विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न-निरूपण १७
श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग इनको भगवती श्रुति मुमुक्षुकी मुक्तिके
साक्षात् हेतु बतलाती है। जो इन्हींमें स्थित हो जाता है उसका अविद्याकल्पित
देह-बन्धनसे मोक्ष हो जाता है।
अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव
ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः।
तयोर्विवेकोदितबोधवह्नि-
रज्ञानकार्यं प्रदहेत्समूलम् ॥ ४९ ॥
तुझ परमात्माका अनात्म-बन्धन अज्ञानके कारण ही है और उसीसे
तुझको [जन्म-मरणरूप] संसार प्राप्त हुआ है। अतः उन (आत्मा और
अनात्मा) के विवेकसे उत्पन्न हुआ बोधरूप अग्नि अज्ञानके कार्यरूप
संसारको मूलसहित भस्म कर देगा।
प्रश्न-निरूपण
शिष्य उवाच
कृपया श्रूयतां स्वामिन्प्रश्नोऽयं क्रियते मया।
तदुत्तरमहं श्रुत्वा कृतार्थः स्यां भवन्मुखात् ॥ ५० ॥
शिष्य—हे स्वामिन्! कृपया सुनिये; मैं यह प्रश्न करता हूँ। उसका
उत्तर आपके श्रीमुखसे सुनकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा।
को नाम बन्धः कथमेष आगतः
कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः।
कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा
तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ ५१ ॥
बन्ध क्या है ? यह कैसे हुआ ? इसकी स्थिति कैसे है ? और इससे
मोक्ष कैसे मिल सकता है ? अनात्मा क्या है ? परमात्मा किसे कहते हैं ? और
उनका विवेक (पार्थक्य-ज्ञान) कैसे होता है ? कृपया यह सब कहिये।