बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( ३७ )
१. यदि तर्जनी उंगली में मात्र नीचे की ही गांठ हो तो ऐसे व्यक्ति मन्द
बुद्धि के होते हैं, परन्तु यदि ऊपर वाली गांठ ही अनुभव होती है तो वे अपने कार्यों
में चतुर एवं योग्य होते हैं। यदि तर्जनी उंगली में दोनों ही गांठें दिखाई दें तो ऐसे
व्यक्ति आलसी और जीवन में निष्क्रिय बने रहते हैं। इसके विपरीत यदि तर्जनी
उंगली में एक भी गांठ न हो तो ऐसे व्यक्ति चतुर, मेधावी, दूरदर्शी तथा अपने लक्ष्य
में सफलता प्राप्त करने वाला होता है।
२. यदि मध्यमा उंगली के नीचे वाले भाग में ही गांठ हो तो व्यक्ति अपने
कार्य में बार-बार असफल होता है। इसके विपरीत यदि केवल ऊपर वाली गांठ ही
हो तो व्यक्ति दृढ़निश्चयी होता है और असफलता मिलने पर भी हताश या निराश
नहीं होता। यदि मध्यमा उंगली में दोनों ही गांठें दिखाई देती हों तो यह समझ
लेना चाहिए कि यह व्यक्ति व्यापार में जितनी तेजी से प्रगति करेगा उतनी ही तेजी
से इसका पतन भी हो जाएगा। यदि मध्यमा उंगली में कोई गांठ न हो तो वह
व्यक्ति धीर, गम्भीर तथा अत्यन्त उच्चस्तरीय विद्वान अथवा व्यापारी होता है और
सैकड़ों लोगों का भरण-पोषण करने में समर्थ होता है।
३. अनामिका उंगली में यदि मात्र नीचे ही गांठ अनुभव हो तो व्यक्ति धर्म
के मामले में कमजोर होता है। धार्मिक कार्यों में उसकी रुचि कम होती है। परन्तु
यदि केवल ऊपरी भाग में ही गांठ दिखाई दे तो ऐसा व्यक्ति धर्मभीरु तथा कमजोर
दिल वाला होता है। यदि अनामिका उंगली में दोनों ही गांठें प्रतीत होती हों तो
ऐसा व्यक्ति समाजद्रोही एवं धर्मद्रोही होता है। उसके जीवन में धर्म का या सामा-
जिक कार्यों का कोई महत्त्व नहीं होता। वह व्यक्ति पूर्णतः स्वार्थी तथा अपने ही हित
चिन्तन में लगा रहता है। इसके विपरीत यदि अनामिका उंगली में कोई गांठ न हो
तो ऐसे व्यक्ति समाज का नेतृत्व करने में समक्ष होते हैं तथा समाज को इनकी देन
स्पष्ट दिखाई देती है। इनके कार्यों में एक निश्चित उद्देश्य होता है। ये व्यक्ति अपने
स्वार्थ की अपेक्षा ये दूसरों की भलाई का विशेष ध्यान रखते हैं, ऐसे ही व्यक्ति समाज
को सही निर्देश दे सकते हैं।
४. यदि कनिष्ठिका उंगली में नीचे की ओर ही गांठ हो तो वह व्यक्ति
जरूरत से ज्यादा चालाक एवं सावधान होता है। कानून तोड़ना इसके लिए बायें
हाथ का खेल होता है तथा यह समाज विरोधी कार्यों में अग्रणी रहता है। यदि कनि-
ष्ठिका उंगली के ऊपरी भाग में ही गांठ हो तो ऐसा व्यक्ति समाज के लिए सहायक
होता है तथा उसके जीवन का अधिकतर हिस्सा सामाजिक कार्यों में लगता है।
यदि कनिष्ठिका उंगली में दो गांठें हों तो निश्चय ही वह व्यक्ति तटस्थ नहीं रह
पाता। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी होने के साथ-साथ गलत कार्यों में भी लगा रहता है।
समाज से इस व्यक्ति को बहुत अधिक आशाएं नहीं रखनी चाहिए। यदि कनिष्ठिका
( ३८ )
विभिन्न प्रकार के अग्रभागों वाली उंगलियां
उंगली में कोई गांठ न हों तो ऐसे व्यक्ति आदर्शजीवी होते हैं। इनके विचार शुद्ध
एवं पवित्र होते हैं तथा ये व्यक्ति अपने जीवन में समाज को कुछ नया देने की सामर्थ्य
रखते हैं। ऐसे व्यक्ति ही समाज के भूषण कहे जाते हैं।
५. अंगूठे में केवल एक ही गांठ होती है क्योंकि अंगूठे में मात्र दो भाग ही
देखे जा सकते हैं। यदि अंगूठे में गांठ दिखाई दे तो ऐसे व्यक्ति कमजोर दिल वाले
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होते हैं तथा अपने कर्तव्यों के प्रति ये लगभग उदासीन-से रहते हैं। इसके विपरीत
यदि अंगूठे में कोई गांठ अनुभव न हो तो ऐसे व्यक्ति दृढ़निश्चयी तथा अपने कार्य
के प्रति अटूट आस्था रखने वाले होते हैं। एक बार जो मन में निश्चय कर लेते हैं,
उस कार्य को पूरा करके ही छोड़ते हैं। इनके जीवन में दृढ़ता, प्रबल इच्छा-शक्ति और
कार्य करने के प्रति अटूट आस्था होती है। ऐसे ही व्यक्ति अपने जीवन में सफल
होकर देश और समाज को नया नेतृत्व देने में सक्षम हो सकते हैं।
अंगूठा और उंगलियां
अंगूठा एक प्रकार से पूरे हाथ का प्रतिनिधित्व करता है। हाथ की रेखाओं
का जितना महत्त्व होता है, उससे भी ज्यादा महत्त्व अंगूठे का माना गया है। जिस
प्रकार मनुष्य का चेहरा उसके जीवन का प्रतिबिम्ब होता है, ठीक उसी प्रकार उसके
हाथ का अंगूठा भी उसके पूरे व्यक्तित्व को हस्तरेखाविद् के सामने साकार कर देता
है। पूरे हाथ का मूल, अंगूठे को ही माना गया है क्योंकि बिना अंगूठे के उंगलियों
का महत्त्व एक प्रकार से नगण्य-सा हो जाता है। अंगूठा ही पूरे हाथ की शक्ति को
अपने हाथ में संचित रखता है और कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है। बच्चे
के जन्म के समय भी उसका अंगूठा चारों उंगलियों से ढका हुआ सा रहता है, अतः
