विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 153 में से
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एतावुपाधी परजीवयोस्तयोः
सम्यङ्निरासे न परो न जीवः।
राज्यं नरेन्द्रस्य भटस्य खेटक-
स्तयोरपोहे न भटो न राजा॥ २४६॥
ये परमात्मा और जीवकी उपाधियाँ हैं; इनका भली प्रकार बाध हो
जानेपर न परमात्मा ही रहता है और न जीवात्मा ही। जिस प्रकार राज्य
राजाकी उपाधि है तथा ढाल सैनिककी; इन दोनों उपाधियोंके न रहनेपर
न कोई राजा है और न योद्धा।
अथात आदेश इति श्रुतिः स्वयं
निषेधति ब्रह्मणि कल्पितं द्वयम्।
श्रुतिप्रमाणानुगृहीतयुक्त्या
तयोर्निरासःकरणीय एव॥ २४७॥
ब्रह्ममें कल्पित द्वैतको 'अथात आदेशो नेति नेति' (बृह० २।३।६)
इत्यादि श्रुति स्वयं निषेध करती है; इसलिये श्रुति-प्रमाणानुकूल युक्तिसे
उपर्युक्त उपाधियोंका बाध करना ही चाहिये।
नेदं नेदं कल्पितत्वान्न सत्यं
रज्जौ दृष्टव्यालवत्स्वप्नवच्च।
इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोह्य
ज्ञेयः पश्चादेकभावस्तयोर्यः ॥ २४८ ॥
यह दृश्य कल्पित होनेके कारण रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्प और
स्वप्नमें भासनेवाले विविध पदार्थोंकी भाँति सत्य नहीं है; ऐसी ही प्रबल
युक्तियोंसे दृश्यका निषेध करनेपर पीछे उन (जीव और ईश्वर)-का जो
एक-भाव बच रहता है वही जाननेयोग्य है।
ततस्तु तौ लक्षणया सुलक्ष्यौ
तयोरखण्डैकरसत्वसिद्धये ।
नालं जहत्या न तथाजहत्या
किन्तूभयार्थात्मिकयैव भाव्यम्॥ २४९॥
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