बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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राज राजेश्वर योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य पर्वत विकसित हो तथा
सूर्य रेखा हथेली के मध्य में आकर शुक्र पर्वत की ओर जाती
हो तथा रेखा पर किसी प्रकार की बाधा न हो तो राज राजे-
श्वर योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में राज राजेश्वर योग होता है वह
व्यक्ति पूर्ण सुखी, सफल, धनवान तथा विविध ऐश्वर्य का भोग
करने वाला होता है ।
टिप्पणी : निम्न योग भी इससे सम्बन्धित हैं :
१. यदि हथेली लम्बी हो तथा उंगलियों के बीच में
सन्धि न हो ।
[चित्र : राज राजेश्वर योग]
२. यदि अनामिका और कनिष्ठिका उंगलियां बराबर हों ।
ब्रह्माण्ड योग :
परिभाषा : आदर्श हाथ हो तथा हाथ में चन्द्र पर्वत
तथा शुक्र पर्वत का दो लम्बी रेखाओं से परस्पर सम्बन्ध हो तो
ब्रह्माण्ड योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में ब्रह्माण्ड योग होता है वह व्यक्ति
आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न होता है तथा राजा के समान
जीवन व्यतीत करता है ।
टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने निम्नलिखित
योग भी ब्रह्माण्ड योग बताये हैं ।
१. यदि मध्यमा उंगली के दूसरे पर्व पर तीन या चार
[चित्र : ब्रह्माण्ड योग]
खड़ी रेखाएं हों ।
२. यदि हथेली की सभी उंगलियों के नीचे छोटे अर्द्ध चन्द्र हों ।
३. यदि अंगूठा लम्बा, पतला और पीछे की तरफ झुका हुआ हो साथ ही
शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो ।
४. यदि चन्द्र पर्वत से दो रेखाएं निकलती हों तथा एक रेखा शुक्र पर्वत तथा
दूसरी रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो ।
५. यदि हाथ में सूर्य रेखा के साथ-साथ सहायक रेखा भी चल रही हो ।