हस्तरेखा विज्ञान में अंगूठे का महत्त्व सर्वोपरि माना गया है।
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अंगूठे के विभिन्न प्रकार
अंगूठा इच्छा-शक्ति का केन्द्र माना जाता है जोकि तीन हड्डियों से मिलकर
निर्मित होता है। हथेली से आगे निकले हुए दो भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं। तीसरे
भाग से हथेली की आन्तरिक रचना होती है जोकि शुक्र पर्वत कहा जाता है और यह
भाग प्रेम तथा वासना का केन्द्र माना गया है। इससे ऊपर का भाग तर्क एवं नाखून
से जुड़े हुए भाग को इच्छा-शक्ति का द्योतक कहा जाता है।
अंगूठा मानव की आन्तरिक क्रियाशीलता को स्पष्ट करता है और इसका
सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है। चूंकि मानव शरीर में उसका मस्तिष्क सर्वोपरि माना
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गया है अतः केवल मात्र अंगूठे को देखकर ही मानव का स्वभाव उसकी प्रकृति तथा
उसके विचारों का अध्ययन किया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यदि
चारों उंगलियां कट जाती हैं तब भी कोई हानि नहीं होती परन्तु किसी कारणवश
अंगूठा कट जाय और रक्त प्रवाह जोरों से होने लग जाय तो व्यक्ति पागल हो जाता
है और कई बार मृत्यु भी हो जाती है। इस छोटे से तथ्य से ही अंगूठे का महत्व
समझा जा सकता है।
परिस्थितियों तथा विभिन्न जलवायु को ध्यान में रखते हुए समस्त मानव
जाति के अंगूठे तीन भागों में बांटे जा सकते हैं।
१. वे अंगूठे जो हथेली पर तर्जनी के साथ मिलकर अधिक कोण का निर्माण
करते हैं।
२. वे अंगूठे जो तर्जनी के साथ मिलकर समकोण का निर्माण करते हैं।
३. वे अंगूठे जो हथेली पर तर्जनी के साथ न्यूनकोण का निर्माण करते हैं।
पाठकों की सुविधा के लिए इन तीनों ही प्रकार के अंगूठों का संक्षिप्त विवरण
स्पष्ट कर रहा हूं :
१. अधिक कोण अंगूठा :-ये अंगूठे देखने में सुन्दर आकृति वाले, लम्बे तथा
पतले होते हैं। ऐसे अंगूठों को सात्विक अंगूठा कहा जाता है। जिन व्यक्तियों के हाथों
में ऐसा अंगूठा होता है, वे व्यक्ति कोमल और मधुर स्वभाव वाले, कलाकार, संगीतज्ञ
तथा समाज में रचनात्मक कार्य करने वाले होते हैं। यद्यपि ऐसे लोगों का बचपन बहुत
अधिक संघर्षों के साथ व्यतीत होता है परन्तु फिर भी ये अपने प्रयत्नों से घरेलू परि-
स्थितियों को अपने अनुकूल बना कर ऊंचा उठ जाते हैं। यद्यपि निरन्तर इनके मार्ग
में बार-बार बाधाएं आती हैं परन्तु ये अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर ही जीवन में
सफल होते हैं।
इस प्रकार के हाथ में अत्यधिक लम्बा अंगूठा अशुभ माना गया है। यदि अंगूठे
की लम्बाई तर्जनी के दूसरे पोरुए के आधे भाग से भी ऊपर बढ़ जाय तो वह व्यक्ति
मूर्ख होता है तथा अपने जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। यदि अंगूठे की
लम्बाई समान एवं उचित अनुपात में होती है तो व्यक्ति बुद्धिमान, चतुर तथा कला
प्रेमी होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में स्वार्थ की अपेक्षा मानव-सेवा एवं समाज-सेवा को
प्राथमिकता देता है। यद्यपि इनके जीवन में मित्रों की संख्या कम ही होती है परन्तु फिर
भी जितने भी मित्र होते हैं, वे विपत्ति पड़ने पर सहायता करने वाले होते हैं। इनके
चित्त में अस्थिरता बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति बार-बार अपने विचार बदलते रहते
हैं और जीवन में काफी बाधाओं के बाद ही सफल हो पाते हैं।
( ४२ )
२. समकोण अंगूठा :- ऐसे अंगूठे वे कहे जाते हैं, जो तर्जनी से जुड़ते समय
समकोण का निर्माण करते हैं । ये अंगूठे देखने में सुन्दर, मजबूत तथा स्तम्भ की तरह
प्रतीत होते हैं परन्तु ऐसे अंगूठे पीछे की तरफ झुके हुए नहीं होते ।
इन अंगूठों को ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि ये व्यक्ति बातों की
अपेक्षा कार्य एवं परिश्रम पर ज्यादा विश्वास करते हैं । यद्यपि इनमें क्रोध की मात्रा
विशेष होती है परन्तु यह भी देखा गया है कि इनके जीवन में जितनी तेजी से गुस्सा
आता है उतनी ही तेजी से गुस्सा उतर भी जाता है । यह बात सही है कि क्रोध के
समय ये चुपचाप बैठे रहते हैं, अहित या अनिष्ट नहीं करते । अपनी बात पर ये पूरी
तरह से अड़े रहते हैं । कई बार गलत बातों पर या गलत कार्यों पर ही दृढ़ता का
रुख ले लेते हैं, जिसकी वजह से कुछ नई समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं । प्रतिशोध
की भावना इनमें इतनी अधिक होती है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी भी ये अपने बैर को भूलते
नहीं । ऐसे व्यक्ति या तो अच्छे मित्र हो सकते हैं या अच्छे शत्रु । ऐसे व्यक्ति अपने
जीवन में टूट सकते हैं परन्तु झुकना इनके बस की बात नहीं होती । सही रूप में देखा
जाए तो ऐसे ही व्यक्ति देश-भक्त, देश तथा समाज के कार्यों पर अपने प्राणों को
