विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ८१
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषनं ।
आजानुभुज सर-चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषनं ॥४॥
इति वदति तुलसीदास संकर-सेष मुनि-मन रंजनं ।
मम-हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥
शब्दार्थ—कंजारुन = (कंज+अरुन) लाल कमल। कन्दर्प = कामदेव। नीरद =
बादल। उदारु = सुन्दर। आजानुभुज = घुटनोंतक लम्बी भुजावाले। रंजन = प्रसन्न करने-
वाले। गंजन = नाशकर्ता।
भावार्थ—रे मन ! संसारके भयंकर भयको हरनेवाले कृपालु श्रीरामचन्द्रको
भज। उनके नेत्र नव-विकसित कमलके समान हैं; मुख कमल-सदृश है; हाथ और
चरण भी लाल कमलके सदृश हैं ॥१॥ उनकी छवि अगणित कामदेवोंसे बढ़-
कर है और शरीर नवीन नीले मेघ जैसा सुन्दर है। मेघ-रूपी शरीरपर पीताम्बर
मानो बिजलीकी तरह चमक रहा है, ऐसे पवित्ररूप जानकीनाथ श्रीरघुनाथजीको
मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥ रे मन ! दीनोंके बन्धु, सूर्यके समान तेजस्वी, दैत्य-
दानव-वंशका मूलोच्छेद करनेवाले, आनन्दकन्द कोशलदेश-रूपी आकाशमें
चन्द्रमाके समान दशरथ-नन्दन श्रीरामजीका भजन कर। वह सिरपर मुकुट,
कानोंमें कुण्डल, मस्तकपर सुन्दर तिलक और मनोहर अंग-प्रत्यंगमें आभूषण
धारण करनेवाले, आजानुबाहु, धनुष-बाणधारी तथा संग्राममें खर-दूषणको जीतने-
वाले हैं ॥४॥ तुलसीदास इतना ही कहता है कि शंकर, शेष और मुनियोंके
मनको प्रसन्न करनेवाले तथा काम-क्रोधादि दुष्टोंका नाश करनेवाले हे रघुनाथ-
जी ! आप मेरे हृदयकमलमें निवास कीजिये ॥५॥
विशेष
१—‘मम हृदय-कंज...गंजन’—कहनेका आशय यह है कि आप कामादि
खल-दल-गंजन हैं, अतः मेरे हृदयसे इन दोषोंको निकाल दीजिये । इनका नाश
होते ही मेरा हृदय विकसित हो जायगा। इसीसे कविने हृदय-कंजका प्रयोग
किया है।
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