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सर्वकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 350 में से

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पृष्ठ 267

( २६६ )
महाराजाधिराज योग :
परिभाषा : यदि हाथ मे सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध गुरु, शुक्र
तथा शनि के पर्वत पूर्णतः विकसित हों और इन से संबंधित
सभी रेखाएं पुष्ट, बलवान, पतली, सीधी और स्पष्ट हों तो
महाराजाधिराज योग होता है
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अत्यन्त
भाग्यवान माना जाता है तथा वह आर्थिक व्यापारिक तथा
शारीरिक रूप से दृढ़ एवं बलवान होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन
में समस्त प्रकार के ऐश्वर्य का भोग करता है साथ ही साथ यह
महाराजाधिराज योग अपने जीवन में तीर्थं यात्राएं करता है। दान देता है, तथा
धार्मिक कार्यों मे बढ़-चढ़ कर भाग लेता है। सभी दृष्टियों से इसका जीवन पूर्ण माना
जा सकता है ।
टिप्पणी . निम्नलिखित योग भी महाराजाधिराज योग माना जाता है ।
१. यदि भाग्य रेखा दोहरी हो तथा अत्यन्त पतली हो इसके साथ ही साथ
जीवन रेखा, स्वास्थ्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा भी दोहरी हों। परन्तु ये रेखाएं आपस
में नही टकराती हों ।
देवांश योग .
परिभाषा यदि हाथ मे सात ग्रहों के पर्वतों में से
पांच पर्वत विकसित हों एवं पुष्ट हों तथा उनसे संबंधित रेखाएं
भी स्पष्ट एवं निर्दोष हों तो देवांश योग होता है ।
फल जिसके हाथ में देवांश योग होता है वह व्यक्ति
राजा के समान अपना जीवन व्यतीत करता है । उसके जीवन
में भी समस्त प्रकार के ऐश्वर्य एवं भोग बने रहते हैं ।
देवांश योग