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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 153 में से

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पृष्ठ 131

१३४ विवेक-चूड़ामणि
घड़ेके धर्मोंसे जैसे आकाशका कोई सम्बन्ध नहीं होता वैसे ही यह
जड देह जलमें अथवा स्थलमें कहीं भी लोटता रहे मैं इसके धर्मोंसे लिप्त
नहीं हो सकता।
कर्तृत्वभोक्तृत्वखलत्वमत्तता-
जडत्वबद्धत्वविमुक्ततादयः ।
बुद्धेर्विकल्पा न तु सन्ति वस्तुतः
स्वस्मिन्यरे ब्रह्मणि केवलेऽद्वये ॥ ५११ ॥
कर्तापन, भोक्तापन, दुष्टता, उन्मत्तता, जडता, बन्धन और मोक्ष—
ये सब बुद्धिकी ही कल्पनाएँ हैं; ये प्रकृति आदिसे अतीत केवल अद्वितीय
ब्रह्मस्वरूप स्वात्मामें वस्तुतः नहीं हैं।
सन्तु विकाराः प्रकृतेर्दशधा शतधा सहस्रधा वापि।
किं मेऽसंगचितेस्तैर्न घनः क्वचिदम्बरं स्पृशति ॥ ५१२ ॥
प्रकृतिमें दसों, सैकड़ों और हजारों विकार क्यों न हों, उनसे मुझ असंग
चेतन आत्माका क्या सम्बन्ध ? मेघ कभी भी आकाशको नहीं छू सकता।
अव्यक्तादिस्थूलपर्यन्तमेत-
द्विश्वं यत्राभासमात्रं प्रतीतम्।
व्योमप्रख्यं सूक्ष्ममाद्यन्तहीनं
ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ ५१३ ॥
अव्यक्तसे लेकर स्थूलभूतपर्यन्त यह समस्त विश्व जिसमें आभासमात्र
प्रतीत होता है तथा जो आकाशके समान सूक्ष्म और आदि-अन्तसे रहित
अद्वैत ब्रह्म है, वही मैं हूँ।
सर्वाधारं सर्ववस्तुप्रकाशं
सर्वाकारं सर्वगं सर्वशून्यम्।
नित्यं शुद्धं निश्चलं निर्विकल्पं
ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ ५१४ ॥