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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 153 में से

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पृष्ठ 7

१० विवेक-चूडामणि
अर्थस्य निश्चयो दृष्टो विचारेण हितोक्तितः ।
न स्नानेन न दानेन प्राणायामशतेन वा ॥ १३ ॥
कल्याणप्रद उक्तियोंद्वारा विचार करनेसे ही वस्तुका निश्चय होता
देखा जाता है; स्नान, दान अथवा सैकड़ों प्राणायामोंसे नहीं।
अधिकारिनिरूपण
अधिकारिणमाशास्ते फलसिद्धिविशेषतः ।
उपाया देशकालाद्याः सन्त्यस्मिन्सहकारिणः ॥ १४ ॥
विशेषतः अधिकारीको ही फल-सिद्धि होती है; देश, काल आदि
उपाय भी उसमें सहायक अवश्य होते हैं।
अतो विचारः कर्तव्यो जिज्ञासोरात्मवस्तुनः ।
समासाद्य दयासिन्धुं गुरुं ब्रह्मविदुत्तमम् ॥ १५ ॥
अतः ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ दयासागर गुरुदेवकी शरणमें जाकर
जिज्ञासुको आत्मतत्त्वका विचार करना चाहिये।
मेधावी पुरुषो विद्वानूहापोहविचक्षणः ।
अधिकार्यात्मविद्यायामुक्तलक्षणलक्षितः ॥ १६ ॥
जो बुद्धिमान् हो, विद्वान् हो और तर्क-वितर्कमें कुशल हो, ऐसे
लक्षणोंवाला पुरुष ही आत्मविद्याका अधिकारी होता है।
विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणशालिनः ।
मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मता ॥ १७ ॥
जो सदसद्विवेकी, वैराग्यवान्, शम-दमादि षट्सम्पत्तियुक्त और
मुमुक्षु हो उसीमें ब्रह्मजिज्ञासाकी योग्यता मानी गयी है।
साधन-चतुष्टय
साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः ।
येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिद्ध्यति ॥ १८ ॥