विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानोपलब्धिका उपाय ९
ज्ञानोपलब्धिका उपाय
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान्
संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृहः सन्।
सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं
तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा ॥ ८ ॥
इसलिये विद्वान् सम्पूर्ण बाह्य भोगोंकी इच्छा त्यागकर सन्तशिरोमणि
गुरुदेवकी शरण जाकर उनके उपदेश किये हुए विषयमें समाहित होकर
मुक्तिके लिये प्रयत्न करे।
उद्धरेदात्मनात्मानं मग्नं संसारवारिधौ।
योगारूढत्वमासाद्य सम्यग्दर्शननिष्ठया ॥ ९ ॥
और निरन्तर सत्य वस्तु आत्माके दर्शनमें स्थित रहता हुआ योगारूढ
होकर संसार-समुद्रमें डूबे हुए अपने आत्माका आप ही उद्धार करे।
संन्यस्य सर्वकर्माणि भवबन्धविमुक्तये।
यत्यतां पण्डितैर्धीरैरात्माभ्यास उपस्थितैः ॥ १० ॥
आत्माभ्यासमें तत्पर हुए धीर विद्वानोंको सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर
भव-बन्धनकी निवृत्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये।
चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किञ्चित् कर्मकोटिभिः ॥ ११ ॥
कर्म चित्तकी शुद्धिके लिये ही है, वस्तूपलब्धि (तत्त्वदृष्टि)-के लिये
नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचारसे ही होती है, करोड़ों कर्मोंसे कुछ भी नहीं
हो सकता।
सम्यग्विचारतः सिद्धा रज्जुतत्त्वावधारणा।
भ्रान्तोदितमहासर्पभयदुःखविनाशिनी ॥ १२ ॥
भलीभाँति विचारसे सिद्ध हुआ रज्जुतत्त्वका निश्चय भ्रमसे उत्पन्न
हुए महान् सर्पभयरूपी दुःखको नष्ट करनेवाला होता है।