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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 94

विनय-पत्रिका ८३
धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पथि-
संवलं, मूलमिदमेव एकं ।
भक्ति-वैराग्य-विग्यान-सम-दान-दम,
नाम आधीन साधन अनेकं ॥ ७ ॥
तेन तप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं,
तेन सर्वे कृतं कर्मजालं ।
येन श्रीरामनामामृतं पानकृत-
मनिसमनवद्यमवलोक्य कालं ॥ ८ ॥
सुपच, खल, भिल्ल, जमनादि हरिलोकगत,
नाम बल बिपुल मति मलिन परसी ।
त्यागि सब आस, संत्रास, भवपास असि
निसित हरिनाम जपु दास तुलसी ॥ ९ ॥
शब्दार्थ—वद=कह । नव-नीलकंजाम=नवीन नीले कमलके समान आभा ।
हृदि=हृदयमें । चंचरीक=भ्रमर । चंड=प्रचंड । कैरव=कुमुदिनी । नागेन्द्र=गजेंद्र ।
पंचाननं=सिंह । क्लेसहं=क्लेशहन्ता । केस=क+ईश) ब्रह्मा और शिव । संदोह=
समूह । पोतं=जहाज । पाथोदपटलानिलं=मेघसमूहके लिए पवनरूप । कल्पद्रुम+
आराम=कल्पवृक्षका बगीचा । संबल=कलेवा, राहखर्च । मूलमिदमेव=(मूलम्+इदम्+
एव) यही मूल है। पानकृतम्+अनिशं (बारम्बार)+अनवद्यम् (अखंड)+अवलोक्य
(देखने योग्य) । निसित=तीक्ष्ण, पैनी ।
भावार्थ—रे मूढ़ मन ! हमेशा और बारम्बार राम-नामका जप कर । रे
शठ ! यह जप सब सौभाग्य और सुखोंकी खानि है, ऐसा जीमें जानकर तथा
यही 'वेदोंका सार' है, इसपर विश्वास मानकर राम राम कहा कर ॥१॥ कोश-
लेन्द्र श्रीरामजीके शरीरकी आभा नवीन नीले कमलके समान है। वह शिवजीके
हृदयमें विचरण करनेवाले भ्रमर हैं । वह सीता-वल्लभ, आनन्द-निधान, विश्व-
ब्रह्मांडके एकमात्र स्वामी, युद्धमें खलोंके नाशकर्ता तथा अत्यन्त कारुणिक हैं ॥२॥
वह दैत्य-समूहरूपी वनके लिए अग्निके समान हैं और पुष्ट आजानु-भुज-दंडोंमें
सुन्दर धनुष एवं तीखे बाण धारण किये हुए हैं । उनके हाथ, पैर, मुख और नेत्र
लाल कमलके सदृश हैं; वह सर्वगुण-निधान तथा अनेक कामदेवोंकी शोभाके