विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअहंकार-निन्दा ८३
काटकर इस सर्पका नाश कर देता है, तभी वह इस परम आनन्ददायिनी
सम्पत्तिको भोग सकता है।
यावद्वा यत्किञ्चिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे।
कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥ ३०४ ॥
जबतक देहमें विषका थोड़ा-सा भी दोष रहता है, तबतक वह उसे
नीरोग कैसे रहने देगा ? उसी प्रकार योगीकी मुक्तिके मार्गमें अहंकारका
यत्किंचित् लेश भी भारी प्रतिबन्धक होता है।
अहमोऽत्यन्तनिवृत्त्या तत्कृतनानाविकल्पसंहृत्या ।
प्रत्यक्तत्त्वविवेकादयमहमस्मीति विन्दते तत्त्वम् ॥ ३०५ ॥
अहंकारकी निःशेष निवृत्तिसे उससे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके
विकल्पोंका नाश हो जानेपर आत्मतत्त्वका विवेक हो जानेसे 'यह आत्मा
ही मैं हूँ' ऐसा तत्त्व-बोध प्राप्त होता है।
अहंकर्त्र्यस्मिन्नहमिति मतिं मुंच सहसा
विकारात्मन्यात्मप्रतिफलजुषि स्वस्थितिमुषि।
यदध्यासात्प्राप्ता जनिमृतिजरादुःखबहुला
प्रतीचश्चिन्मूर्तेस्तव सुखतनोः संसृतिरियम् ॥ ३०६॥
इस विकारात्मक, आत्मप्रतिविम्बयुक्त और स्वरूपको छिपानेवाले
अहंकारमें अहंबुद्धिको शीघ्र ही त्याग दे। इसके अध्याससे ही तुझ
'चैतन्यमूर्ति, आनन्दस्वरूप प्रत्यगात्माको जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि नाना
प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण यह संसार-बन्धन प्राप्त हुआ है।
सदैकरूपस्य चिदात्मनो विभो-
रानन्दमूर्तेरनवद्यकीर्तेः ।
नैवान्यथा क्वाप्यविकारिणस्ते
विनाहमध्यासममुष्य संसृतिः ॥ ३०७॥