सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 153 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

बोधोपलब्धि १२७
बोधोपलब्धि
इति गुरुवचनाच्छ्रुतिप्रमाणात्
परमवगम्य सतत्त्वमात्मयुक्त्या ।
प्रशमितकरणः समाहितात्मा
क्वचिदचलाकृतिरात्मनिष्ठितोऽभूत् ॥ ४८० ॥
इस प्रकार गुरुके श्रुति-प्रमाणयुक्त वचन और अपनी युक्तियोंद्वारा
परमात्मतत्त्वको जानकर चित्त और इन्द्रियोंके शान्त हो जानेसे कोई एक
शिष्य निश्चल वृत्तिसे आत्मस्वरूपमें स्थित हो गया।
कञ्चित्कालं समाधाय परे ब्रह्मणि मानसम्।
व्युत्थाय परमानन्दादिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८१ ॥
और कुछ देरतक परब्रह्ममें चित्तको समाहितकर फिर उस परमानन्दमयी
स्थितिसे उठकर ये वचन बोला।
बुद्धिर्विनष्टा गलिता प्रवृत्ति-
र्ब्रह्मात्मनोरेकतयाधिगत्या ।
इदं न जानेऽप्यनिदं न जाने
किं वा कियद्वा सुखमस्त्यपारम् ॥ ४८२ ॥
अहो! ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान होनेपर मेरी बुद्धि तो
एकदम नष्ट हो गयी, विषयोंमें मेरी सारी प्रवृत्ति दूर हो गयी, मुझे न
इदं (प्रत्यक्ष वस्तु) का ज्ञान है और न अनिदं (अप्रत्यक्ष) का और न
मैं यही जानता हूँ कि वह अपार आनन्द कैसा और कितना है।
वाचा वक्तुमशक्यमेव मनसा मन्तुं न वा शक्यते
स्वानन्दामृतपूरपूरितपरब्रह्माम्बुधेर्वैभवम् ।
अम्भोराशिविशीर्णवार्षिकशिलाभावं भजन्मे मनो
यस्यांशांशालवे विलीनमधुनानन्दात्मना निर्वृतम् ॥ ४८३ ॥
जलराशि (समुद्र)-में पड़कर गले हुए वर्षाकालिक ओलोंकी
अवस्थाको प्राप्त हुआ मेरा मन जिस आनन्दामृतसमुद्रके एक अंशके भी

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 124, कुल 153 में से · SarvaKosh