विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४०५
शब्दार्थ—थिति = (स्थिति) स्थिरता । सबै = भयभीत । ईसनि = ब्रह्मा-विष्णु और
शिव । गहति = पकड़ती हैं । हति = थी । सारदा = सरस्वती ।
भावार्थ—यह बात संसार और वेदोंमें विदित है, तथा सुनने-समझनेसे भी
(यही) ज्ञात होता है कि अज्ञान-लिप्त व्याकुल बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती ।
हे रामजी ! छोटे-बड़े, बुरे-भले, मोटे-दुबले, सबका निर्वाह आपहीके निभानेसे
हो रहा है ॥१॥ यदि (यह बुद्धि) अपने वशमें होती, तो सदा एकरस रहती,
दुनियामें हर्ष और शोकका कष्ट न सहती । सबको मनोवांछित वस्तु प्राप्त हुआ
करती, किसीकी भी किसी तरहकी लालसा (अपूर्ण) न रह जाती ॥२॥ कर्म,
काल, स्वभाव, गुण, दोष, जीव, जगत् सब आपहीकी मायासे हैं और वह माया
भयभीत होकर चकित भावसे आपकी भृकुटि निहारा करती है । यह माया शिव,
ब्रह्मा आदिको, दिक्पालों-(इन्द्रादि लोकपालों) को, योगेश्वरोंको (मार्कण्डेय
आदिको) और मुनीश्वरों-(वशिष्ठ आदि) तकको आपहीके छुड़ानेसे छोड़ती
एवं पकड़ानेसे पकड़ती है ॥३॥ इस मायाका राज्य शतरंजकी तरह है, जिसका
समाज (बादशाहसे लेकर प्यादेतक सब मोहरा) काठका (बना हुआ) है
(यथार्थतः न कोई राजा है, न प्यादा) । हे महाराज ! शतरंजकी यह बाजी
आपहीकी रची हुई है; पहले यह नहीं थी । तुलसीका कथन है कि हे नाथ !
इस बाजीका हारना-जीतना दोनों आपहीके हाथमें है (अर्थात् यदि आप चाहें
तो हरा दें अथवा जिता दें) । यह बात सरस्वतीने अनेक वेष धारण करके
अनन्त मुखसे कही है (अर्थात् बन्धन और मोक्ष सब ईश्वराधीन है) ॥४॥
विशेष
१—'माया'—११६ पदके विशेषमें देखिये ।
२—'छोड़ति······गहति'—१३३ पदके विशेषमें देखिये ।
[ २४७ ]
राम जपु जीह ! जानि, प्रीति सों प्रतीति मानि,
राम नाम जपे जैहै जियकी जरनि ।
राम नाम सों रहनि, राम नाम की कहनि,
कुटिल कलि-मल-सोक-संकट हरनि ॥१॥