विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 325, कुल 558 में से
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- श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० १ ]
न हन्तव्या महाभाग देवकी भवतानघ।
समर्पयिष्ये सकलानाभिनस्योदरोद्भवान् ॥ १०
श्रीपराशर उवाच
तथेत्याह ततः कंसो वसुदेवं द्विजोत्तम।
न घातयामास च तां देवकीं सत्यगौरवात् ॥ ११
एतस्मिन्नेव काले तु भूरिभारावपीडिता।
जगाम धरणी मेरी समाजं त्रिदिवौकसाम् ॥ १२
सब्रह्मकान्सुरान्सर्वान्प्रणिपत्त्याथ मेदिनी।
कथयामास तत्सर्वं खेदात्करुणभाषिणी ॥ १३
भूमिरुवाच
अग्निस्सुवर्णस्य गुरुर्गवां सूर्यः परो गुरुः।
ममाप्यखिललोकानां गुरुनारायणो गुरुः ॥ १४
प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा पूर्वेषामपि पूर्वजः।
कलाक्रांठानिमेधात्मा कलशचाव्यक्तमूर्तिमान् ॥ १५
तदंशभूतस्सर्वेषां समूहो वसुरोत्तमाः ॥ १६
आदित्या मरुतस्साध्या रुद्रा वस्वशिववहनयः।
पितरो ये च लोकानां स्वष्टारोऽत्रिपुरोगमाः ॥ १७
एते तस्याप्रमेयस्य विष्णो रूपं महात्मनः ॥ १८
यक्षराक्षसदैत्यपिशाचोरगदानवाः ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव रूपं विष्णोर्महात्मनः ॥ १९
ग्रहर्क्ष्तिरकाचित्रगगनानिजलानिलाः।
अहं च विषयाश्चैव सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥ २०
तथाप्यनेकरूपस्य तस्य रूपाण्यहर्निशम्।
बाध्यबाधकतां यान्ति कल्लोला इव सागरे ॥ २१
तत्साम्प्रतममी दैत्याः कालनेमिपुरोगमाः।
मर्त्यलोकं समाक्रम्य बाधन्तेऽहर्निशं प्रजाः ॥ २२
कालनेमिर्हतो योऽसौ विष्णुना प्रभविष्णुना।
उग्रसेनसुतः कंससम्भूतस्स महासुरः ॥ २३
अरिष्टो धेनुकः केशी प्रलम्बो नरकस्तथा।
सुन्दोऽसुरस्तथात्युगो बाणश्चापि बलैस्सुतः ॥ २४
तथान्ये च महावीर्या नृपाणां भवनेषु ये।
समुत्पन्ना दुरात्मानस्तान् संख्यातुमुत्सहे ॥ २५
“हे महाभाग! हे अनघ! आप देवकीका वध न करें; मैं इसके गर्भसे उत्पन्न हुए सभी बालक आपको सौंप दूँगा” ॥ १० ॥
श्रीपराशरजी बोले—हे द्विजोत्तम! तब सत्यके गौरवसे कंसने वसुदेवजीसे ‘बहुत अच्छा’ कह देवकीका वध नहीं किया ॥ ११ ॥ इसी समय अत्यन्त भारसे पीडित होकर पृथिवी [गौका रूप धारणकर] सुमेरुपर्वतपर देवताओंके दलमें गयी ॥ १२ ॥ वहाँ उसने ब्रह्माजीके सहित समस्त देवताओंको प्रणामकर खेदपूर्वक करुणस्वरसे बोलती हुई अपना सारा वृत्तान्त कहा ॥ १३ ॥
पृथिवी बोली—जिस प्रकार अग्नि सुवर्णका तथा सूर्य गो (किरण)-समूहका परमगुरु है, उसी प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके गुरु श्रीनारायण मेरे गुरु हैं ॥ १४ ॥ वे प्रजापतियोंके पति और पूर्वजोंके पूर्वज ब्रह्माजी हैं तथा वे ही कला-काष्ठा-निमेष-स्वरूप अत्यन्त मूर्तिमान् काल हैं। हे देवश्रेष्ठगण! आप सब लोगोंका समूह भी उन्हींका अंशस्वरूप हैं ॥ १५-१६ ॥ आदित्य, मरुद्गण, साध्यगण, रुद्र, वसु, अग्नि, पितृगण और अत्रि आदि प्रजापतिगण—ये सब अप्रमेय महात्मा विष्णुके ही रूप हैं ॥ १७-१८ ॥ यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, सर्प, दानव, गन्धर्व और अप्सरा आदि भी महात्मा विष्णुके ही रूप हैं ॥ १९ ॥ ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणोंसे चित्रित आकाश, अग्नि, जल, वायु, मैं और इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषय—यह सारा जगत् विष्णुमय ही है ॥ २० ॥ तथापि उन अनेक रूपधारी विष्णुके ये रूप समुद्रकी तरंगोंके समान रात-दिन एक-दूसरेके बाध्य-बाधक होते रहते हैं ॥ २१ ॥
इस समय कालनेमि आदि दैत्यगण मर्त्यलोकपर अधिकार जमाकर अहर्निश जनताको क्लेशित कर रहे हैं ॥ २२ ॥ जिस कालनेमिको सामर्थ्यवान् भगवान् विष्णुने मारा था, इस समय वही उग्रसेनके पुत्र महान् असुर कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ है ॥ २३ ॥ अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, सुन्द, बलिका पुत्र अति भयंकर बाणासुर तथा और भी जो महाबलवान् दुरात्मा राक्षस राजाओंके घरमें उत्पन्न हो गये हैं उनकी मैं गणना नहीं कर सकती ॥ २४-२५ ॥
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