
शरीर के विकार से युक्त होने तथा स्थूल आकार का होने से इन्द्रियों द्वारा
ग्राह्य बताया गया है ॥ १८१-१८३ ॥
$\quad$ स्वर्गमार्गमाह—
$\qquad$ पितृयानोऽजवीथ्याश्च यदगस्त्यस्य चान्तरम् ।
$\qquad$ तेनाग्निहोत्रिणो यान्ति स्वगकामा दिवं प्रति ॥ १८४ ॥
$\quad$ अजवीथ्यमरमार्गः तस्यागस्त्यस्य च यदन्तरमसौ पितृयानस्तेनाग्निहोत्रिणः
स्वर्गकामाः दिवं यान्ति स्वर्गं प्राप्नुवन्ति ॥ १८४ ॥
$\quad$ भाषा—अजवीथी ( देवताओं के मार्ग ) और अगस्त्य के बीच पितृयान
( पितरों का मार्ग ) है, इस मार्ग की इच्छा लेकर अग्निहोत्र करने वाले
स्वर्ग में पहुँचते हैं ॥ १८४ ॥
$\qquad$ ये च दानपराः सम्यगष्टाभिश्च गुणैर्युताः ।
$\qquad$ तेऽपि तेनैव मार्गेण सत्यव्रतपरायणाः ॥ १८५ ॥
$\quad$ किंच, ये च दानादिस्मार्तकर्मपराः सम्यग्दम्भरहिताः तथाऽष्टाभिरात्मगुणैः
'दयाक्षान्तिरनसूयाशौचमनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहा' ( ८।२३ ) इति
गौतमादिप्रतिपादितैर्युक्ताः । तथा ये च १सत्यवचननिरतास्तेऽपि तेनैव पितृ-
यानेनैव सुरसदनमाप्नुवन्ति ॥ १८५ ॥
$\quad$ भाषा—जो दान ( स्मार्त कर्मों ) में तत्पर रहते हैं, सम्यक् ( अहं-
काररहित होकर ) आत्मा के आठ गुणों से युक्त और सत्यवादी होते हैं
वे उसी पितृयान से देवलोक को जाते हैं ॥ १८५ ॥
$\quad$ ननु नैमित्तिकादिप्रतिसंचरेऽखिलाध्यापकप्रलयादविदितवेदास्तस्योपरितना
जनाः कथमग्निहोत्रादिकं कर्म करिष्यन्ति कथंतरां चाकृतकर्माणः स्वर्गमार्गम-
धिरोक्ष्यन्तीत्यत आह—
$\qquad$ २तत्राशीतिसहस्रमुनयो गृहमेधिनः ।
$\qquad$ ३पुनरावर्तिनो बीजभूता धर्मप्रवर्तकाः ॥ १८६ ॥
$\quad$ तत्र पितृयानेऽष्टाशीतिसहस्रसंख्या मुनयो गृहस्थाश्रमिणः पुनरावृत्तिध-
र्माणः सर्गादौ वेदस्योपदेशकतया धर्मतरुप्रादुर्भावे बीजभूताः सन्तोऽग्निहोत्रा-
दिधर्मप्रवर्तकाः, अतो न प्रागुदितदोष४समासङ्गः ॥ १८६ ॥
$\quad$ भाषा—उस पितृयान में अठासी हजार गृहस्थ मुनि निवास करते हैं ;
जो ( सृष्टि के आरम्भ में ) पुनः पुनः वेद का उपदेश करने से धर्मरूपी वृक्ष
की उत्पत्ति के निमित्त बीज के समान होते हैं ॥ १८६ ॥


$\quad$ १. सत्यवदन । $\quad$ २. अष्टाशीतिसहस्राणि । $\quad$ ३. पुनरावृत्तिनो. ।
४. समागमः ।