वृक्षायुर्वेद (सुरपाल - प्राचीन भारतीय पादप-विज्ञान, कृषि एवं वृक्ष-चिकित्सा सटीक)
Vrikshayurveda of Surapala with Commentary
सुरपाल (अनुवादक: नलिनी साधले) द्वारा
पृष्ठ 15, कुल 101 में से
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1
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8, 9, 10
11, 12
13
[Main Text]
ः पादपजातयः। वीजात्कांडात्तथा कंदाद्रूपंतं विविधं मतं ४५ तै वनस्पतयः प्रोक्ता
विना पुष्पैः फलंतिये। द्रुमाश्च ते निगदिता पुष्पैः सह फलं तिये ४६ प्रसरंति पद्या
नैर्या स्ता लताः परिकीर्त्तिताः। वहु संतापि विटपी सिगुल्मः परिकीर्तिताः ४७ जं
वू चंपक पुंनाग ताल के वार चिंचिणी। कपित्य बदरी विल्व कुंभाकारी प्रियंगवः
४८ पनसाम्रप्रभू काद्या करमर्द्दीपू वीजजा। तांदूली सिंधुवारश्च तग
रैद्यास्तु कांडजाः ४९ पाटला दाडिमी प्लक्ष करवीर वटादयः। प्रनिको डुंवरा कुं
[Upper Footnotes]
- ते 2. श्च 3. ता 4. भा 5. dropped 6. पि
- 'न' inserted 8. बू 9. ना 10. भ 11. श्च 12. dropped
- रा
[Lower Section]
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1, 2, 3 ६
4, 5
6
7
8
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राम
६
[Main Text]
दो वीज कांडोद्भवोमूलाः ५० कुंकुमार्ड से नानकंदार्क दमुरुवाः। पुलापद्यो
त्यलादीनि वीज कंदोद्भवोनितु ५१ यथा र्हुपक्तात्फलतो विशोषिता हि रूषदी
जं पयसा निषिच्याथ विशोषितं पंच दिनानि सर्पिषा विडंग मिश्रेण च धूपये ततः
५२ क्षीरनिषिक्तं वीजं वृहतीतिलससर्षिपालिप्तां गोमय मृदित मथो प्रसद्योजा
येत धूपितं वसया ५३ पयसिनिषिक्तं वीजं गोमय परिमर्द्दितं दिनो व्यततः। माहिषं
विडंगवूर्सेव्वैड्डुसो मृदितं प्रजायते नूनं ५४ क्षीरेण सावितमनातप साधुशुष्कस
[Lower Footnotes]
- ताः 2. कं 3. ए 4. थ 5. क्वा 6. क 7. शो