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सर्वकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 558 में से

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पृष्ठ 193
१८२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ६

स्पृष्टो यदंशुभिर्लोकः क्रियायोग्यो हि जायते।
पवित्रताकारणाय तस्मै शुद्धात्मने नमः ॥ २३

जिनके किरण-समूहका स्पर्श होनेपर लोक कर्मानुष्ठानके योग्य होता है, उन पवित्रताके कारण, शुद्धस्वरूप सूर्यदेवको नमस्कार है॥ २३॥

नमः सवित्रे सूर्याय भास्कराय विवस्वते।
आदित्यायादिभूताय देवादीनां नमो नमः ॥ २४

भगवान् सविता, सूर्य, भास्कर और विवस्वान्‌को नमस्कार है; देवता आदि समस्त भूतोंके आदिभूत आदित्यदेवको बारम्बार नमस्कार है॥ २४॥

हिरण्मयं रथं यस्य केतवोऽमृतवाजिनः।
वहन्ति भुवनालोकिचक्षुषं तं नमाम्यहम् ॥ २५

जिनका तेजोमय रथ है, [प्रज्ञारूप] ध्वजाएँ हैं, जिन्हें [छन्दोमय] अमर अश्वगण वहन करते हैं तथा जो त्रिभुवनको प्रकाशित करनेवाले नेत्ररूप हैं, उन सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २५॥

श्रीपराशर उवाच

श्रीपराशरजी बोले— उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर

इत्येवमादिभिस्तेन स्तूयमानस्स वै रविः।
वाजिरूपधरः प्राह व्रियतामिति वाञ्छितम् ॥ २६

भगवान् सूर्य अश्वरूपसे प्रकट होकर बोले—'तुम अपना अभीष्ट वर माँगो'॥ २६॥

याज्ञवल्क्यस्तदा प्राह प्रणिपत्य दिवाकरम्।
यजूंषि तानि मे देहि यानि सन्ति न मे गुरौ ॥ २७

तब याज्ञवल्क्यजीने उन्हें प्रणाम करके कहा—'आप मुझे उन यजुः श्रुतियोंका उपदेश कीजिये जिन्हें मेरे गुरुजी भी न जानते हों'॥ २७॥

एवमुक्तो ददौ तस्मै यजूंषि भगवान् रविः।
अयातयामसंज्ञानि यानि वेत्ति न तद्गुरुः ॥ २८

उनके ऐसा कहनेपर भगवान् सूर्यने उन्हें अयातयाम नामक यजुःश्रुतियोंका उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायनजी भी नहीं जानते थे ॥ २८ ॥

यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम।
वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽप्यश्वोऽभवद्यतः ॥ २९

हे द्विजोत्तम! उन श्रुतियोंको जिन ब्राह्मणोंने पढ़ा था वे वाजी नामसे विख्यात हुए क्योंकि उनका उपदेश करते समय सूर्य भी अश्वरूप हो गये थे ॥ २९॥

शाखाभेदास्तु तेषां वै दश पञ्च च वाजिनाम्।
काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्याः प्रकीर्तिताः ॥ ३०

हे महाभाग! उन वाजिश्रुतियोंकी काण्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं; वे सब शाखाएँ महर्षि याज्ञवल्क्यकी प्रवृत्त की हुई कही जाती हैं॥ ३०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥


छठा अध्याय

सामवेदकी शाखा, अठारह पुराण और चौदह विद्याओंके विभागका वर्णन

श्रीपराशर उवाच

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! जिस क्रमसे

सामवेदतरोश्शाखा व्यासशिष्यस्स जैमिनिः।
क्रमेण येन मैत्रेय बिभेद शृणु तन्मम ॥ १

व्यासजीके शिष्य जैमिनिने सामवेदकी शाखाओंका विभाग किया था, वह मुझसे सुनो ॥ १ ॥

सुमन्तुस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुकर्मास्याप्यभूत्सुतः।
अधीतवन्तौ चैकैकां संहितां तौ महामती ॥ २

जैमिनिका पुत्र सुमन्तु था और उसका पुत्र सुकर्मा हुआ। उन दोनों महामति पुत्र-पौत्रोंने सामवेदकी एक-एक शाखाका अध्ययन किया ॥ २॥

सहस्रसंहिताभेदं सुकर्मा तत्सुतस्ततः।
चकार तं च तच्छिष्यौ जगृहाते महाव्रतौ ॥ ३

हिरण्यनाभः कौशल्यः पौष्पिञ्जिश्च द्विजोत्तम।
उदीच्यास्सामगाः शिष्यास्तस्य पञ्चशतं स्मृताः ॥ ४

तदनन्तर सुमन्तुके पुत्र सुकर्माने अपनी सामवेदसंहिताके एक सहस्र शाखाभेद किये और हे द्विजोत्तम! उन्हें उसके कौसल्य हिरण्यनाभ तथा पौष्पिंजि नामक दो महाव्रती शिष्योंने ग्रहण किया। हिरण्यनाभके पाँच सौ शिष्य थे जो उदीच्य सामग कहलाये ॥ ३-४॥