सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 153 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 48

मनोमय कोश ५१
विवेक-वैराग्यादि गुणोंके उत्कर्षसे शुद्धताको प्राप्त हुआ मन
मुक्तिका हेतु होता है, अतः पहले बुद्धिमान् मुमुक्षुके वे (ज्ञान-वैराग्य)
दोनों ही दृढ़ होने चाहिये।
मनो नाम महाव्याघ्रो विषयारण्यभूमिषु।
चरत्यत्र न गच्छन्तु साधवो ये मुमुक्षवः ॥ १७८ ॥
मन नामका भयंकर व्याघ्र विषयरूप वनमें घूमता फिरता है। जो
साधु मुमुक्षु हैं, वे वहाँ न जायें।
मनः प्रसूते विषयानशेषान्
स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः।
शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान्
गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥ १७९ ॥
मन ही सम्पूर्ण स्थूल-सूक्ष्म विषयोंको, शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति
आदि भेदोंको तथा गुण, क्रिया, हेतु और फलादिको भोक्ताके लिये
नित्य उत्पन्न करता रहता है।
असङ्गचिद्रूपममुं विमोह्य
देहेन्द्रियप्राणगुणैर्निबध्य ।
अहम्ममेति भ्रमयत्यजस्रं
मनः स्वकृत्येषु फलोपभुक्तिषु ॥ १८० ॥
इस असंग चिद्रूप आत्माको मोहित करके तथा इसे देह, इन्द्रिय,
प्राणादि गुणोंसे बाँधकर, यह मन ही इसको 'मैं-मेरा' भावसे अपने कर्म
और उनके फलोपभोगमें निरन्तर भटकाता है।
अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृति-
रध्यासबन्धस्त्वमुनैव कल्पितः।
रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो
जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत् ॥ १८१ ॥
अध्यास-दोषसे ही पुरुषको जन्म-मरणरूप संसार होता है और यह