उत्सर्ग करने वाले एवं दृढ़-निश्चयी होते हैं । मन में एक बार ये व्यक्ति जो निश्चय
कर लेते हैं, उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं । दूसरों के अधीन रहकर कार्य करना इनको
प्रिय नहीं होता, अपितु ये अपने ही द्वारा संचालित होते हैं ।
३. न्यूनकोण अंगूठा : हथेली से जुड़ते समय तर्जनी उंगली के साथ जो अंगूठे
न्यूनकोण का आकार बनाते हैं, वे इसी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। इन अंगूठों की लम्बाई
अपेक्षाकृत कम होती है तथा देखने में ये अंगूठे बेडौल से प्रतीत होते हैं । ऐसे अंगूठों
को तमोगुणी अंगूठा कहा जाता है ।
जिन व्यक्तियों के हाथों में इस प्रकार का अंगूठा होता है, वे व्यक्ति जीवन
में निराशावादी भावना बनाये रखते हैं। आलस्य इनके जीवन में बराबर बना रहता
है । यात्रा आदि कार्यों में इनकी रुचि नहीं होती और न किसी कार्य की पूर्णतः में
ये विश्वास रखते हैं । निम्न और मध्य वर्ग के लोगों में ऐसे ही अंगूठे प्रायः देखने को
मिलते हैं । ऐसे व्यक्ति बुरी आदतों तथा व्यसनों में व्यस्त रहते हैं, जिसकी वजह से
आय की अपेक्षा इनका व्यय बढ़ा-चढ़ा रहता है । ये जरूरत से ज्यादा फिजूलखर्ची
होते हैं तथा दिवास्वप्न देखते-देखते अपनी उम्र काट लेते है। धर्म-कर्म में उनकी रुचि
कम ही होती है । भूत-प्रेत, देवी-देवताओं आदि की ओर इनका थोड़ा-बहुत झुकाव
रहता है । निम्नस्तरीय कार्यों में इन्हें आनन्द आता है ।
इस प्रकार के व्यक्ति भोगी होते हैं तथा अन्य स्त्रियों के प्रति बराबर आसक्ति
बनाए रखते हैं । अपने से निम्नतर अथवा निम्न जाति की स्त्रियों से इनका सम्पर्क
( ४३ )
रहता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में कई-बार बदनाम होते हैं। मेरी राय में ऐसे
व्यक्तियों से समाज को किसी प्रकार का कोई विशेष लाभ नहीं मिलता।
अंगूठे के तीन भाग :
ध्यानपूर्वक देखने से प्रतीत होता है कि अंगूठा मुख्यतः तीन भागों में बंटा
हुआ होता है। पहला वह भाग कहलाता है, जो नाखून से चिपका हुआ होता है।
दूसरा मध्य भाग तथा तीसरा वह भाग कहलाता है, जो हथेली में शुक्र पर्वत से जुड़ा
हुआ होता है। हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार इनमें प्रथम पोरुआ 'सत', दूसरा 'रज'
तथा तीसरा 'तम' को स्पष्ट करता है। इनको हम ऊर्ध्व भाग, मध्यम भाग तथा
अधो भाग के नाम से भी सम्बोधित कर सकते हैं। ऊर्ध्व भाग विज्ञान और इच्छा
शक्ति का द्योतक होता है। मध्य भाग तर्क एवं विचार का प्रतिनिधित्व करता है
तथा तीसरा अधो भाग प्रेम, विराग और स्नेह को सूचित करता है।
प्रथम पोरुआ :
जिस मनुष्य के अंगूठे का प्रथम पोरुआ दूसरे पोरुए से लम्बा हो, उस व्यक्ति
में इच्छा-शक्ति प्रबल होती है तथा निर्णय लेने में यह स्वतन्त्र होता है। ऐसे व्यक्ति
किसी की अधीनता में रह कर कार्य नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्ति धार्मिक विचारों
में गहरी आस्था रखने वाले होते हैं तथा इनका स्वयं का व्यक्तित्व इतना प्रबल तथा
आकर्षक होता है कि देखते ही इनके व्यक्तित्व का प्रभाव सामने वाले पर पड़
जाता है। ये अपने व्यक्तित्व के बल पर कुछ भी कार्य सम्पन्न करा लेने में समर्थ होते
हैं। ऐसे व्यक्ति यौवनावस्था की अपेक्षा वृद्धावस्था में अधिक संवेदनशील तथा अधिक
सुखी देखे जाते हैं।
यदि प्रथम तथा द्वितीय पोरुआ बराबर लम्बा एवं मोटा होता है तो ऐसा
व्यक्ति समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करने में सफल होता है। न तो ये किसी को
धोखा देते हैं और न किसी से ये व्यक्ति सहज में ही धोखा खाते हैं। जीवन में मित्रों
की संख्या बहुत ज्यादा होती है तथा समाज में ऐसे व्यक्ति लोकप्रिय होते हैं। कठिन
से कठिन परिस्थितियों में भी इन्हें मुस्कराते हुए देखा जा सकता है।
द्वितीय पोरुआ :
अंगूठे का दूसरा पोरुआ तर्क-शक्ति का स्थान माना गया है। यदि दूसरा
पोरुआ पहले पोरुए से बड़ा और मजबूत हो तो इससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्ति में
तर्क-शक्ति जरूरत से ज्यादा है और इस व्यक्ति की यह विशेषता होगी कि यह अपनी
तर्क शक्ति के सामने किसी को भी टिकने नहीं देगा। परन्तु इस प्रकार के व्यक्तियों
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एक कमजोरी यह होती है कि ये अपनी उचित और अनुचित सभी बातों को तर्क
शक्ति के सहारे मनवाने की कोशिश करते हैं। यदि कभी तर्क-शक्ति में अपना पलड़ा
कमजोर होता देखते हैं तो हो-हल्ला मचाकर अपनी विजयसिद्ध करने का प्रयत्न
करते हैं। सभ्य समाज में इनको ज्यादा आदर नहीं मिलता अपितु इन्हें बकवादी और
वाचाल कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति के हाथ में यह पोरुआ पतला हो तो ऐसे
