विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न-विचार २१
[पृथ्वीमें गड़े हुए धनको प्राप्त करनेके लिये जैसे] प्रथम किसी
विश्वसनीय पुरुषके कथनकी और फिर पृथिवीको खोदने, कंकड़-
पत्थर आदिको हटाने तथा [प्राप्त हुए धनको] स्वीकार करनेकी
आवश्यकता होती है—कोरी बातोंसे वह बाहर नहीं निकलता, उसी
प्रकार समस्त मायिक-प्रपंचसे शून्य निर्मल आत्मतत्त्व भी ब्रह्मवित्
गुरुके उपदेश तथा उसके मनन और निदिध्यासनादिसे ही प्राप्त होता
है, थोथी बातोंसे नहीं।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भवबन्धविमुक्तये ।
स्वैरेव यत्नः कर्तव्यो रोगादाविव पण्डितैः ॥ ६८ ॥
इसलिये रोग आदिके समान भव-बन्धकी निवृत्तिके लिये विद्वान्को
अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर स्वयं ही प्रयत्न करना चाहिये।
प्रश्न-विचार
यस्त्वयाद्य कृतः प्रश्नो वरीयाञ्छास्त्रविन्मतः ।
सूत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ ६९ ॥
तूने आज जो प्रश्न किया है, शास्त्रज्ञ जन उसको बहुत श्रेष्ठ मानते हैं।
वह प्रायः सूत्ररूप (संक्षिप्त) है, तो भी गम्भीर अर्थयुक्त और मुमुक्षुओंके
जाननेयोग्य है।
शृणुष्वावहितो विद्वन्यन्मया समुदीर्यते ।
तदेतच्छ्रवणात्सद्यो भवबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥ ७० ॥
हे विद्वन्! जो मैं कहता हूँ, सावधान होकर सुन; उसको सुननेसे तू
शीघ्र ही भवबन्धनसे छूट जायगा।
मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते
वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु ।
ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा
न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ ७१ ॥