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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 153 में से

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आत्मानात्म-विवेक ४३
आत्मानात्म-विवेक
नास्त्रैर्न शस्त्रैरनिलेन वह्निना
छेत्तुं न शक्यो न च कर्मकोटिभिः।
विवेकविज्ञानमहासिना विना
धातुः प्रसादेन सितेन मञ्जुना ॥ १४९ ॥
यह बन्धन विधाताकी विशुद्ध कृपासे प्राप्त हुए विवेक-विज्ञान-रूप
शुभ्र और मंजुल महाखड्गके बिना और किसी अस्त्र, शस्त्र, वायु, अग्नि
अथवा करोड़ों कर्मकलापोंसे भी नहीं काटा जा सकता।
श्रुतिप्रमाणैकमतेः स्वधर्म-
निष्ठा तयैवात्मविशुद्धिरस्य।
विशुद्धबुद्धेः परमात्मवेदनं
तेनैव संसारसमूलनाशः ॥ १५० ॥
जिसका श्रुतिप्रामाण्यमें दृढ़ निश्चय होता है, उसीकी स्वधर्ममें निष्ठा
होती है और उसीसे उसकी चित्तशुद्धि हो जाती है; जिसका चित्त शुद्ध
होता है उसीको परमात्माका ज्ञान होता है और इस ज्ञानसे ही संसाररूपी
वृक्षका समूल नाश होता है।
कोशैरन्नमयाद्यैः पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति।
निजशक्तिसमुत्पन्नैः शैवालपटलैरिवाम्बु वापीस्थम् ॥ १५१ ॥
अन्नमय आदि पाँच कोशोंसे आवृत हुआ आत्मा, अपनी ही शक्तिसे
उत्पन्न हुए शिवाल-पटलसे ढँके हुए वापीके जलकी भाँति नहीं भासता।
तच्छैवालापनये सम्यक् सलिलं प्रतीयते शुद्धम्।
तृष्णासन्तापहरं सद्यः सौख्यप्रदं परं पुंसः ॥ १५२ ॥
पञ्चानामपि कोशानामपवादे विभात्ययं शुद्धः।
नित्यानन्दैकरसः प्रत्यग्रूपः परः स्वयंज्योतिः ॥ १५३ ॥
जिस प्रकार उस शिवालके पूर्णतया दूर हो जानेपर मनुष्योंके तृषारूपी
तापको दूर करनेवाला तथा उन्हें तत्काल ही परम सुख-प्रदान करनेवाला जल

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