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सर्वकोश
वृक्षायुर्वेद (सुरपाल - प्राचीन भारतीय पादप-विज्ञान, कृषि एवं वृक्ष-चिकित्सा सटीक)

वृक्षायुर्वेद (सुरपाल - प्राचीन भारतीय पादप-विज्ञान, कृषि एवं वृक्ष-चिकित्सा सटीक)

Vrikshayurveda of Surapala with Commentary

सुरपाल (अनुवादक: नलिनी साधले) द्वारा

DevanagariHindipublished101 पृष्ठ

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५६ रजःसंपूरयेद्गर्तं सुघृष्टिश्चतुरंगुलं। निक्षिप्ताश्च तिलैरौदैर्मत्स्यमांसोदकेन तत् ५७ से-
चिनो वलितो याति तज्जातो विटपो ध्रुवं ५८ लतानप्राललीरावधातकीमाधवीलता। वङ्गनो
मर्द्दिता हीजादविकाशीरप्रिप्रया ५९ विधी निवृत्यांकृिष्टदाविने वटे सम्यक् प्रकीर्तिनि
लत्तूसीनां कुसिं: नम्माद्दधी ही रजलावसेचने र्यथा समेव प्रतिजायते लता ६० धुरुषयनि
तेषाते सम्यक् घटिते न वेष्टकानिचयेः। जनितो यनवतात रुरु मलधिया वामनः फलति।
६१ नातिवाल तरु संधेकित्त्वा दग्धो भिनोमनाका आज्यगोमयसिंधूत्थमधुमांसैर्विलिष्य
चे ६२ सिक्त सिर्य गधः कील विद्धमूलः पयोऽनुना। वान्शाषः सकालेषु चामनः फलति र्

  1. स 2. त् 3. ध्रु 4. ती 5. ? 6. ता 7. ध्रि
  2. स 9. ग्धे

ध्रुवं ६३ चउसं लरुता लं वोमूला सन्नरुने वटे। विध्य सो निधु ऐः सिक्तो वामनः स्यात्पर्यो
ढुना ६४ त्रिपाद्युसवेत्यल जातिकंदमेक असंघद्यु निवध्य सूत्रैः। सर्पिर्मधुसामनु लिप्य चोर्न
तथा तथा पुष्पचयं दधाति ६५ एवं निवद्ध कांडानि करवीरे विमिश्रकाः। दाडिमी जाति से दा
दोरुतः संकुरुतेहुतं ६६ मातंगजमदाहेन नलवेगन ल के न चा फलानि विद्धमूलस्य प
चंति न हि वत्सरं ६७ सद्योहत वृषस्कंध वर्म्माणन घृतेन ढं। प्रही रुहस्य शाखा या तस्याः पाक
ः फलेन हि ६८ निहितासित वृष कंव ल स वचर्म सघपरिणद्या। या शाखा खलु तस्याः फला
नि पाकं नयत्येति ६८ दंती दंत रजोव क्तितप्त हे मप्र शाल का या। रंसा म्पुर्वत्तरी मूले विद्धा दी

  1. ध्रु 2. व्य 3. र्वा 4. ट्य 5. लेन 6. ष्न