विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेशका उपसंहार १४५
सदात्मनि ब्रह्मणि तिष्ठतो मुनेः
पूर्णाद्वयानन्दमयात्मना सदा।
न देशकालाद्युचितप्रतीक्षा
त्वङ्मांसविट्पिण्डविसर्जनाय ॥ ५५८ ॥
सत्स्वरूप ब्रह्ममें सदैव परिपूर्ण अद्वितीय आनन्दस्वरूपसे स्थित
रहनेवाले मुनिको इस त्वचा, मांस और मल-मूत्रके पिण्डको त्यागनेके
लिये किसी योग्य देशकाल आदिकी अपेक्षा नहीं होती।
देहस्य मोक्षो नो मोक्षो न दण्डस्य कमण्डलोः।
अविद्याहृदयग्रन्थिमोक्षो मोक्षो यतस्ततः ॥ ५५९ ॥
क्योंकि मोक्ष हृदयकी अविद्यारूप ग्रन्थिके नाशको ही कहते हैं।
इसलिये देह अथवा दण्ड-कमण्डलुके त्यागका नाम मोक्ष नहीं है।
कुल्यायामथ नद्यां वा शिवक्षेत्रेऽपि चत्वरे।
पर्णं पतति चेत्तेन तरोः किं नु शुभाशुभम् ॥ ५६० ॥
वृक्षका सूखकर झड़ा हुआ पत्ता नालीमें, नदीमें, शिवालयमें अथवा
किसी चबूतरेपर कहीं भी गिरे, उससे वृक्षका क्या हानि-लाभ हो सकता है ?
पत्रस्य पुष्पस्य फलस्य नाशवद्
देहेन्द्रियप्राणधियां विनाशः।
नैवात्मनः स्वस्य सदात्मकस्या-
नन्दाकृतेर्वृक्षवदस्ति चैषः ॥ ५६१ ॥
वृक्षके पत्ते, फूल और फलोंके समान नाश तो जीवके देह, इन्द्रिय, प्राण
और बुद्धि आदिका ही होता है, सदानन्दस्वरूप स्वयं आत्माका नाश कभी
नहीं होता; वह तो वृक्षके समान नित्य निश्चल है।
प्रज्ञानघन इत्यात्मलक्षणं सत्यसूचकम्।
अनूद्यौपाधिकस्यैव कथयन्ति विनाशनम् ॥ ५६२ ॥
'प्रज्ञानघन' यह आत्माका लक्षण उसकी सत्यताका सूचक है—विज्ञजन
ऐसा अनुवाद (वर्णन) करके उपाधि-कल्पित वस्तुका ही विनाश बतलाते हैं।