विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रिया, चिन्ता और वासनाका त्याग ८५
क्रिया, चिन्ता और वासनाका त्याग
निगृह्य शत्रोरहमोऽवकाशः
क्वचिन्न देयो विषयानुचिन्त्या।
स एव संजीवनहेतुरस्य
प्रक्षीणजम्बीरतरोरिवाम्बु ॥ ३११ ॥
इस अहंकाररूप शत्रु का निग्रह कर लेनेपर फिर विषयचिन्तनके द्वारा
इसे सिर उठानेका अवसर कभी न देना चाहिये, क्योंकि नष्ट हुए
जम्बीरके वृक्षके लिये जलके समान इसके पुनरुज्जीवन (फिर जी उठने)-
का कारण यह विषय-चिन्तन ही है।
देहात्मना संस्थित एव कामी
विलक्षणः कामयिता कथं स्यात्।
अतोऽर्थसन्धानपरत्वमेव
भेदप्रसक्त्या भवबन्धहेतुः ॥ ३१२ ॥
जो पुरुष देहात्म-बुद्धिसे स्थित है, वही कामनावाला होता है। जिसका
देहसे सम्बन्ध नहीं है, वह विलक्षण आत्मा कैसे सकाम हो सकता है?
इसलिये भेदासक्तिका कारण होनेसे विषय-चिन्तनमें लगा रहना ही
संसार-बन्धनका मुख्य कारण है।
कार्यप्रवर्धनाद्बीजप्रवृद्धिः परिदृश्यते।
कार्यनाशाद्बीजनाशस्तस्मात्कार्यं निरोधयेत् ॥ ३१३ ॥
कार्यके बढ़नेसे उसके बीजकी वृद्धि होती भी देखी जाती है और
कार्यका नाश हो जानेसे बीज भी नष्ट हो जाता है; इसलिये कार्यका ही
नाश कर देना चाहिये।
वासनावृद्धितः कार्यं कार्यवृद्ध्या च वासना।
वर्धते सर्वथा पुंसः संसारो न निवर्तते ॥ ३१४॥
वासनाके बढ़नेसे कार्य बढ़ता है और कार्यके बढ़नेसे वासना बढ़ती
है; इस प्रकार मनुष्यका संसार-बन्धन बिलकुल नहीं छूटता।