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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 153 में से

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पृष्ठ 87

असत्-परिहार
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहे स च केवलः।
यत्किञ्चित्पश्यतो भेदं भयं ब्रूते यजुःश्रुतिः॥ ३३०॥
जिसने जीते हुए ही कैवल्यपद प्राप्त कर लिया है उसीकी देहपातके
अनन्तर कैवल्यमुक्ति होती है, क्योंकि जो थोड़ा-सा भी भेद देखता है
उसके लिये यजुर्वेदकी श्रुति भय बताती है।
यदा कदा वापि विपश्चिदेष
ब्रह्मण्यनन्तेऽप्यणुमात्रभेदम् ।
पश्यत्यथामुष्य भयं तदैव
यद्वीक्षितं भिन्नतया प्रमादात् ॥ ३३१ ॥
जब कभी यह विद्वान् अनन्त ब्रह्ममें अणुमात्र भी भेद-दृष्टि करता
है तभी इसको भयकी प्राप्ति होती है, क्योंकि स्वरूपके प्रमादसे ही
अखण्ड आत्मामें भेदकी प्रतीति हुई है।
श्रुतिस्मृतिन्यायशतैर्निषिद्धे
दृश्येऽत्र यः स्वात्ममतिं करोति।
उपैति दुःखोपरि दुःखजातं
निषिद्धकर्ता स मलिम्लुचो यथा॥ ३३२ ॥
श्रुति, स्मृति और सैकड़ों युक्तियोंसे निषिद्ध हुए इस दृश्य (देहादि)-
में जो आत्मबुद्धि करता है, वह निषिद्ध कर्म करनेवाले चोरके समान
दुःख-पर-दुःख भोगता है।
सत्याभिसन्धानरतो विमुक्तो
महत्त्वमात्मीयमुपैति नित्यम्।
मिथ्याभिसन्धानरतस्तु नश्येद्
दृष्टं तदेतद्यदचोरचोरयोः ॥ ३३३ ॥
जो अद्वितीय ब्रह्मरूप सत्य पदार्थकी खोज करता है वही मुक्त होकर अपने