विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ विवेक-चूडामणि
शिष्य-प्रशंसा
श्रीगुरुरुवाच
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावितं ते कुलं त्वया।
यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ॥ ५२ ॥
गुरु—तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझसे पवित्र हो गया, क्योंकि
तू अविद्यारूपी बन्धनसे छूटकर ब्रह्मभावको प्राप्त होना चाहता है।
स्व-प्रयत्नकी प्रधानता
ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः।
बन्धमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन ॥ ५३ ॥
पिताके ऋणको चुकानेवाले तो पुत्रादि भी होते हैं, परन्तु भवबन्धनसे
छुड़ानेवाला अपनेसे भिन्न और कोई नहीं है।
मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते ।
क्षुदादिकृतदुःखं तु विना स्वेन न केनचित् ॥ ५४ ॥
[ जैसे ] सिरपर रखे हुए बोझेका दुःख और भी दूर कर सकते हैं,
परन्तु भूख-प्यास आदिका दुःख अपने सिवा और कोई नहीं मिटा सकता।
पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा।
आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा ॥ ५५ ॥
अथवा जैसे जो रोगी पथ्य और औषधका सेवन करता है उसीको
आरोग्य-सिद्धि होती देखी जाती है, किसी औरके द्वारा किये हुए कर्मोंसे
कोई नीरोग नहीं होता।
वस्तुस्वरूपं स्फुटबोधचक्षुषा
स्वेनैव वेद्यं ननु पण्डितेन।
चन्द्रस्वरूपं निजचक्षुषैव
ज्ञातव्यमन्यैरवगम्यते किम् ॥ ५६ ॥
[ वैसे ही ] विवेकी पुरुषको वस्तुका स्वरूप भी स्वयं अपने ज्ञान-