व्यक्ति अपने दिमाग से काम न लेकर जो भी जी में आता है मुंह पर बक देते हैं।
ऐसे व्यक्ति अपने अधिकारियों की गलती निकालने में तत्पर रहते हैं। इनका जीवन
भारवत् ही होता है।
यदि पहला और दूसरा पोरुआ बराबर लम्बाई और चौड़ाई तथा मोटाई
लिये हुए हों तो व्यक्ति शान्त मस्तिष्क के कहे जाते हैं न तो ये क्षणिक आवेश में
क्रोधित होते हैं और न क्षणिक प्रशंसा से फूलते ही हैं। जीवन में प्रत्येक कदम साव-
धानी के साथ उठाते हैं जिससे इनको समाज में कम-से-कम धोखा खाने को मिलता
है। इनमें आत्म-विश्वास भी प्रबल रूप में होता है। सही शब्दों में कहा जाय तो ये
व्यक्ति सभ्य, ऊंचे स्तर के व्यापारी, महत्त्वपूर्ण पदों पर अधिकारी और माने हुए
कलाकार होते हैं।
यदि पहले पोरुए की अपेक्षा दूसरा पोरुआ कमजोर, पतला और दुर्बल हो तो
ऐसे व्यक्ति अपनी इच्छा से न चलकर दूसरों की अधीनता में ही चलना पसन्द करते
हैं। सही रूप में यें स्वयं कोई निर्णय नहीं लेते। जीवन में ये किसी भी प्रकार का
कोई कार्य बिना योजना के ही प्रारम्भ कर देते हैं, जिससे उस कार्य के अन्त में इन्हें
हमेशा असफलता ही मिलती है। इनकी आत्मा निर्बल होती है। इनके विचार अस्थिर
होते हैं। इनकी प्रवृत्ति झगड़ालू होती है और जीवन में ये एक असफल व्यक्ति कहे
जाते हैं।
वास्तव में ही ऐसे व्यक्ति भाग्यवादी होने के साथ-साथ आलसी भी कहे जाते
हैं।
तीसरा भाग :
अंगूठे का तीसरा भाग पोरुआ न कहलाकर शुक्र का स्थान कहलाता है। शुक्र
पर्वत के बारे में आगे विवेचन किया जायगा।
प्रथम दो पोरुओं की अपेक्षा यह भाग निश्चय ही उन्नत, सुदृढ़ एवं सुन्दर
होता है। यदि यह भाग सामान्य रूप से अधिक ऊंचा उठा हुआ, सुन्दर और किञ्चित्
गुलाबी आभा लिये हुए होता है तो ऐसा व्यक्ति प्रेम और स्नेह के क्षेत्र में काफी
बढ़ा-चढ़ा होता है। समाज में ऐसे व्यक्ति आदर प्राप्त करते हैं तथा मित्रों में भरपूर
लोकप्रियता अर्जित करने में सफल होते हैं। ये व्यक्ति कठिनाइयों में भी मुस्कराते
रहते हैं और अपने प्रयत्नों से जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करके ही रहते हैं।
( ४५ )
यदि शुक्र का पर्वत बहुत अधिक उठा हुआ दिखाई दे तो ऐसा व्यक्ति भोगी
और कामी होता है तथा सौन्दर्य के पीछे मटकने वाला माना जाता है। प्रेम और
सौन्दर्य के लिए यह सब कुछ करने के लिए तैयार रहता है और उस समय क्षणिक
आवेश में यह कुछ भी आगा-पीछा नहीं सोचता । यदि यह क्षेत्र दबा हुआ या कम
उन्नत होता है अथवा इस क्षेत्र पर जरूरत से ज्यादा रेखाएं एवं जाल दिखाई दें तो
ऐसा व्यक्ति निराशावादी प्रवृत्ति का होता है। इनका प्रेम भी शुद्ध प्रेम न होकर
उस प्रेम के पीछे भी वासना या स्वार्थ छिपा हुआ होता है। ये लम्बी-लम्बी योजनाएं
बनाते हैं, दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं पर ये अपने उद्देश्यों में पूर्णतः सफलता प्राप्त
नहीं कर पाते हैं। भावना शून्य होने के कारण समाज में भी इनको पूर्ण यश नहीं
मिलता। जीवन इनका कलह पूर्ण कहा जाता है तथा वैवाहिक जीवन में जरूरत से
ज्यादा बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
उंगलियां :
मैंने पीछे के पृष्ठों में उंगलियों के बारे में कुछ संकेत दिये थे। यह ज्ञात
रहना चाहिए कि उंगलियों का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है और यदि उंग-
लियों पर विशेष बोझ पड़ता है तो उससे मस्तिष्क की धमनियां भी बोझिल होने
लगती हैं। साधारणतः प्रत्येक हाथ में चार उंगलियां पाई जाती हैं।
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उंगलियां
( ४६ )
१. तर्जनी :
२. मध्यमा :
३. अनामिका :
४. कनिष्ठिका :
इन चारों उंगलियों में से प्रत्येक उंगली तीन-तीन खण्डों में बंटी हुई होती
है । नैसर्गिक रूप से देखा जाये तो मध्यमा उंगली सबसे बड़ी; तर्जनी, मध्यमा के
आखिरी खण्ड के मध्य तक पहुंचने वाली, अनामिका भी लगभग इतनी ही लम्बी, तथा
कनिष्ठिका, अनामिका के आखिरी खण्ड तक पहुंचने वाली होती है, इसमें थोड़ी बहुत
लम्बाई कम या ज्यादा हो सकती है ।
तर्जनी पहली उंगली है, जो कि अंगूठे के पास वाली होती है । इसके मूल में
गुरु पर्वत का स्थान है । तर्जनी के पास मध्यमा होती है, जिसके मूल में शनि का पर्वत
कहा जाता है । मध्यमा के पास वाली उंगली अनामिका कहलाती है, जिसके मूल में
सूर्य पर्वत स्थित है तथा इसके पास की उंगली कनिष्ठिका होती है, जिसके मूल में
बुध पर्वत का स्थान है, यह सभी उंगलियों से छोटी होती है ।
तर्जनी उंगली :
इसको अंग्रेजी में 'इण्डैक्स फिंगर' कहत
हैं । अधिकतर लोगों के हाथ में यह उंगली
अनामिका से छोटी होती है । पर कुछ हाथों में
मैंने यह उंगली अनामिका से बड़ी भी देखी है ।
जिस हाथ में यह उंगली अनामिका से लम्बाई में
बड़ी हो वे व्यक्ति अपने गौरव से अभिभूत, घमण्डी
