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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 475 में से

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पृष्ठ 96

ब्रह्म राम तें नाम बड़, वर-दायक वर-दानि ।
रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ॥
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नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जगजाला ॥
राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितुमाता ॥
नहिं कलि करम न भगति विवेकू । राम-नाम अवलम्बन एकू ॥
अथवा
कलियुग केवल नाम अधारा । जानि लेहि जो जाननि हारा ।
४—'कर्मजालं'—यों तो कर्मके कई भेद हैं और उनका उल्लेख भी पीछे
किया जा चुक है, किन्तु यहाँ कर्मसे अभिप्राय है वेद-विहित कर्म ।
५—'जमन'—यवन । एक मुसलमानके मुखसे मरते समय 'हराम' शब्द
निकला था । उसमें 'राम' शब्द आ जानेके कारण उसकी मुक्ति हो गयी ।

( ४७ )
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन ।
हरन दुखदुंद गोचिन्द आनंदघन ॥१॥
अचरचर रूप हरि, सर्वगत, सर्वदा
वसत, इति वासना धूप-दीजै ।
दीप निजबोध गत-कोह-मद मोह-तम,
प्रौढ अभिमान चितवृत्ति छीजै ॥२॥
भाव अतिसय विसद प्रवर नैवैद्य सुभ
श्रीरमन परम संतोषकारी ।
प्रेम तांबूल गत सूल संसय सकल,
विपुल भव-वासना-बीजहारी ॥३॥
असुभ-सुभकर्म-घृतपूर्न दस बर्तिका,
त्याग-पावक, सतोगुनप्रकासं ।
भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली,
अर्पि नीराजनं जग-निवासं ॥४॥