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सर्वकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 558 में से

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पृष्ठ 289

२७८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

प्रतिदिनं तन्मणिरत्नमष्टौ कनकभारान्-
स्रवति ॥ २५ ॥ तत्प्रभावाच्च सकलस्यैव
राष्ट्रस्योपसर्गोनावृष्टिब्यालाग्नचोरदुर्भिक्षादिभयं
न भवति ॥ २६ ॥ अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नमुग्रसेनस्य
भूपतेर्योग्यमेतदिति लिप्सां चक्रे ॥ २७ ॥
गोत्रभेदभयाच्छक्तोऽपि न जहार ॥ २८ ॥

सत्राजिद्वप्यच्युतो मामेतद्याचयिष्यतीत्यवगम्य
रत्नलोभाद्भ्रात्रे प्रसेनाय तद्रत्नमदात् ॥ २९ ॥
तच्च शुचिना ध्रियमाणमशेषमेव सुवर्णस्रवादिकं
गुणजातमुत्पादयति अन्यथा धारयन्तमेव हन्ती-
त्यजानन्नसावपि प्रसेनेनस्तेन कण्ठसक्तेन स्यमन्तके-
नाश्वमारुह्याटव्यां मृगयामगच्छत् ॥ ३० ॥ तत्र च
सिंहाद्वधमवाप ॥ ३१ ॥ साश्वं च तं निहत्य
सिंहोऽप्यमलमणिरत्नमास्याग्रेणादाय गन्तु-
मभ्युद्यतः, ऋक्षाधिपतिना जाम्बवता दृष्टो
घातितश्च ॥ ३२ ॥ जाम्बवानप्यमलमणिरत्न-
मादाय स्वबिले प्रविवेश ॥ ३३ ॥ सुकुमारसंज्ञाय
बालकाय च क्रीडनकमकरोत् ॥ ३४ ॥

अनागच्छति तस्मिन्प्रसेने कृष्णो मणिरत्न-
मभिलषितवान्स च प्राप्तवान्नूनमेतदस्य
कर्मेत्यखिल एव यदुलोकः परस्परं कर्णाकर्ण्य-
कथयत् ॥ ३५ ॥

विदितलोकापवादवृत्तान्तश्च भगवान् सर्व-
यदुसैन्यपरिवारपरिवृतः प्रसेनाश्वपदवी-
मनुससार ॥ ३६ ॥ ददर्श चाश्वसमवेतं प्रसेनं सिंहेन
विनिहतम् ॥ ३७ ॥ अखिलजनमध्ये
सिंहपददर्शनकृतपरिशुद्धिः सिंहपदम-
नुससार ॥ ३८ ॥ ऋक्षपतिनिहतं च सिंहमप्यल्पे
भूमिभागे दृष्ट्वा ततश्च तद्रत्नगौरवादृक्षस्यापि
पदान्यनुययौ ॥ ३९ ॥ गिरितटे च सकलमेव
तद्यदुसैन्यमवस्थाप्य तत्पदानुसारी ऋक्षबिलं
प्रविवेश ॥ ४० ॥

अन्तःप्रविष्टश्च धात्र्याः सुकुमारक-
मुल्लालयन्त्या वाणीं शुश्राव ॥ ४१ ॥

वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी ॥ २५ ॥
उसके प्रभावसे सम्पूर्ण राष्ट्रमें रोग, अनावृष्टि तथा
सर्प, अग्नि, चोर या दुर्भिक्ष आदिका भय नहीं रहता
था ॥ २६ ॥ भगवान् अच्युतको भी ऐसी इच्छा हुई कि
यह दिव्य रत्न तो राजा उग्रसेनके योग्य है ॥ २७ ॥
किन्तु जातीय विद्रोहके भयसे समर्थ होते हुए भी
उन्होंने उसे छीना नहीं ॥ २८ ॥

सत्राजित्को जब यह मालूम हुआ कि भगवान् मुझसे
यह रत्न माँगनेवाले हैं तो उसने लोभवश उसे अपने भाई
प्रसेनको दे दिया ॥ २९ ॥ किन्तु इस बातको न जानते हुए
कि पवित्रतापूर्वक धारण करनेसे तो यह मणि सुवर्ण-दान
आदि अनेक गुण प्रकट करती है और अशुद्धावस्थामें
धारण करनेसे घातक हो जाती है, प्रसेन उसे अपने गलेमें
बाँधे हुए घोड़ेपर चढ़कर मृगयाके लिये वनको चला
गया ॥ ३० ॥ वहाँ उसे एक सिंहने मार डाला ॥ ३१ ॥ जब
वह सिंह घोड़ेके सहित उसे मारकर उस निर्मल मणिको
अपने मुँहमें लेकर चलनेको तैयार हुआ तो उसी समय
ऋक्षराज जाम्बवान्ने उसे देखकर मार डाला ॥ ३२ ॥ तदनन्तर
उस निर्मल मणिरत्नको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें
आया ॥ ३३ ॥ और उसे सुकुमार नामक अपने बालकके
लिये खिलौना बना लिया ॥ ३४ ॥

प्रसेनके न लौटनेपर सब यादवोंमें आपसमें यह
कानाफूँसी होने लगी कि “कृष्ण इस मणिरत्नको
लेना चाहते थे, अवश्य ही इन्होंने उसे ले लिया है—
निश्चय यह इन्हींका काम है” ॥ ३५ ॥

इस लोकापवादका पता लगनेपर सम्पूर्ण यादवसेनाके
सहित भगवान्‌ने प्रसेनके घोड़ेके चरण-चिह्नोंका अनुसरण
किया और आगे जाकर देखा कि प्रसेनको घोड़ेसहित
सिंहने मार डाला है ॥ ३६-३७ ॥ फिर सब लोगोंके बीच
सिंहके चरण-चिह्न देख लिये जानेसे अपनी सफाई हो
जानेपर भी भगवान्‌ने उन चिह्नोंका अनुसरण किया और
थोड़ी ही दूरीपर ऋक्षराजद्वारा मारे हुए सिंहको देखा; किन्तु
उस रत्नके महत्त्वके कारण उन्होंने जाम्बवान्‌के पद-
चिह्नोंका भी अनुसरण किया ॥ ३८-३९ ॥ और सम्पूर्ण
यादव-सेनाको पर्वतके तटपर छोड़कर ऋक्षराजके चरणोंका
अनुसरण करते हुए स्वयं उनकी गुफामें घुस गये ॥ ४० ॥

भीतर जानेपर भगवान्‌ने सुकुमारको बहलाती
हुई धात्रीकी यह वाणी सुनी— ॥ ४१ ॥