तथा उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर कार्य करने वाले
होते हैं । धार्मिक कार्यों में इनकी रुचि नहीं
होती । ये ऊपर के अधिकारियों की चापलूसी
करने में भी विश्वास रखते हैं । अपने अधीनस्थ
कर्मचारियों पर कड़ाई से नियन्त्रण करते हैं । तथा
शासन करने की भावना इनमें हद से ज्यादा होती
है । यद्यपि इस वजह से समाज में इन्हें कई बार निन्दा का पात्र बनना पड़ता है फिर
भी अपने धैर्य के बल पर ये आगे की ओर बढ़ते रहते हैं ।
यदि तर्जनी अनामिका उंगली से छोटी हो तो ऐसा व्यक्ति चालाक होता है
ऐसा व्यक्ति किसी भी तरीके से अपना काम निकालने में माहिर होते हैं । ऐसे
व्यक्तियों को स्वार्थी, खुदगर्ज और चालाक समझना चाहिए ।
( ४७ )
यदि तर्जनी उंगली असामान्य रूप से छोटी हो तो व्यक्ति अकस्मात निर्णय
लेने में होशियार होता है । यदि यह असाधारण रूप से लम्बी हो तो ऐसे व्यक्ति अत्या-
चारी, घमण्डी, तथा कामुक होते हैं । यदि तर्जनी उंगली लम्बी हो तथा ऊपर का
सिरा नोकीला हो तो ऐसे व्यक्ति अन्ध-विश्वासी और धर्म में जरूरत से ज्यादा
आस्था रखने वाले होते हैं। यदि यह उंगली लम्बी हो परन्तु ऊपर का सिरा वर्गाकार
हो तो ऐसे व्यक्ति सच्चरित्र तथा उदार प्रवृत्ति के होते हैं । यदि तर्जनी उंगली
औसत लम्बाई लिए हुए हो और आगे का भाग चपटा हो तो व्यक्ति डांवाडोल मन-
स्थिति का होता है । यदि तर्जनी उंगली का पहला पर्व ही लम्बा हो तो व्यक्ति
आत्मविश्वासी कहा जाता है । यदि मात्र दूसरा पर्व लम्बा हो तो उसकी इच्छाएं
बहुत अधिक बड़ी-चढ़ी होती हैं । यदि तीसरा पर्व लम्बा हो तो उसमें जरूरत से
ज्यादा घमण्ड और अभिमान होता है। यदि मध्यमा और प्रथमा दोनों ही उंगलियां
बराबर हों तो ऐसे व्यक्ति पूरे संसार में सम्मानित होते हैं । नैपोलियन बोनापार्ट
तथा अब्राह्रीम लिंकन की तर्जनी और मध्यमा दोनों ही उंगलियां बराबर लम्बाई लिये
हुई थीं ।
मध्यमा उंगली :
इसे अंग्रेजी में 'फिंगर आफ सेटर्न' कहते हैं। क्योंकि इसके मूल में शनि
पर्वत होता है । सामान्यतः यह उंगली तर्जनी और अनामिका से लम्बी होती है, परंतु
यह लम्बाई १/४ इंच से बड़ी नहीं होनी चाहिए । यदि यह
१/४ इंच से बड़ी हो तो उस व्यक्ति का पूरा जीवन दुख, अभाव
और परेशानियों में ही व्यतीत होता है । यदि यह उंगली मात्र
१/४ इंच ही बड़ी हो तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान, शुभ कार्यों को
करने वाला तथा उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला होता
है । ऐसा ही व्यक्ति समाज में सम्मान तथा यश प्राप्त करता
है ।
यदि मध्यमा उंगली तर्जनी से आधा इंच या उससे भी ज्यादा बड़ी हो तो
व्यक्ति निश्चय ही हत्यारा होगा, ऐसा समझ लेना चाहिए ।
यदि मध्यमा उंगली लम्बी हो तो व्यक्ति रोगी और कामी होता है । यदि
यह उंगली लम्बी होने के साथ-साथ गांठदार एवं फूली हुई हो तो वह व्यक्ति स्वार्थी
तथा चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है । यदि यह उंगली लम्बी हो, साथ ही इसका ऊपर
का सिरा वर्गाकार हो तो ऐसे व्यक्ति गम्भीर स्वभाव के होते हैं तथा जीवन में उत्तर-
दायित्वपूर्ण पदों पर सफलता के साथ कार्य करते हैं । यदि यह उंगली लम्बी हो पर
( ४८ )
ऊपर से चपटी हो तो ऐसे व्यक्ति कला के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करते हैं
तथा कला के माध्यम से उच्चस्तरीय सम्मान, ख्याति एवं प्रशंसा प्राप्त करते हैं।
यदि मध्यमा उंगली का पहला पर्व लम्बा हो तो व्यक्ति आत्महत्या करता है। यदि
दूसरा पर्व अपेक्षाकृत लम्बा हो तो ऐसा व्यक्ति व्यापारिक क्षेत्रों में विशेष कर मशी-
नेरी सम्बन्धी कार्यों में विशेष लाभ उठाता है। यदि तीसरा पर्व ज्यादा लम्बा हो तो
ऐसा व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कंजूस होता है तथा समाज में अपयश का भागी होता
है। यदि मध्यमा उंगली का ऊपरी सिरा तर्जनी की ओर झुका हुआ हो तो उसमें
जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास होता है और इस आत्मविश्वास के कारण ही वह
अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल हो जाता है। यदि इसका ऊपरी भाग अनामिका
की ओर झुका हुआ हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य पर भरोसा करने वाला एवं संगीत,
कला आदि में रुचि रखने वाला होता है।
अनामिका उंगली :
अंग्रेजी में इस उंगली को 'फिंगर आफ अपोलो' भी कहते हैं क्योंकि इसके
मूल में सूर्य का स्थान होता है। सामान्यतः यह उंगली मध्यमा से छोटी परन्तु तर्जनी
से अपेक्षाकृत लम्बी होती है। परन्तु कुछ हाथों में इसका अपवाद भी देखा गया है।
यदि यह उंगली तर्जनी से बड़ी होती है तो ऐसा व्यक्ति उन्नति करता है और उसमें
[चित्र: अनामिका / सूर्य की उंगली — चित्र संख्या: ७७]
दया, प्रेम, स्नेह आदि मानवोचित गुण जरूरत से ज्यादा होते हैं परन्तु यदि यह उंगली
