सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 153 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

प्रमाद-निन्दा ८७
तमस्तमःकार्यमनर्थजालं
न दृश्यते सत्युदिते दिनेशे।
तथाद्वयानन्दरसानुभूतौ
नैवास्ति बन्धो न च दुःखगन्धः ॥ ३२०॥
सूर्यके उदय होनेपर जैसे अन्धकार और उसमें होनेवाले [ चोरी
आदि ] अनर्थ-समूह कहीं दिखलायी नहीं देते, वैसे ही इस अद्वितीय
आत्मानन्दके रसका अनुभव होनेपर न तो संसार-बन्धन रहता है और
न दुःखका ही गन्ध रहता है।
प्रमाद-निन्दा
दृश्यं प्रतीतं प्रविलापयन्स्वयं
सन्मात्रमानन्दघनं विभावयन्।
समाहितः सन्बहिरन्तरं वा
कालं नयेथाः सति कर्मबन्धे ॥ ३२१॥
यदि तुम्हारा कर्मबन्धन अभी शेष है तो इस प्रतीयमान दृश्यका लय
करते हुए तथा बाहर-भीतरसे सावधान रहकर अपने सत्तामात्र आनन्दघन
स्वरूपका चिन्तन करते हुए कालक्षेप करो।
प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन।
प्रमादो मृत्युरित्याह भगवान्ब्रह्मणः सुतः ॥ ३२२॥
ब्रह्मविचारमें कभी प्रमाद (असावधानी) न करना चाहिये, क्योंकि ब्रह्माजीके
पुत्र (भगवान् सनत्कुमारजी)-ने 'प्रमाद मृत्यु है'-ऐसा कहा है।
न प्रमादादनर्थोऽन्यो ज्ञानिनः स्वस्वरूपतः।
ततो मोहस्ततोऽहंधीस्ततो बन्धस्ततो व्यथा ॥ ३२३॥
विचारवान् पुरुषके लिये अपने स्वरूपानुसन्धानसे प्रमाद करनेसे
बढ़कर और कोई अनर्थ नहीं है, क्योंकि इसीसे मोह होता है और मोहसे
अहंकार, अहंकारसे बन्धन तथा बन्धनसे क्लेशकी प्राप्ति होती है।