विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 153 में से
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भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं
ब्रह्मैव तत्तद्रजतं हि शुक्तिः।
इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यते
त्वारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥ २३८ ॥
अज्ञानीको अज्ञानवश जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह सब ब्रह्म ही
है; जिस प्रकार भ्रमसे प्रतीत हुई चाँदी वस्तुतः सीपी ही है। [ इदं जगत्
(यह जगत् है)—इसमें ] इदम् (यह) रूपसे सदा ब्रह्म ही कहा जाता
है, ब्रह्ममें आरोपित [ जगत् ] तो नाममात्र ही है।
ब्रह्म-निरूपण
अतः परं ब्रह्म सद्वितीयं
विशुद्धविज्ञानघनं निरञ्जनम्।
प्रशान्तमाद्यन्तविहीनमक्रियं
निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ॥ २३९ ॥
इसलिये परब्रह्म सत्, अद्वितीय, शुद्ध विज्ञानघन, निर्मल, शान्त,
आदि-अन्तरहित, अक्रिय और सदैव आनन्दरसस्वरूप है।
निरस्तमायाकृतसर्वभेदं
नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम्।
अरूपमव्यक्तमनाख्यमव्ययं
ज्योतिःस्वयं किञ्चिदिदं चकास्ति ॥ २४० ॥
वह समस्त मायिक भेदोंसे रहित है; नित्य, सुख-स्वरूप, कलारहित
और प्रमाणादिका अविषय है तथा वह कोई अरूप, अव्यक्त, अनाम और
अक्षय तेज है जो स्वयं ही प्रकाशित हो रहा है।
ज्ञातृज्ञेयज्ञानशून्यमनन्तं निर्विकल्पकम्।
केवलाखण्डचिन्मात्रं परं तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ २४१ ॥
बुधजन उस परम तत्त्वको ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इस त्रिपुटीसे रहित,
अनन्त, निर्विकल्प, केवल और अखण्ड-चैतन्यमात्र जानते हैं।
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