याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ें( २८ )
स्मृतियाँ प्रायः पद्य में हैं और भाषा की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों के बाद की
रचनाएँ हैं। स्मृतियों की भाषा लौकिक है। विषयवस्तु की दृष्टि से स्मृतियाँ
धर्मसूत्रों से अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं।
मुख्य स्मृतिकार १८ हैं—मनु, बृहस्पति, दक्ष, गौतम, यम, अंगिरा, योगीश्वर,
प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशनस्, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब,
हारीत ।
इनके अतिरिक्त उपस्मृतियों के भी लेखकों के नाम इस प्रकार गिनाये
गये हैं—
नारदः पुलहो गार्ग्यः पुलस्त्यः शौनकः क्रतुः ।
बौधायनो जातुकर्ण्यो विश्वामित्रः पितामहः ॥
जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकश्यपौ ।
व्यासः सनत्कुमारश्च शान्तनुर्जनकस्तथा ॥
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकण्यः कपिञ्जलः ।
बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च ।
पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः ॥
वीरमित्रोदय, परिभाषा प्रकरण के अनुसार स्मृतिकारों की संख्या २१ है
और वे हैं—
वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः ।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥
जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥
पारस्करश्च्यवङ्गो वैजवापस्तथैव च ।
इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥
स्वयं स्मृतिकारों ने दूसरे स्मृतिकारों का उल्लेख किया है और उनकी संख्या
का अपने ज्ञान के अनुसार निर्देश किया है। मनु ने ६ के, याज्ञवल्क्य ने २० के,
पराशर ने १९ के नाम गिनायें हैं। स्मृतियों की संख्या के विषय में भिन्न प्रकार
की सूचनाएँ मिलती हैं। जैसा कि प्रो० काणे ने निष्कर्ष निकाला है—'यदि बाद
में आनेवाले निबन्धों, यथा निर्णयसिन्धु, नीलकण्ठ, एवं वीरमित्रोदय की मयूख
सूचियों को देखा जाय तो स्मृतियों की संख्या १०० हो जायगी।'
यहाँ उल्लेखनीय है कि जो स्मृतियाँ उपलब्ध हैं उनकी संख्या अपेक्षाकृत
कम है। अनेक स्मृतियों की केवल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। साथ ही स्वरूप तथा
शैली की दृष्टि से भी ये स्मृतियाँ भिन्न हैं।
याज्ञवल्क्यस्मृति
स्मृति साहित्य में मनुस्मृति के बाद दूसरी महत्वपूर्ण स्मृति है याज्ञवल्क्य-
स्मृति। कुछ दृष्टि से तो याज्ञवल्क्यस्मृति का मनुस्मृति की अपेक्षा भी अधिक
१. धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग १, अनु० काश्यप, पृ० ४१ ।