विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेशका उपसंहार १३७
कस्तां परानन्दरसानुभूति-
मुत्सृज्य शून्येषु रमेत विद्वान्।
चन्द्रे महाह्लादिनि दीप्यमाने
चित्रेन्दुमालोकयितुं क इच्छेत् ॥ ५२३ ॥
उस परमानन्दरसके अनुभवको छोड़कर अन्य थोथे विषयोंमें कौन
बुद्धिमान् रमण करेगा ? अति आनन्ददायक पूर्णचन्द्रके प्रकाशित रहते हुए
चित्र-लिखित चन्द्रमाको देखनेकी इच्छा कौन करेगा ?
असत्पदार्थानुभवे न किञ्चि-
न ह्यस्ति तृप्तिर्न च दुःखहानिः ।
तदद्वयानन्दरसानुभूत्या
तृप्तः सुखं तिष्ठ सदात्मनिष्ठया ॥ ५२४ ॥
असत् पदार्थोंके अनुभवसे न तो कुछ तृप्ति ही होती है और न
दुःखका नाश ही; अतः इस अद्वयानन्दरसके अनुभवसे तृप्त होकर सत्य
आत्मनिष्ठ-भावसे सुखपूर्वक स्थित हो।
स्वमेव सर्वथा पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम्।
स्वानन्दमनुभुञ्जानः कालं नय महामते ॥ ५२५ ॥
हे महाबुद्धे ! सब ओर केवल अपनेको ही देखता हुआ, अपनेको अद्वितीय
मानता हुआ और आत्मानन्दका अनुभव करता हुआ कालक्षेप कर।
अखण्डबोधात्मनि निर्विकल्पे
विकल्पनं व्योम्नि पुरःप्रकल्पनम्।
तदद्वयानन्दमयात्मना सदा
शान्तिं परामेत्य भजस्व मौनम् ॥ ५२६ ॥
अखण्डबोधस्वरूप निर्विकल्प आत्मामें किसी विकल्पका होना
आकाशमें नगरकी कल्पनाके समान है। इसलिये अद्वितीय आनन्दमय
आत्मस्वरूपसे स्थित होकर परमशान्ति लाभ कर मौन धारण करो।