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सर्वकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 558 में से

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पृष्ठ 227

२१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


प्रथमेऽह्नि बुधश्शस्ताञ्छ्रोत्रियादीन्निमन्त्रयेत्।
कथयेच्च तथैवैषां नियोगात्पितृदैविकान् ॥ ९

ततः क्रोधव्यवायादीनायासं तैर्द्विजैस्सह।
यजमानो न कुर्वीत दोषस्तत्र महानयम् ॥ १०

श्राद्धे नियुक्तो भुक्त्वा वा भोजयित्वा नियुज्य च।
व्यवायी रेतसो गर्ते मज्जयत्यात्मनः पितॄन् ॥ ११

तस्मात्प्रथममत्रोक्तं द्विजाग्र्याणां निमन्त्रणम्।
अनिमन्त्र्य द्विजानेवमागतान्भोजयेद्यतीन् ॥ १२

पादशौचादिना गेहमागतानूजयेद् द्विजान् ॥ १३

पवित्रपाणिराचान्तानासनेषूपवेशयेत् ।
पितॄणामयुजो युग्मान्देवानामिच्छया द्विजान् ॥ १४

देवानामेकमेकं वा पितॄणां च नियोजयेत् ॥ १५

तथा मातामहश्राद्धं वैश्वदेवसमन्वितम्।
कुर्वीत भक्तिसम्पन्नस्तन्त्रं वा वैश्वदैविकम् ॥ १६

प्राङ्मुखान्भोजयेद्विप्रान्देवानामुभयात्मकान्।
पितॄमातामहानां च भोजयेच्चाप्युदङ्मुखान् ॥ १७

पृथक्तयोः केचिदाहुः श्राद्धस्य करणं नृप।
एकत्रैकेन पाकेन वदन्त्यन्ये महर्षयः ॥ १८

विष्टरार्थं कुशं दत्त्वा सम्पूज्यार्घ्यं विधानतः।
कुर्यादावाहनं प्राज्ञो देवानां तदनुज्ञया ॥ १९

यवाम्बुना च देवानां दद्यादर्घ्यं विधानवित्।
स्रग्गन्धधूपदीपांश्च तेभ्यो दद्याद्यथाविधि ॥ २०

पितॄणामपसव्यं तत्सर्वमेवोपकल्पयेत्।
अनुज्ञां च ततः प्राप्य दत्त्वा दर्भांन्द्विधाकृतान् ॥ २१

मन्त्रपूर्वं पितॄणां तु कुर्याच्चावाहनं बुधः।
तिलाम्बुना चापसव्यं दद्यादर्घ्यादिकं नृप ॥ २२

काले तत्रातिथिं प्राप्तमन्नकामं नृपाध्वगम्।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः कामं तमपि भोजयेत् ॥ २३


श्राद्धके पहले दिन बुद्धिमान् पुरुष श्रोत्रिय आदि विहित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और उनसे यह कह दे कि 'आपको पितृ-श्राद्धमें और आपको विश्वेदेव-श्राद्धमें नियुक्त होना है'॥ ९॥ उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके सहित श्राद्ध करनेवाला पुरुष उस दिन क्रोधादि तथा स्त्रीगमन और परिश्रम आदि न करे, क्योंकि श्राद्ध करनेमें यह महान् दोष माना गया है॥ १०॥ श्राद्धमें निमन्त्रित होकर या भोजन करके अथवा निमन्त्रण करके या भोजन कराकर जो पुरुष स्त्री-प्रसंग करता है वह अपने पितृगणको मानो वीर्यके कुण्डमें डुबोता है॥ ११॥ अतः श्राद्धके प्रथम दिन पहले तो उपरोक्त गुणविशिष्ट द्विजश्रेष्ठोंको निमन्त्रित करे और यदि उस दिन कोई अनिमन्त्रित तपस्वी ब्राह्मण घर आ जायँ तो उन्हें भी भोजन करावे॥ १२॥

घर आये हुए ब्राह्मणोंका पहले पाद-शुद्धि आदिसे सत्कार करे; फिर हाथ धोकर उन्हें आचमन करानेके अनन्तर आसनपर बिठावे। अपनी सामर्थ्यानुसार पितृगणके लिये अयुग्म और देवगणके लिये युग्म ब्राह्मण नियुक्त करे अथवा दोनों पक्षोंके लिये एक-एक ब्राह्मणकी ही नियुक्ति करे॥ १३-१५॥ और इसी प्रकार वैश्वदेवके सहित मातामह-श्राद्ध करे अथवा पितृपक्ष और मातामह-पक्ष दोनोंके लिये भक्तिपूर्वक एक ही वैश्वदेव-श्राद्ध करे॥ १६॥ देव-पक्षके ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाकर और पितृ-पक्ष तथा मातामह-पक्षके ब्राह्मणोंको उत्तर-मुख बिठाकर भोजन करावे॥ १७॥ हे नृप! कोई तो पितृ-पक्ष और मातामह-पक्षके श्राद्धोंको अलग-अलग करनेके लिये कहते हैं और कोई महर्षि दोनोंका एक साथ एक पाकमें ही अनुष्ठान करनेके पक्षमें हैं॥ १८॥ विज्ञ व्यक्ति प्रथम निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठनेके लिये कुशा बिछाकर फिर अर्घ्यदान आदिसे विधिपूर्वक पूजा कर उनकी अनुमतिसे देवताओंका आवाहन करे॥ १९॥ तदनन्तर श्राद्धविधिको जाननेवाला पुरुष यव-मिश्रित जलसे देवताओंको अर्घ्यदान करे और उन्हें विधिपूर्वक धूप, दीप, गन्ध तथा माला आदि निवेदन करे॥ २०॥ ये समस्त उपचार पितृगणके लिये अपसव्य भावसे* निवेदन करे; और फिर ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे दो भागोंमें बँटे हुए कुशाओंका दान करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक पितृगणका आवाहन करे, तथा हे राजन्! अपसव्य-भावसे तिलोदकसे अर्घ्यादि दे॥ २१-२२॥

हे नृप! उस समय यदि कोई भूखा पथिक अतिथि-रूपसे आ जाय तो निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उसे भी यथेच्छ भोजन करावे॥ २३॥


* यज्ञोपवीतको दायें कन्धेपर करके।