मध्यमा के बराबर पहुंच जाती है तो ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दुष्ट एवं स्वार्थी होते हैं।
ऐसे व्यक्ति अपने स्वार्थ के कारण सामने वाले का अधिक से अधिक अहित करने से
भी नहीं चूकते। परन्तु ऐसे व्यक्ति भाग्यवादी होते हैं तथा अपने बल का अधिकांश
( ४६ )
चौर्य जुआं, सट्टा आदि गलत कार्यों में लगा देते हैं। ऐसे व्यक्तियों को असभ्य और
निर्दयी कहा जाना चाहिए ।
यदि अनामिका उंगली का झुकाव सबसे छोटी उंगली की ओर हो तो व्यक्ति
व्यापार से विशेष लाभ उठाता है और उसका सारा जीवन व्यापारिक कार्यों में ही
व्यतीत होता है। परन्तु यदि इस उंगली का झुकाव मध्यमा की तरफ हो तो ऐसा
व्यक्ति चिन्तन-प्रधान व आत्म-केन्द्रित होता है तथा जीवन में कुछ ऐसा कार्य करके
जाता है, जिससे आगे के जीवन में समाज और देश उसको याद रख सकें ।
यदि अनामिका छोटी हो तो वह व्यक्ति कलाकृतियों अथवा चित्रों एवं पुरानी
वस्तुओं से धन-संचय करता है। यदि इसका अगला सिरा नुकीला हो तो वह एक सफल
संगीतज्ञ अथवा चित्रकार होता है। यदि अगला भाग वर्गाकार हो तो कला के माध्यम
से धन एवं यश दोनों ही कमाता है। यदि ऊपरी भाग चपटा हो तो इतिहास से संबंध-
धित कार्यों में वह विशेष रुचि लेता है तथा उसमें सफलता भी प्राप्त करता है। यदि
इस उंगली का पहला पर्व लम्बा हो तो इसमें कलात्मक रुचि विशेष रूप से होती है।
यदि दूसरा पर्व लम्बा हो तो अपनी प्रतिभा के बल पर यह व्यक्ति बहुत ऊंचे स्तर
तक उठ सकता है। यदि तीसरा पर्व लम्बा तथा चौड़ा हो तो अपने जीवन में यह
राष्ट्र-व्यापी सम्मान अर्जित करता है। यदि यह उंगली तर्जनी के बराबर लम्बी हो
तो उसे विशेष ख्याति की भूख बनी रहती है। यदि यह उंगली मध्यमा के बराबर
लम्बी हो तो इसके जीवन में कई कार्य आकस्मिक रूप से गठित होते हैं और अन्त
में यह सफलता प्राप्त करके ही रहता है।
कनिष्ठिका उंगली :
अंग्रेजी में इस उंगली को 'फिंगर आफ
मरकरी' अथवा 'लिटल फिंगर' कहते हैं। इसके
मूल में बुध पर्वत का स्थान माना गया है।
प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में यह सभी उंगलियों से
छोटी होती है। यदि यह उंगली अनामिका के
नाखून तक पहुंच जाए तो वह व्यक्ति जीवन में
अत्यन्त उच्चस्तरीय सफलता प्राप्त करता है तथा
महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होता है। यह उंगली
जितनी ही ज्यादा लम्बी होती है उतनी ही
ज्यादा शुभ मानी गई है। ऐसी उंगली रखने वाले
व्यक्ति सफल प्रशासक एवं सफल साहित्यकार कहे
जाते हैं। यदि यह उंगली अनामिका के ऊपरी
पोर के अर्द्ध भाग से भी आगे बढ़ जाती है तो
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ऐसा व्यक्ति सेक्रेटरी अथवा आई० ए० एस० अधिकारी होता है। इन लोगों को
आकस्मिक रूप से धन लाभ होता है तथा जीवन का उत्तरार्द्ध अत्यन्त सफलता के
साथ व्यतीत होता है।
यदि यह उंगली असाधारण रूप से लम्बी दिखाई दे तो ऐसे व्यक्ति बुद्धिजीवी
होते हैं तथा उनमें दूसरों को प्रभावित करने की विशेष क्षमता होती है। यदि यह
उंगली बहुत अधिक छोटी हो तो वह व्यक्ति बात के मर्म को बहुत जल्दी समझ जाता
है और तुरन्त निर्णय लेने में समर्थ रहता है। यदि इसका आगे का सिरा नुकीला हो तो
ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान, सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न तथा वाकपटु होते हैं। यदि आगे का भाग
वर्गाकार हो तो ऐसे व्यक्ति में तर्क करने की विशेष क्षमता होती है तथा ये अपने
भाषणों के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि ऊपरी भाग
चपटा हो तो वैज्ञानिक अथवा मशीनरी सम्बन्धी कार्यों में रुचि लेने वाला होता है।
यदि उस उंगली का पहला पर्व लम्बा हो तो वह व्यक्ति विज्ञान में सफलता प्राप्त
करता है। यदि दूसरा पर्व लम्बा हो तो वह परिश्रम के माध्यम से व्यापार में विशेष
सफलता अर्जित करता है। यदि इसका तीसरा पर्व लम्बा हो तो ऐसा व्यक्ति चतुर
होता है परन्तु उसमें असत्य बोलने की भावना जरूरत से ज्यादा होती है। यदि यह
उंगली अनामिका के बराबर लम्बी हो तो ऐसा व्यक्ति ऊंचे स्तर का दार्शनिक तथा
बुद्धिमान होता है। यदि यह उंगली मध्यमा के बराबर लम्बी दिखाई दे तो वह
व्यक्ति अपने कार्यों से विश्वविख्यात होता है। वास्तव में अनामिका उंगली जितनी
ही ज्यादा लम्बी होती है, उतना ही ज्यादा शुभ कहा जाता है।
उंगलियों की दूरी :
दो उंगलियों का खाली स्थान भी अपनेआप में महत्व रखता है। यदि अंगूठे
और तर्जनी के बीच अधिक दूरी हो तो उस व्यक्ति में मानवीय गुण भरपूर होते हैं
तथा उनमें प्रेम, दया, क्षमा आदि मानवोचित गुण सहज, स्वाभाविक रूप से प्राप्त
होते हैं। यदि तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच खाली जगह दिखाई दे तो वह
