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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 153 में से

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पृष्ठ 122

आत्मानुभवका उपदेश १२५
भवानपीदं परतत्त्वमात्मनः
स्वरूपमानन्दघनं विचार्य।
विधूय मोहं स्वमनःप्रकल्पितं
मुक्तः कृतार्थो भवतु प्रबुद्धः ॥ ४७३ ॥
अतः हे वत्स ! तुम भी आत्माके इस परमतत्त्व और आनन्दघनस्वरूपका
विचार करते हुए अपने मनःकल्पित मोहको छोड़कर मुक्त हो जाओ और
इस प्रकार अज्ञान-निद्रासे जगकर कृतार्थ हो जाओ।
समाधिना साधु विनिश्चलात्मना
पश्यात्मतत्त्वं स्फुटबोधचक्षुषा।
निःसंशयं सम्यगवेक्षितश्चे-
च्छ्रुतः पदार्थो न पुनर्विकल्प्यते ॥ ४७४ ॥
समाधिके द्वारा भली प्रकार निश्चल हुए चित्त और विकसित ज्ञान-
नेत्रोंसे इस आत्मतत्त्वको देखो, क्योंकि यदि सुना हुआ पदार्थ निःसन्देह होकर
भली प्रकार देख लिया जाता है तो उसके विषयमें फिर कोई संशय नहीं होता।
स्वस्याविद्याबन्धसम्बन्धमोक्षात्
सत्यज्ञानानन्दरूपात्मलब्धौ ।
शास्त्रं युक्तिर्देशिकोक्तिः प्रमाणं
चान्तःसिद्धा स्वानुभूतिः प्रमाणम् ॥ ४७५ ॥
अपने अज्ञानरूप बन्धनका संसर्ग छूट जानेसे जो सच्चिदानन्दस्वरूप
आत्माकी प्राप्ति होती है—उसमें शास्त्र, युक्ति, गुरु-वाक्य और अन्तःकरणसे
सिद्ध होनेवाला अपना अनुभव प्रमाण है।
बन्धो मोक्षश्च तृप्तिश्च चिन्तारोग्यक्षुधादयः।
स्वेनैव वेद्या यज्ज्ञानं परेषामानुमानिकम् ॥ ४७६ ॥
बन्धन, मोक्ष, तृप्ति, चिन्ता, आरोग्य और भूख आदि तो अपने-आप
ही जाने जाते हैं, दूसरोंको उनका जो ज्ञान होता है वह तो केवल
आनुमानिक ही है।