विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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इस प्रकार तीनों गुणोंके निरूपणसे यह अव्यक्तका वर्णन हुआ। यही
आत्माका कारण-शरीर है। इसकी अभिव्यक्तिकी अवस्था सुषुप्ति है,
जिसमें बुद्धिकी सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं।
सर्वप्रकारप्रमितिप्रशान्ति-
र्बीजात्मनावस्थितिरेव बुद्धेः।
सुषुप्तिरेतस्य किल प्रतीतिः
किञ्चिन्न वेद्मीति जगत्प्रसिद्धेः ॥ १२३॥
जहाँ सब प्रकारकी प्रमा (ज्ञान) शान्त हो जाती है और बुद्धि
बीजरूपसे ही स्थिर रहती है, वह सुषुप्ति अवस्था है इसकी प्रतीति 'मैं
कुछ नहीं जानता'—ऐसी लोक-प्रसिद्ध उक्तिसे होती है।
अनात्म-निरूपण
देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादयः
सर्वे विकारा विषयाः सुखादयः।
व्योमादिभूतान्यखिलं च विश्व-
मव्यक्तपर्यन्तमिदं ह्यनात्मा ॥ १२४॥
देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और अहंकार आदि सारे विकार, सुखादि
सम्पूर्ण विषय, आकाशादि भूत और अव्यक्तपर्यन्त निखिल विश्व—ये
सभी अनात्मा हैं।
माया मायाकार्यं सर्वं महदादि देहपर्यन्तम्।
असदिदमनात्मकं त्वं विद्धि मरुमरीचिकाकल्पम् ॥ १२५॥
माया और महत्तत्त्वसे लेकर देहपर्यन्त मायाके सम्पूर्ण कार्योंको तू
मरुमरीचिकाके समान असत् और अनात्मक जान।
आत्म-निरूपण
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि स्वरूपं परमात्मनः।
यद्विज्ञाय नरो बन्धान्मुक्तः कैवल्यमश्नुते ॥ १२६॥
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