व्यक्ति अपने विचारों में स्वतन्त्र होता है तथा अपनी बात को किसी के भी सामने
कहने में हिचकिचाता नहीं। मध्यमा और अनामिका उंगली के बीच का खाली स्थान
व्यक्ति की लापरवाही और असभ्यता प्रदर्शित करता है। इसी प्रकार अनामिका और
कनिष्ठिका के बीच खाली स्थान हो तो ऐसा व्यक्ति हत्यारा एवं निर्दयी होता है।
उंगलियों के अग्र भाग :
उंगलियों के अग्रभाग भी भविष्य-कथन में बहुत ज्यादा महत्व रखते हैं।
हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार ये अग्र भाग चार प्रकार के होते हैं।
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विभिन्न प्रकार के अग्रभागों वाली उंगलियां
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१. तीखे
२. चपटे
३. नोकीले
४. वर्गाकार
कई बार यह देखने में आया है कि सभी उंगलियों के अग्र भाग एक समान ही
होते हैं और कई बार अलग-अलग उंगलियों के अग्रभाग अलग-अलग प्रकार के होते
हैं। अब मैं सामान्य रूप से इनका वर्णन स्पष्ट कर रहा हूँ :
१. तीखी उंगलियां :—जिनके हाथों में तीखी उंगलियां होती हैं अथवा जिनके
अग्रभाग तीखे होते हैं, वे व्यक्ति अत्यन्त ही श्रेष्ठ तथा समाज में अग्रणी माने जाते हैं।
ऐसे व्यक्ति दार्शनिक, कलाकार, संगीतकार, तथा अपनी आत्मा के अनुसार चलने
वाले होते हैं । उनके हृदय में घृणा, क्रोध और अविवेक नहीं होता अपितु इनका पूरा
हृदय दया, प्रेम, और स्नेह से लबालब भरा होता है ।
परन्तु अत्यधिक तीखी उंगलियां मस्तिष्क के पागलपन को स्पष्ट करती हैं। ऐसे
व्यक्ति केवल कल्पना में ही खोये रहते हैं। इनके जीवन में सफलता कम ही रहती
है। तांत्रिक लोगों की उंगलिया सामान्यतः ऐसी ही देखने को मिलती हैं। जहां तक
देखा गया है, यह अनुभव में आया है कि मनुष्यों में वे व्यक्ति ज्यादा उन्नत एवं सभ्य
ज्ञात हुए हैं, जिनकी उंगलियों के अग्रभाग सामान्य रूप से तीखे होते हैं।
२. चपटी उंगलियां :—चपटी उंगलियां कार्यकुशलता तथा फुर्ती की सूचक
होती हैं। ऐसे व्यक्ति अपने कार्यों में बराबर लगे रहते हैं तथा किसी भी कार्य को बीच
में नहीं छोड़ते । जब तक कोई कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो जाता तब तक
ये विश्राम नहीं लेते । इनमें भरपूर आत्म-विश्वास होता है और अपने आत्म-विश्वास
के बल पर ही कार्यों को पूर्णता की ओर पहुंचाते हैं । ऐसे व्यक्ति सफल युद्ध विशारद,
संगीतकार, कुशल कारीगर, कुशल खिलाड़ी तथा श्रेष्ठ विद्वान होते हैं । सीखने की
इनमें विशेष प्रवृत्ति होती है । इनके जीवन में व्यवस्था और क्रमबद्धता होती है । ऐसे
व्यक्ति धर्म के प्रति कट्टर नहीं होते अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उदारता से काम
लेते हैं । वस्तुतः ऐसे व्यक्ति ही अपने कार्यों से अपने समाज को कुछ नया योगदान
देने में सफल होते हैं।
३. नुकीली उंगलियां :—ये उंगलियां मानव के सुन्दर विचारों तथा सुन्दर कार्यों
की ओर इंगित करती हैं । ऐसे व्यक्ति जो भी कार्य करेंगे वह एक तरीके से करेंगे
और उनके कार्यों में एक विशेष प्रकार की व्यवस्था होगी परन्तु ऐसा देखा गया है कि
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तीखी अंगुलियां
नोकीया अंगुलियां
वर्गाकार अंगुलियां
चपटी अंगुलियां
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इनके जीवन में उतार-चढ़ाव बराबर बना रहता है । कभी ये प्रसन्नता की चरम
सीमा पर होते हैं तो कभी इनके जीवन में जरूरत से ज्यादा निराशा छा जाती है ।
इनका वैवाहिक-जीवन अधिकतर असफल ही रहता है ।
उंगलियों के अग्र भाग बहुत अधिक तीखे होना अनुकूल नहीं कहा जाता ।
ऐसे व्यक्तियों में आत्म-विश्वास कम होगा । ये अपनी भावनाओं के अनुसार ही चलते
हैं । ऐसे व्यक्ति आलसी, कामुक और अक्षम कहे जाते हैं । ऐसे व्यक्ति अपने पेट में
रहस्य नहीं रख सकते ।
४. वर्गाकार उंगलियां :—जिन व्यक्तियों के हाथों में वर्गाकार उंगलियां
होती हैं, वे व्यक्ति जीवन में दूरदर्शी तथा नियमितता के साथ कार्य करने वाले होते
हैं । अधिकतर ऐसे व्यक्ति व्यापारी वर्ग में आते हैं जो प्रत्येक कार्य की योजना बहुत
अधिक सोच-विचार कर करते हैं । ऐसे व्यक्ति फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले होते हैं
तथा इनके कार्यों में एक नियमतता होती है । ये स्वयं भी पूरा परिश्रम करते हैं और
दूसरों से भी काम लेने की युक्ति इनको आती है । स्वच्छता, समय की पाबन्दी, अपने
वचनों की रक्षा, आत्म विश्वास आदि गुण इनमें विशेष रूप से पाये जाते हैं । ऐसे
व्यक्ति अच्छे गणितज्ञ, इतिहासज्ञ, तथा कवि होते हैं । ऐसे ही व्यक्ति जीवन में
विशेष सफलता प्राप्त कर सकते हैं ।
उंगली दर्शन :
यदि उंगलियां भीतर की ओर झुकी हुई हों तो व्यक्ति दुनियादारी में बहुत
