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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका ८७
करता है वही तर जाता है और कामादि पापोंसे मुक्त हो जाता है—ऐसा निर्मल
बुद्धिवाले तत्त्ववेत्ताओंका कथन है॥६॥
विशेष
१—इस पदमें रूपक अलंकार है ।
२—इस पदमें आरतीके छ अंग (धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती
और शयन) दिखलाये गये हैं ।
३—'धूप'—धूपके ५, ६, ८, १२, १६ अंग हैं । प्रत्येकपर भिन्न-भिन्न अर्थ
निकलता है । उदाहरणार्थ, पाँच अंगकी धूप लेनेपर यहाँ नियम (१ शौच,
२ सन्तोष, ३ तप, ४ स्वाध्याय, ५ ईश्वर प्रणिधान) की धूपका बोध होगा ।
४—'चितवृत्ति'—चित्तकी वृत्तियोंके निरोध अथवा समूल नाश कर
डालनेका ही नाम योग है—'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' ।
५—'दस वर्त्तिका'—महाकवि तुलसीदासजीने दस इन्द्रियोंको ही दस
बत्ती कहा है । उन दस इन्द्रियोंमें श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ये पाँच
ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं ।
( ४८ )
हरति सब आरती आरती राम की ।
दहन दुख-दोष, निर्मूलिनी काम की ॥१॥
सुभग सौरभ धूप दीपवर मालिका ।
उड़त अघ-बिहँग सुनि ताल करतालिका ॥२॥
भक्त-हृदि-भवन, अज्ञान-तम-हारिनी ।
विमल विज्ञानमय तेज-विस्तारिनी ॥३॥
मोह-मद-कोह-कलि-कंजहिमजामिनी ।
मुक्ति की दूतिका, देह-दुति दामिनी ॥४॥
प्रनत-जन-कुमुद-वन-इन्दु-कर-जालिका ।
तुलसि अभिमान-महिषेसु बहु कालिका ॥५॥
शब्दार्थ—आरती = क्लेश । सुभग = सुन्दर । सौरभ = सुगन्ध । विस्तारिनी = फैलाने-
वाली । जामिनी = रात । दूतिका = दूती । प्रनत = शरणमें आये हुए। महिषेस = महिषासुर ।