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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 782 में से

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पृष्ठ 33

भूमिका
स्मृति साहित्य
भारतीय धर्मशास्त्र में वैदिक धर्मसूत्रों के उपरान्त स्मृतियाँ आती हैं। स्मृति
शब्द का प्रयोग श्रुति से विपर्यास प्रदर्शित करने के लिए किया गया है। श्रुति
तथा स्मृति द्वारा विहित आचार को धर्म बताया गया है (श्रुतिस्मृतिविहितो
धर्मः, वसिष्ठधर्मसूत्र, १. ४. ६) श्रुति से वेद का अर्थ लिया जाता है और स्मृति
शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न
साहित्य के लिए हुआ है। उपयुक्त अर्थ में धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ हैं। ("श्रुतिस्तु
वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः", मनु० २. १०)। श्रुति श्रवण, मनन और
अध्यापन का विषय है; स्मृति स्मरण का विषय है और परम्परागत धार्मिक
साहित्य है। संकीर्ण अर्थ में स्मृति और धर्मशास्त्र में कोई भेद नहीं है।
वैदिक साहित्य में हम सूत्रों के अन्तर्गत श्रौतसूत्र या श्रुति पर आधारित
सूत्रों का विभाजन पाते हैं। "श्रौतसूत्रों के साथ ही साथ हम दूसरे प्रकार के
कल्पसूत्र भी पाते हैं, जिन्हें गृह्यसूत्र कहा गया है। ये गृहस्थजीवन की उन
क्रियाओं का वर्णन करते हैं जो जन्म, जन्म के पूर्व, विवाह, मृत्यु और मृत्यु के
बाद के अवसरों पर की जाती हैं। इन रचनाओं की उत्पत्ति उनके नाम से ही
पर्याप्त रूप में प्रकट हो जाती है, कारण गृह्यसूत्र के अतिरिक्त उनका नाम स्मार्त-
सूत्र या स्मृति पर आधारित सूत्र भी है। स्मृति का अर्थ वह है जो याद किया
जाने योग्य हो। इस प्रकार हम स्मृति का श्रुति अर्थात् श्रवण के विषय से स्पष्ट
रूप से भेद कर सकते हैं, कारण, स्मृति सीधे स्मरण शक्ति पर छाप डालती है
और इसके लिए किसी विशेष शिक्षा या साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती।"१
इसी विद्वान् ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि मेगस्थनीज के अनुसार
भारतीय लोग विधि का व्यवहार "स्मृति द्वारा ही" "अथो नोमिस" किया
करते थे।२
संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः
श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों
में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं-मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ।
मनुस्मृति सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गई थी।
अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या
विस्तृत है।
१. भारतीयसाहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० ११।
२. वही, पृ० १४