अधिक चतुर होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति प्रत्येक कार्य की देखभाल कर सकते हैं ।
यदि उंगलियों का झुकाव बाहर की ओर हो तो ऐसे व्यक्तियों का हृदय
उदार होता है । अपने विचारों के वे धनी होते हैं तथा जीवन में यदि किसी को
आश्वासन देते हैं तो अपने कथन को अन्तिम क्षण तक निभाने की कोशिश करते हैं ।
यदि उंगलियां जरूरत से ज्यादा बाहर झुकी हुई हों तो व्यक्ति लापरवाह होता है ।
यदि उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी एवं बेडौल हों तो व्यक्ति अपराधी वर्ग के होते हैं
तथा अपराध पूर्ण कार्यों में ही उनकी रुचि रहती है ।
जिनकी उंगलियां मोटी और फूली हुई होती हैं, वे निर्धनता की सूचक होती
हैं । ऐसे व्यक्ति जितना ही उपार्जित करते हैं, उससे ज्यादा खर्च कर डालते हैं ।
यदि उंगलियां चपटी हों तो व्यक्ति सेवाकार्य में सफल होते हैं । जीवन में
ऊंचे स्तर पर तथा अधिकारी पद पर पहुंचकर प्रशंसा अर्जित करते हैं ।
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जिसकी उंगलियां एक सीध में होती हैं, वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है तथा
समाज में उसको विशेष सम्मान मिलता है।
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यदि सभी उंगलियां गठीली एवं उबड़-खाबड़ हों तो व्यक्ति विचारशील एवं
अध्ययन प्रिय होता है।
यदि उंगलियों में गांठें बहुत ज्यादा विकसित हों तो ऐसा व्यक्ति प्रतिभावान
तथा चिन्तक होता है। उसके प्रत्येक कार्य में एक विशेष सुघड़ता और व्यवस्था
होती है।
यदि ये गांठें अत्यधिक उभरी हुई होती हैं तो ऐसे व्यक्ति जीवन में निराशा-
वादी होते हैं तथा अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
यदि ये गांठें चिकनी होती हैं तो व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक देखे गये हैं।
यदि गांठें रहित उंगलियां हों तो व्यक्ति दार्शनिक होता है।
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उंगलियों पर निशान :
उंगलियों पर पाये जाने वाले निशान भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिये बहुत
अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। अपराध शास्त्र में इन चिन्हों का बहुत अधिक महत्व
माना गया है। इन चिन्हों के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र उसका मनोविज्ञान आदि को
अच्छी तरह से जान सकते हैं। इन चिन्हों के माध्यम से ही हम उसके व्यक्तित्व को
भली प्रकार से समझ सकते हैं। ये चिह्न निम्न प्रकार से हैं :
१. शंकु :—उंगलियों के ऊपरी भाग अर्थात पोरुओं पर यदि शंकु का चिन्ह
दिखाई दे तो ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से अत्यन्त समर्थ एवं श्रेष्ठ होता है। ऐसे
व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी उन्नति करते रहते हैं तथा परिस्थितियों पर
विजय प्राप्त करते हैं साथ ही परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढाल लेने की
क्षमता रखते हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में अपने प्रयत्नों से सफल हो जाते हैं परन्तु वृद्धा-
वस्था में ये व्यक्ति हृदय रोगों के भी शिकार पाये जाते हैं।
२. तम्बू :—किसी-किसी व्यक्ति की उंगलियों के पोरुओं पर तम्बू वत
चिह्न देखने को मिलते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिकतर सहृदय एवं कलाकार होते हैं और
अपनी कला के माध्यम से बहुत ऊंचे उठते हैं। परन्तु यह बात भी सही है कि ऐसे
व्यक्ति भावुक होते हैं और इन लोगों का अनुचित लाभ उठाया जाता है। मानसिक
दृष्टि से ऐसे व्यक्ति असंतुलित होते हैं तथा इनका गृहस्थ जीवन लगभग दुखमय-सा
ही रहता है।
३. चक्र :—उंगलियों पर चक्र के निशान पाये जाना शुभ माना गया है। ऐसे
व्यक्ति अपने विचारों में स्वतंत्र होते हैं तथा इनके प्रत्येक कार्य में मौलिकता दिखाई
देती है। विवेक के बल पर ये समाज में सम्माननीय स्थान भी प्राप्त करते हैं तथा ये
रूढ़ि, अज्ञान और पोंगा पन्थी से दूर रहते हैं।
४. मेहराब :—जिन के पोरुओं पर मेहराब के चिह्न पाये जाते हैं, वे व्यक्ति
अधिकतर आलसी, शक्की तथा सन्देहशील प्रकृति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का न
तो अपने आप पर भरोसा होता है और न ये किसी दूसरों पर भरोसा करते हैं। ऐसे
व्यक्ति अपने चारों ओर भ्रम का वातावरण बनाये रखते हैं। रहस्यमय कार्यों तथा
गुप्तचर से सम्बन्धित कार्यों में ये विशेष सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
५. त्रिभुज :—त्रिभुज का चिह्न व्यक्ति को रहस्यमय बनाता है। ऐसे व्यक्ति
योगाभ्यास के द्वारा अपने शरीर को सुगठित बनाने में समर्थ होते हैं। साथ ही साथ
ऐसे व्यक्ति एकान्त प्रेमी तथा रूढ़िवादी भी देखे गए हैं। इनके मन में जो बात घर
कर जाती है उसे ये सहज में ही नहीं छोड़ते।